“गौमाता की पूजा तो करते हैं, पर क्या उसे जानते भी हैं?”

हाल ही में लोकसभा में आदरणीय प्रियंका गांधी जी द्वारा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास (आईआईटी मद्रास) के निदेशक प्रो. वी. कामकोटी के संदर्भ में “गोमूत्र एक्सपर्ट” जैसी टिप्पणी के बाद बहस छिड़ गई। मैं उनकी अज्ञानता पर बहस करना उनके सम्मान पर चोट मानता हूँ और उन्हें दोषी ठहराना उचित नहीं समझता..

“गौमाता की पूजा तो करते हैं, पर क्या उसे जानते भी हैं?”
31-07-2026 - 11:56 AM
31-07-2026 - 11:58 AM

                        माननीय ओम बिरला जी के नाम खुला पत्र

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

सादर वन्देमातरम्।

हाल ही में लोकसभा में आदरणीय प्रियंका गांधी जी द्वारा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास (आईआईटी मद्रास) के निदेशक प्रो. वी. कामकोटी के संदर्भ में “गोमूत्र एक्सपर्ट” जैसी टिप्पणी के बाद बहस छिड़ गई।

मैं उनकी अज्ञानता पर बहस करना उनके सम्मान पर चोट मानता हूँ और उन्हें दोषी ठहराना उचित नहीं समझता।

आपको दोषी कहूँ—यह मेरी सामर्थ्य नहीं।

हाँ, व्यवस्था से एक प्रश्न अवश्य पूछ सकता हूँ।

क्या हमारी शिक्षा-व्यवस्था ने भारतीयों को कभी यह जानने का अवसर दिया कि जिस गाय को हमारी सभ्यता ने “माता” कहा, उसके बारे में आधुनिक विज्ञान क्या कहता है?

क्या हमने यह बताया कि गोमय, गोमूत्र, दूध, दही और घी केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन के विषय भी हैं?

मेरी शिकायत किसी व्यक्ति से नहीं, उस व्यवस्था से है जिसने हमें अपनी ही विरासत से अनजान बना दिया।

संसद में “गौमाता ज्ञान-दीर्घा” क्यों नहीं?

मेरी आपसे विनम्र प्रार्थना है कि संसद भवन के वाचनालय के मुख्य द्वार के निकट एक गरिमापूर्ण “गौमाता ज्ञान-दीर्घा” स्थापित करवाएँ।

वहाँ भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव के नन्दी, भगवान ऋषभदेव और भगवान दत्तात्रेय के साथ गौमाता के चित्र हों तथा एक बड़ा पैनल हो—

गौमाता : परंपरा, संस्कृति और आधुनिक विज्ञान”

जिसमें भारतीय ग्रंथों, संतों और महापुरुषों के विचारों के साथ प्रमाणित भारतीय एवं विदेशी वैज्ञानिक अध्ययनों की जानकारी भी हो।

ताकि प्रत्येक सांसद और भारत आने वाला विदेशी अतिथि समझ सके कि भारत में गाय केवल पशुधन नहीं, बल्कि सभ्यता, कृषि, संस्कृति और ग्राम्य अर्थव्यवस्था के एक विशाल अध्याय का नाम है।

गाय पर राजनीति बहुत, ज्ञान कितना?

विडंबना देखिए—

गाय पर राजनीति करने वाले बहुत हैं,

भावुक होने वाले बहुत हैं,

नारे लगाने वाले बहुत हैं,

पर गाय को समझने वाले कितने हैं?

गोमूत्र पर शोध हो तो उपहास,

गोबर पर शोध हो तो हँसी,

गोमय में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों पर चर्चा हो तो उसे अंधविश्वास कह दिया जाता है!

लेकिन वही प्राकृतिक पदार्थ प्रयोगशाला में पहुँचकर जैव-सक्रिय यौगिक, रोगाणुरोधी पेप्टाइड या नैनो-पदार्थ के रूप में अध्ययन का विषय बन जाए, तो हम उसे विज्ञान मान लेते हैं।

समस्या गाय में है या हमारी दृष्टि में?

गोमूत्र : उपहास नहीं, प्रयोगशाला का विषय

मैं यह नहीं कहता कि गोमूत्र हर रोग की औषधि है। विज्ञान ऐसा कहने की अनुमति नहीं देता।

लेकिन यह कहना कि गोमूत्र पर वैज्ञानिक शोध ही नहीं हुआ—तथ्यात्मक रूप से गलत है।

वर्ष 2021 में ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित एक अध्ययन में साहीवाल गाय के गोमूत्र के पेप्टाइड-विषयक विश्लेषण के माध्यम से हजारों मूत्रीय पेप्टाइड्स की पहचान की गई। इनमें से कुछ पेप्टाइड्स की ई. कोलाई तथा एस. ऑरियस के विरुद्ध प्रयोगशाला-स्तर पर रोगाणुरोधी सक्रियता का भी परीक्षण किया गया।

अर्थात्—गोमूत्र पर वैज्ञानिक प्रयोग करना विज्ञान है; और उन प्रयोगों के परिणामों को प्रमाण की कसौटी पर परखना उससे भी बड़ा विज्ञान है।

इसी प्रकार गोमय यानी गोबर में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों, जैविक खाद निर्माण, बायोगैस तथा पोषक-तत्वों के प्राकृतिक पुनर्चक्रण से संबंधित अध्ययन भी कृषि विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

दूध, दही, घी और गाय के सान्निध्य को भी समझिए

हमारी परंपरा में दूध, दही और घी को भोजन का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। आधुनिक पोषण विज्ञान में भी दुग्ध पदार्थों के पोषण-मूल्य, किण्वन प्रक्रिया, प्रोटीन, कैल्शियम तथा आंत्र सूक्ष्मजीव समुदाय जैसे विषयों पर व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन किए जा रहे हैं।

लेकिन वैज्ञानिक ईमानदारी यही है—

दूध दूध है—हर रोग की औषधि नहीं।

घी घी है—चमत्कारी इलाज नहीं।

दही दही है—लेकिन फर्मन्टेशन और माइक्रोबायोम का गंभीर वैज्ञानिक विषय है।

इसी तरह गाय के साथ शांत, मानवीय इंटरएक्शन और काऊ कडलिंग को स्ट्रेस और वेल बीइंग के संदर्भ में चर्चा मिली है; हालांकि इसके प्रत्यक्ष क्लिनिकल एविडेंस अभी सीमित हैं।

फिर प्रश्न है—यदि किसी शांत जीव के साथ स्पर्श और सान्निध्य मनोवैज्ञानिक अध्ययन का विषय हो सकता है, तो गाय को केवल “कमोडिटी” मानकर हम उसके प्रति अपने सांस्कृतिक और मानवीय संबंध को क्यों भूल जाएँ?

हमारी परंपरा ने बहुत पहले उत्तर दे दिया था

भारतीय परंपरा में कहा गया—“मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः।”

महाभारत के अनुशासन पर्व में गायों को माता और सुखदायिनी कहा गया है। भगवान श्रीकृष्ण का बचपन गोपाल के रूप में बीता और गोवर्धन-लीला में गौवंश एवं गोप-संस्कृति का विशेष स्थान है। भगवान दत्तात्रेय और नन्दी से जुड़े प्रतीक भी हमारी सांस्कृतिक चेतना में गहरे हैं।

गाय के विषय में महात्मा गांधी, विनोबा भावे, महामना मदनमोहन मालवीय, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, लोकमान्य तिलक, जयप्रकाश नारायण सहित अनेक महापुरुषों ने अपने-अपने संदर्भों में विचार व्यक्त किए।

इनसे सहमत या असहमत होना अलग विषय है।

लेकिन क्या संसद के वाचनालय में भारतीय बौद्धिक परंपरा के इन विचारों के साथ उनके मूल स्रोत और आधुनिक वैज्ञानिक पुस्तकें, सन्दर्भ ग्रन्थ और पेपर्स उपलब्ध नहीं होने चाहिए?

प्रो. वी. कामकोटी को भी इसी दृष्टि से देखिए

प्रो. वी. कामकोटी को केवल “गोमूत्र एक्सपर्ट” कहना उनके विस्तृत अकादमिक योगदान को बहुत छोटे खाने में बंद कर देना है।

वे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास (आईआईटी मद्रास) के निदेशक हैं तथा संगणक वास्तुकला, संगणक सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखते हैं। उन्हें वर्तमान परीक्षा सुधार संबंधी उच्चाधिकार प्राप्त कार्यबल का सदस्य भी बनाया गया है।

यह समिति गोमूत्र पर शोध के लिए नहीं, बल्कि परीक्षा-व्यवस्था में सुधार के लिए गठित हुई है—यह स्पष्ट रहना चाहिए।

हाँ, उन्होंने गोमूत्र पर उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य की ओर सार्वजनिक ध्यान अवश्य आकर्षित किया है।

यदि किसी शोध में कमी है तो उसका उत्तर—उपहास नहीं, बेहतर रिसर्च होना चाहिए।

यही तो विज्ञान है।

ज्ञान-दीर्घा में क्या हो?

संसद वाचनालय के बाहर एक अलमारी में प्रमाणित भारतीय एवं विदेशी शोधों पर आधारित पुस्तकें प्रदर्शित की जाएँ—

गोमूत्र — पेप्टाइड एवं सूक्ष्मजीव विज्ञान

गोमय — सूक्ष्मजीव विज्ञान, जैविक खाद एवं बायोगैस

दूध — पोषण विज्ञान

दही — किण्वन एवं आंत्र स्वास्थ्य संबंधी अनुसंधान

घी — खाद्य एवं चयापचय संबंधी अनुसंधान

गाय–मानव सान्निध्य — स्वास्थ्य एवं मानसिक कल्याण पर अनुसंधान

गौ-आधारित कृषि — चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था

जिस देश में—

कृष्ण को गोपाल कहने में गर्व है,

गोवर्धन पूजा में गर्व है,

नन्दी के कान में मनोकामना कहने में गर्व है,

पंचगव्य और गौमाता का नाम लेने में गर्व है—

उसी देश में जब कोई वैज्ञानिक कहता है—“आइए, इसके जैविक घटकों को लेबोरेटरी में जाँचते हैं” तो हम दो खेमों में बँट जाते हैं। एक सीधे-सीधे कहता है—“सब अंधविश्वास है।” दूसरा कहता है—““पहले प्रयोग करो, परिणाम दो, फिर निष्कर्ष निकालो, पहले से अंधविश्वास घोषित मत करो ।”

यही हमारी सबसे बड़ी विडंबना है—हम गौमाता की पूजा करना जानते हैं,

पर गौमाता को समझना नहीं जानते।

हम गोमूत्र को पवित्र कहते हैं, पर उसके अणुओं-परमाणुओं को पहचानने का धैर्य नहीं रखते।

हम गोबर को गोमय कहते हैं, पर उसके माइक्रोऑर्गनिज्म का अध्ययन नहीं करते।

हम घी को अमृत कहते हैं, पर उसके न्यूट्रीशन और मेटाबोलिज्म पर शोध नहीं पढ़ते।

हम गाय को गले लगाते हैं, पर उसके मानवीय सान्निध्य के संभावित सायकोलाजिकल प्रभाव पर वैज्ञानिक प्रश्न पूछना भूल जाते हैं।

अध्यक्ष महोदय, यही मेरी विनम्र प्रार्थना है

संसद केवल कानून बनाने का स्थान नहीं; वह राष्ट्र की स्मृति, विचार और ज्ञान की भी महत्वपूर्ण संस्था है।

अतः संसद के वाचनालय में ऐसी “गौमाता ज्ञान-दीर्घा” स्थापित हो, जहाँ—

आस्था हो, पर अंधविश्वास न हो।

विज्ञान हो, पर अहंकार न हो।

परंपरा हो, पर अतिशयोक्ति न हो।

शोध हो, पर प्रचार न हो।

ताकि अगली पीढ़ी को बहस नहीं, प्रमाण मिलें।

कोई पूछे—“गोमूत्र में क्या है?” तो सामने शोध अध्ययन हो।

गोबर में क्या है?” तो सामने माइक्रोबायोलॉजी हो।

दूध, दही और घी का महत्व क्या है?” तो सामने न्यूट्रीशन विज्ञान हो।

और कोई पूछे—“गाय के सान्निध्य का क्या प्रभाव है?” तो सामने उपलब्ध एविडेन्स और उसकी सीमाएँ दोनों हों।

तभी हम कह सकेंगे—हमने अपनी परंपरा को केवल पूजा नहीं, समझा भी है।

अध्यक्ष महोदय,

समस्या यह नहीं कि दुनिया गौमाता को नहीं जानती।

समस्या शायद यह है कि हम स्वयं अपनी गौमाता को पर्याप्त नहीं जानते।

इसलिए प्रियंकाजी के इस प्रसंग को विवाद नहीं, ज्ञान का अवसर बनाइए।

एक ऐसी ज्ञान-दीर्घा बनाइए, जहाँ अगली पीढ़ी को न अंधविश्वास मिले, न उपहास—बल्कि परंपरा के साथ प्रमाण भी मिले।

यही भारतीय ज्ञान-परंपरा का आधुनिक सम्मान होगा।

यही गौमाता के प्रति वास्तविक श्रद्धांजलि होगी।

सादर,

डॉ. मनोहर भण्डारी, एम.बी.बी.एस., एम.डी.

एक भारतीय नागरिक, जो गौमाता की पूजा ही नहीं, उसे समझने का भी आग्रह करता है।

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डॉक्टर मनोहर भंडारी डॉक्टर मनोहर भंडारी चिकित्सक हैं और वे इंदौर के मेडिकल कॉलेज में अध्यापन करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त वे अपनी पैनी दृष्टि रखते हुए विभिन्न सामाजिक विषयों पर लंबे समय से लेखन कार्य भी करते रहे हैं।