जैन धर्म में मृत्यु के बाद क्या होता है?..जीव, कर्मबंध, अगला भव, श्राद्ध और लोकाचार
विभिन्न मान्यताओं के अनुसार श्वेतांबर जैन दर्शन की दृष्टि में मृत्यु जीव का अंत नहीं बल्कि एक शरीर का छूटना और कर्मानुसार अगले भव की प्राप्ति है..
विभिन्न मान्यताओं के अनुसार श्वेतांबर जैन दर्शन की दृष्टि में मृत्यु जीव का अंत नहीं बल्कि एक शरीर का छूटना और कर्मानुसार अगले भव की प्राप्ति है।
जैन सिद्धान्त के अनुसार जीव अनादि-अनन्त है। शरीर नश्वर है, जीव नहीं। वर्तमान शरीर के आयुष्यकर्म का क्षय होने पर जीव उस शरीर को छोड़कर अपने कर्मों के अनुसार अगले भव को प्राप्त करता है। जैन दर्शन चार गतियाँ बताता है—नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव।
अर्थात् मृत्यु के बाद मूल प्रश्न यह है कि जीव अपने कर्मों के अनुसार किस अगले भव में गया, न कि वह पुराने शरीर अथवा घर के आसपास रहकर हमारे द्वारा दिए गए भोजन की प्रतीक्षा कर रहा है।
कर्म ही अगली गति का आधार
जैन कर्मसिद्धान्त में प्रत्येक जीव अपने कर्मों का स्वयं कर्ता और भोक्ता है। किसी दूसरे व्यक्ति की इच्छा, प्रार्थना या भौतिक अर्पण से मृत जीव की कर्मानुसार निर्धारित गति बदल नहीं जाती।
इसलिए जैन दृष्टि से यह सिद्धान्त महत्वपूर्ण है, हम किसी जीव के लिए पुण्यभाव और धार्मिक कार्य कर सकते हैं, लेकिन अपने कर्म का फल दूसरे जीव को हस्तांतरित नहीं कर सकते। जैन दर्शन के अनुसार अपने सम्बन्धियों की स्मृति में किये गए शुभ कर्मों का फल उस सम्बन्धी को नहीं मिलता हैI
श्राद्ध और जैन कर्मसिद्धान्त
यहाँ श्राद्ध और लोकाचार के बीच स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है।
मृत्यु के बाद जीव अपने कर्मानुसार नया भव ग्रहण करता है। इसलिए किसी भौतिक पदार्थ को अर्पित करके मृत जीव तक पहुँचाना या उसकी तृप्ति कराना जैन कर्मसिद्धान्त से स्वतः सिद्ध नहीं होता।
हाँ, मृतक की स्मृति में दान, स्वाध्याय, जिनपूजा, सामायिक, प्रतिक्रमण अथवा अन्य धार्मिक कार्य किए जा सकते हैं। उनका आध्यात्मिक महत्व उन कार्यों को करने वाले जीव के भाव और कर्म से संबंधित है।
श्राद्ध और लोकाचार एक नहीं हैं
लोकाचार का अर्थ है—किसी समाज, परिवार अथवा क्षेत्र में समय के साथ विकसित हुई सामाजिक या धार्मिक-सांस्कृतिक परम्परा।
इसलिए किसी जैन परिवार में मृत्यु के बाद विशेष दिन पर एकत्र होना, मृतक का स्मरण करना, धूप-दीप करना, दान देना या कोई विशेष विधि करना—यदि वह आगम में अनिवार्य रूप से निर्धारित नहीं है, तो उसे लोकाचार कहा जा सकता है।
यहाँ मूल अंतर समझना आवश्यक है..
आगम-विहित सिद्धान्त वह है जिसका आधार आगमिक प्रमाण हो; लोकाचार वह है जो समाज में परम्परा के रूप में प्रचलित हो।
किसी परम्परा का लंबे समय से प्रचलित होना अपने-आप उसे आगम-विहित नहीं बना देता।
तेरहवीं और धूप देने की परम्परा
कुछ जैन परिवारों में मृत्यु के बाद तेरहवें दिन धूप अथवा अग्नि देने और मृतक से सांसारिक संबंध-विच्छेद का भाव व्यक्त करने की परम्परा मिलती है।
इसे सीधे श्वेताम्बर आगम का अनिवार्य विधान कहना उचित नहीं होगा, जब तक उसका विशिष्ट आगमिक प्रमाण उपलब्ध न हो। इसे लोकपरम्परा के रूप में समझना अधिक सावधान दृष्टिकोण है।
यदि इस अवसर पर कहा जाता है—“तुम तुम्हारे, हम हमारे।”
तो जैन दर्शन की दृष्टि से इसका गहरा अर्थ है—प्रत्येक जीव अपनी कर्मयात्रा में स्वतंत्र है।
आचार्य शिव मुनि की जैन रचना में भी इसी भाव को स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया गया है—“तुम हमारे नहीं, हम तुम्हारे नहीं।”
इसका अर्थ यह नहीं कि जीवनभर के प्रेम, कर्तव्य और करुणा का कोई मूल्य नहीं था। बल्कि इसका संकेत यह है कि सांसारिक संबंध व्यवहार में हैं, पर प्रत्येक जीव अपने कर्म का स्वयं भोक्ता है।
न कोई जीव दूसरे के कर्म भोग सकता है और न कोई दूसरे के कर्म अपने ऊपर ले सकता है।
मोह छोड़ें, मंगलभाव नहीं
यहीं जैन दर्शन की गहराई सामने आती है।
मृत जीव अपनी कर्मयात्रा पर आगे बढ़ चुका है। इसलिए उसे अपने मोह में बाँधे रखने के बजाय उसके प्रति मैत्री, क्षमा और मंगलभाव रखना अधिक सार्थक है।
मृतक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि केवल बाहरी कर्मकाण्ड में नहीं, बल्कि—
• उसके सद्गुणों को अपने जीवन में उतारने,
• क्षमा माँगने और क्षमा करने,
• जीवमात्र के प्रति मैत्री रखने,
• दान एवं स्वाध्याय करने और
• अपने कर्मों को शुद्ध करने में है।
अंतिम संदेश
जैन दर्शन की दृष्टि से..
• शरीर छूटता है, जीव नहीं।
• सांसारिक संबंध छूटते हैं, जीव की कर्मयात्रा नहीं।
• प्रत्येक जीव अपने कर्म का स्वयं कर्ता और भोक्ता है।
इसलिए मृतक को मोह से नहीं, मंगलभाव से विदा करना जैन दृष्टि का अधिक गहरा संदेश है।
What's Your Reaction?