राजस्थानः कन्हैया का "सिर तन से जुदा होना" इस चुनाव का एक टर्निंग पॉइंट रहा..!
<p><em>राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 में इस बार कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के कई बड़े चेहरे धराशायी हो गये। कांग्रेस के कुछ ज्यादा तो भाजपा के कुछ कम। ऐसा लगा कि दोनों की पार्टियों के दिग्गज नेता किसी ना किसी स्तर पर नता का मूड भांपने में गलती कर गये। मुद्दे बहुत सारे थे इस चुनाव में ..लेकिन मेरी दृष्टि में उदयपुर के कन्हैया का "सिर तन से जुदा होना" इस चुनाव का एक टर्निंग पॉइंट था..! कुछ महीने बाद जब मैं वहां की गलियों में घूम रहा था तो काफी समय बीत जाने के बावजूद भी उस क्षेत्र के लोगों के दिल और चेहरों पर डर दिखाई दे रहा था। वे आतंकित थे। धमकियों के मद्देनजर कन्हैया लगातार सुरक्षा की गुहार लगा रहा था, लेकिन कांग्रेस सरकार के निर्लज्ज तंत्र ने उसकी गुहार नहीं सुनी तो मतदाता को चुनाव में अपना क्रोध व्यक्त करना ही था। कांग्रेस का दुर्भाग्य था कि सोनिया गांधी के सलाहकार और उदयपुर से चुनाव हारे गौरव वल्लभ जैसे दिग्गज भी मतदाता के इस मूड को नहीं पढ़ पाए तो आम नेता कहां पढ़ पाता?</em></p>
राजस्थान विधानसभा के चुनाव में भले ही मीडिया ने इसे मुद्दा नहीं बताया हो पर लोगों के दिल में सवाल था कि क्या हम कांग्रेस राज में सुरक्षित हैं? रोज-रोज होने वाले बलात्कार और अन्य अपराधों ने लोगों की आशंका में बढ़ोतरी की।
मतदाता के मन में एक और सवाल था कि क्या उनका प्रत्याशी विनम्र और सदैव उपलब्ध है? क्या वह बिना रिश्वत काम करता है?क्या उसने पर्याप्त विकास करवाया है?
नतीजा यह हुआ की अनेक विधायक जो विनम्र नहीं थे, जिनमें दिव्या मदेरणा से लेकर प्रताप सिंह खाचरियावास तक और राजेंद्र सिंह राठौर,नरपतसिंह राजवी से लेकर सी पी जोशी तक शामिल थे, चुनाव हार गए। बहुत से विधायक सदैव उपलब्ध होने के कारण चुनाव जीत गए तो बहुत से विनम्र रहने के कारण!
मतदाता के मन में यह भी प्रश्न था कि राजस्थान लोक सेवा आयोग में जिस तरह के सदस्यों का मनोनयन हुआ है और जिस तरह के खुलेआम घोटाले लोक सेवा आयोग के सदस्य और सरकार में बैठे हुए लोग मिलकर कर रहे हैं, क्या इस कांग्रेस सरकार के हाथ में उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित है? क्या उन्हें मुफ्त बिजली या बच्चे को मोबाइल की लॉलीपॉप देने वाली सरकार कहीं उनके बच्चों के भविष्य को अंधकारमय तो नहीं कर रही है ?
यदि आप कुंभलगढ़ जाते हैं तो आपको यह देखकर आश्चर्य होता है कि पर्यटन और इतिहास की दृष्टि से इतनी महत्वपूर्ण जगह के रास्ते में भी राष्ट्रीय राजमार्ग से हटते ही चार से छः इंच के गड्ढे शुरू हो जाते हैं। लोग सोच रहे थे, क्या इन सड़कों का कभी नवीकरण होगा या कभी गड्ढे भी भरे जाएंगे?
मतदाता अपने विधायकों के कामकाज के साथ ही आईएएस अधिकारी से लेकर पटवारी और सरकारी डॉक्टर से लेकर पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर तक के कामकाज का आंकलन कर रहा था और उसने यह पाया कि सरकारी तंत्र पर सरकार बहादुर का कोई नियंत्रण नहीं है। मंत्रियों विधायकों से लेकर समूचे सरकारी तंत्र को खाने कमाने की पूरी छूट है।
सवाल यह भी था कि क्या हमारी सरकारी शिक्षण संस्थाओं, सरकारी अस्पतालों और अन्य सरकारी दफ्तरों के कामकाज पर हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधि और हमारी चुनी हुई सरकार का नियंत्रण है अथवा राजनीतिक तंत्र सरकारी तंत्र से सिर्फ हफ्ता वसूली कर रहा है?
सचिन पायलट के अपमान से आहत गुर्जरों ने भी अपना हिसाब चुकता किया। कुल मिलाकर यह कांग्रेस की परीक्षा थी और इस परीक्षा में भाजपा का ज्यादा रोल नहीं था। नतीजा हुआ कि जैसे कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की सरकार फेल हो गई वैसे ही राजस्थान में कांग्रेस की सरकार फेल हो गई।
मैं फेसबुक और सोशल मीडिया पर लगातार भाजपा की 115 प्लस सीटें बता रहा था पर शुरू में मेरा अनुमान था कि भाजपा को 140 सीटें मिल सकती हैं लेकिन एक एक और तो कांग्रेस की मुफ्त की रेवड़ियों का कुछ प्रभाव पड़ा दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के खिलाफ मुद्दों को ठीक ढंग से नहीं उठा पाई तथा कुछ जगह टिकटों का चयन भी गलत हुआ जो कि परिणाम से भी स्पष्ट है।
कई जगह कांग्रेस प्रत्याशी को जाति का लाभ मिला। शांति धारीवाल जैसे मंत्री को उनकी बदतमीजी और भ्रष्टाचार के आरोपी के बावजूद जनता ने विकास और उम्र के चलते "पास्ड बाय ग्रेस" कर दिया। यदि यह कारक नहीं होते तो कांग्रेस मुश्किल से 30 सीट्स ला पाती।
खैर, इस चुनाव का भारतीय जनता पार्टी को यह सबक है कि सारा ध्यान गुड गवर्नेंस पर फोकस करें, सिर्फ मोदी या जातीय समीकरण के भरोसे नहीं रहे। मोदी के नाम पर भाजपा की उम्मीदवार कब तक चुनाव जीतते रहेंगे?
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