RSS के 100 साल: पंजीकरण के विवाद पर मोहन भागवत का पलटवार, जानें क्या कहता है कानून
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत को लिखे गए पत्र ने एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। खरगे ने पत्र में संघ की कानूनी स्थिति, पंजीकरण, पदाधिकारियों, फंडिंग, खर्च और सार्वजनिक गतिविधियों की अनुमति को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था। जवाब में, मोहन भागवत ने खरगे के पत्र को 'राजनीति' और 'हथकंडा' बताकर खारिज..
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत को लिखे गए पत्र ने एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। खरगे ने पत्र में संघ की कानूनी स्थिति, पंजीकरण, पदाधिकारियों, फंडिंग, खर्च और सार्वजनिक गतिविधियों की अनुमति को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था। जवाब में, मोहन भागवत ने खरगे के पत्र को 'राजनीति' और 'हथकंडा' बताकर खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा, "यह सिर्फ राजनीति है और इस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं... हम इसके अभ्यस्त हैं।"
खरगे के सवाल और संवैधानिक अधिकार
एक टीवी इंटरव्यू के दौरान जब खरगे से पूछा गया कि आरएसएस ने किस कानून का उल्लंघन किया है, तो उनके पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं था। उन्होंने बस इतना कहा कि वह यह जानना चाहते हैं कि आरएसएस किस कानून के तहत काम कर रहा है।
हालाँकि, संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (c) के तहत सभी नागरिकों को संघ, यूनियन या सहकारी समितियां बनाने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। इसी संवैधानिक प्रावधान के आधार पर आरएसएस देश में अपनी गतिविधियां स्वतंत्र रूप से चलाता है। संविधान में किसी भी ऐसे संघ के लिए पंजीकरण अनिवार्य नहीं है, जब तक कि वह सरकार से वित्तीय सहायता न मांग रहा हो या व्यावसायिक गतिविधियों में शामिल न हो। इनमें से कोई भी शर्त आरएसएस पर लागू नहीं होती है।
100 साल का इतिहास और नेहरू-इंदिरा का दौर
आरएसएस पिछले 100 वर्षों से देश में काम कर रहा है, जिनमें से 75 साल संविधान के तहत गुजरे हैं। महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबंध लगा था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने संगठन से अपना संविधान (नियमावली) प्रस्तुत करने को कहा था। 1949 में आरएसएस ने इसे सौंप दिया था, जिसे आधार मानकर सरकार ने प्रतिबंध हटा लिया। इस नियमावली में संघ के काम करने और फंड (धन) जुटाने के तरीके स्पष्ट रूप से बताए गए थे।
इसके बाद से पूर्व प्रधानमंत्रियों—जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी—के कार्यकालों के दौरान भी संघ ने अपनी गतिविधियां जारी रखीं और किसी ने भी कभी आरएसएस के पंजीकृत न होने पर सवाल नहीं उठाया।
आयकर और 'गुरु दक्षिणा' का नियम
आयकर अधिनियम, 1961 के तहत आरएसएस को कानूनी रूप से 'व्यक्तियों का निकाय' (Body of Individuals) माना गया है। यह नागरिकों का एक अनौपचारिक समूह है जो किसी कंपनी, पब्लिक ट्रस्ट या पंजीकृत सोसायटी के बिना काम करता है।
आरएसएस अपने फंड के लिए 'गुरु दक्षिणा' पर निर्भर है। आयकर कानूनों के तहत इसे 'पारस्परिकता' (Mutuality) के सिद्धांत के अंतर्गत रखा गया है। इसका मतलब है कि अगर कोई समूह व्यावसायिक लाभ कमाने के बजाय किसी साझा उद्देश्य के लिए पैसा इकट्ठा करता है, तो वह आय कर-मुक्त होती है। 1994 में पटना उच्च न्यायालय ने भी केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें स्वयंसेवकों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा को कर के दायरे से बाहर माना गया था।
पंजीकृत ट्रस्ट और सोसायटियों से चलते हैं अन्य काम
देश में कई धार्मिक और अन्य संस्थाएं बिना पंजीकरण के स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। जहां तक आरएसएस का सवाल है, इसके मुख्य 'व्यक्तियों के निकाय' को छोड़कर, इसके तहत चलने वाले स्कूल, गैर-सरकारी संगठन (NGO) और अन्य सहयोगी संस्थाएं विधिवत पंजीकृत ट्रस्टों और सोसायटियों के माध्यम से चलाई जाती हैं।
चूंकि आरएसएस की स्थापना 1925 में ब्रिटिश शासन से मुक्ति के उद्देश्य से हुई थी, इसलिए उस विदेशी सरकार के अधीन पंजीकरण कराने का कोई सवाल ही नहीं था। आजादी के बाद भी इसने भारतीय कानूनों के तहत एक गैर-पंजीकृत निकाय के रूप में बने रहने का विकल्प चुना, जिसका सम्मान पिछली सभी सरकारों ने किया है।
यह वीडियो आरएसएस के पंजीकरण को लेकर प्रियांक खरगे की मांगों और मोहन भागवत के पलटवार से जुड़े मौजूदा राजनीतिक विवाद को विस्तार से समझने में प्रासंगिक है।
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