बागी गुट के विलय के ऐलान पर तृणमूल का पलटवार, बोली- जनता के जनादेश के साथ हुआ विश्वासघात
TMC के बागी सांसदों के मुद्दे ने नया मोड़ ले लिया। बागी गुट ने पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपा और फिर शाम तक यह घोषणा कर दी कि वे दो-तिहाई बहुमत के साथ अपेक्षाकृत कम चर्चित नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी में शामिल
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में हार और कानूनी चुनौतियों से जूझ रही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए रविवार का दिन राजनीतिक घटनाक्रमों से भरा रहा। सुबह पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी से कथित फर्जी हस्ताक्षर मामले में राज्य की सीआईडी ने पूछताछ की।
इसके बाद पार्टी के सामने बागी सांसदों के मुद्दे ने नया मोड़ ले लिया। बागी गुट ने पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपा और फिर शाम तक यह घोषणा कर दी कि वे दो-तिहाई बहुमत के साथ अपेक्षाकृत कम चर्चित नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी में शामिल हो रहे हैं। उनका दावा है कि इससे वे दल-बदल विरोधी कानून से सुरक्षित हो जाएंगे।
हालांकि, टीएमसी के वरिष्ठ नेता मदन मित्रा ने इस घटनाक्रम को लेकर संयमित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने पत्रकारों से कहा, "बागी गुट ने तृणमूल कांग्रेस के साथ विश्वासघात किया है। उन्होंने ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी को मजबूत करने के वादे के साथ चुनाव लड़ा था लेकिन अब उसी वादे से पीछे हट गए हैं। यह सीधा धोखा है।"
जब उनसे पूछा गया कि क्या टीएमसी इस मामले को अदालत में ले जाएगी, तो उन्होंने कहा कि इसका फैसला ममता बनर्जी करेंगी। बागियों के पास दो-तिहाई बहुमत होने के सवाल पर मदन मित्रा ने कहा, "यह अलग पार्टी बनाने के लिए बहुत छोटा आंकड़ा है। इसके लिए कई कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाएं हैं। यह तो सिर्फ शुरुआत है।"
उन्होंने बागी गुट पर तंज कसते हुए कहा, "नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने फॉरवर्ड ब्लॉक बनाया था, लेकिन उधर कोई सुभाष बोस नहीं है।"
दूसरी ओर, बागी नेताओं ने साफ कर दिया कि उनका अगला लक्ष्य तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिह्न हासिल करना होगा।
तृणमूल के वरिष्ठ नेता और ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी सुदीप बंद्योपाध्याय, जो हाल ही में बागी गुट में शामिल हुए हैं, ने कहा, "जब कोई समूह पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों के साथ अलग होता है, तो वह पहले ही दिन उस पार्टी के नाम की मांग नहीं कर सकता। जुलाई में हम तृणमूल नाम हमें देने की मांग करेंगे, क्योंकि हमारे साथ तृणमूल के दो-तिहाई सदस्य हैं। इसके बाद अंतिम फैसला अदालत करेगी।"
इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है, जहां अब कानूनी लड़ाई के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर भी संघर्ष की संभावना बढ़ गई है।
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