कच्चे तेल के संकट से ऊर्जा सुरक्षा तक: कैसे पीएम मोदी ने 1973 की इंदिरा गांधी की रणनीति से अलग रास्ता अपनाया
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम के बाद पश्चिम एशिया में तनाव भले ही कम हो गया हो लेकिन इस संघर्ष के व्यापक प्रभावों पर चर्चा जारी है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली तेल आपूर्ति में संभावित बाधा को लेकर..
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम के बाद पश्चिम एशिया में तनाव भले ही कम हो गया हो लेकिन इस संघर्ष के व्यापक प्रभावों पर चर्चा जारी है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली तेल आपूर्ति में संभावित बाधा को लेकर रही। इसी संदर्भ में 1973 के योम किप्पुर युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi की नीति और हालिया इजरायल-ईरान संघर्ष के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi के दृष्टिकोण की तुलना की जा रही है।
यह तुलना भारत की विदेश नीति के दो अलग-अलग मॉडल सामने लाती है—एक राजनीतिक पक्षधरता पर आधारित और दूसरा रणनीतिक व्यावहारिकता तथा राष्ट्रीय हितों पर केंद्रित।
1973 का योम किप्पुर युद्ध और इंदिरा गांधी का रुख
अक्टूबर 1973 में मिस्र और सीरिया ने इजरायल पर अचानक हमला कर दिया, जिससे योम किप्पुर युद्ध शुरू हुआ। यह संघर्ष जल्द ही एक बड़े भू-राजनीतिक टकराव में बदल गया, जिसमें अमेरिका, सोवियत संघ और अरब देशों के प्रमुख तेल उत्पादक भी शामिल हो गए।
उस समय इंदिरा गांधी सरकार ने खुलकर अरब देशों का समर्थन किया। भारत ने युद्ध के लिए इजरायल को जिम्मेदार ठहराया और माना कि इजरायल का कठोर रवैया ही संघर्ष का प्रमुख कारण था।
भारत ने न केवल अरब देशों बल्कि फिलिस्तीनी मुद्दे का भी जोरदार समर्थन किया। हालांकि, इसके बावजूद तेल संकट के दौरान भारत को कोई विशेष आर्थिक राहत या रियायत नहीं मिली।
तेल संकट ने बढ़ाई मुश्किलें
युद्ध के बाद कच्चे तेल की कीमतें लगभग 3 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर करीब 12 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। इससे भारत का आयात बिल कई गुना बढ़ गया और देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ा।
इसके बावजूद भारत का अरब देशों के प्रति समर्थन जारी रहा।
- 1974 में भारत ने Palestine Liberation Organization (पीएलओ) को संयुक्त राष्ट्र में पर्यवेक्षक दर्जा दिलाने के प्रयासों का समर्थन किया।
- 1975 में भारत पीएलओ को औपचारिक राजनयिक मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बना।
- नई दिल्ली में पीएलओ कार्यालय खोलने की अनुमति दी गई।
- भारत ने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव का भी समर्थन किया जिसमें जियोनिज्म को नस्लवाद के समान बताया गया था।
उस दौर में यह माना जाता था कि अरब देशों के साथ मजबूत राजनीतिक संबंध भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों, विशेषकर तेल आपूर्ति, को सुरक्षित करेंगे।
लेकिन तेल संकट ने यह दिखा दिया कि केवल राजनीतिक समर्थन आर्थिक लाभ की गारंटी नहीं देता। पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) ने सभी देशों पर समान मूल्य वृद्धि लागू की और भारत भी अन्य तेल आयातक देशों की तरह प्रभावित हुआ।
आलोचकों का मानना है कि 1973 का सबसे बड़ा सबक यह था कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में वैचारिक निष्ठा से अधिक महत्व रणनीतिक प्रभाव और राष्ट्रीय हितों का होता है।
इजरायल-ईरान तनाव और मोदी सरकार की रणनीति
पांच दशक बाद पश्चिम एशिया में इजरायल और ईरान के बीच बढ़े तनाव ने फिर से वैश्विक तेल बाजारों को चिंता में डाल दिया। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल परिवहन होता है, संभावित संघर्ष का केंद्र बन गया।
भारत, जो दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है, के लिए यह स्थिति गंभीर आर्थिक जोखिम पैदा कर सकती थी। लंबा संकट महंगाई बढ़ाने, आयात लागत में इजाफा करने और आर्थिक विकास को प्रभावित करने का कारण बन सकता था।
रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर
1973 के विपरीत, मोदी सरकार ने इस संकट को रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखा।
भारत ने किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय लगातार शांति, संवाद, तनाव कम करने और क्षेत्रीय स्थिरता की वकालत की।
नई दिल्ली ने पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों और पक्षों के साथ अपने संबंध बनाए रखे और किसी एक खेमे में जाने से परहेज किया। समर्थक इसे "इंडिया फर्स्ट" नीति का उदाहरण बताते हैं, जिसका उद्देश्य हर परिस्थिति में भारत के हितों की रक्षा करना है।
ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता
संभावित संकट के असर का इंतजार करने के बजाय केंद्र सरकार ने कई स्तरों पर तैयारी की।
- कच्चे तेल के आयात स्रोतों में विविधता लाई गई।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
- रिफाइनरियों के संचालन को निर्बाध बनाए रखने के प्रयास किए गए।
- तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्र में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी पक्षों से राजनयिक संपर्क बनाए रखा गया।
मोदी सरकार ने किसी एक गुट के साथ खड़े होने के बजाय संतुलित विदेश नीति अपनाई और राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
दो दौर, दो नीतियां
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विषय |
1973: इंदिरा गांधी |
2025-26: नरेंद्र मोदी |
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विदेश नीति |
अरब देशों के पक्ष में स्पष्ट झुकाव |
रणनीतिक संतुलन और स्वायत्तता |
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तेल संकट का दृष्टिकोण |
राजनीतिक समर्थन के जरिए लाभ की उम्मीद |
ऊर्जा सुरक्षा और जोखिम प्रबंधन |
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पश्चिम एशिया नीति |
एक पक्ष के साथ निकटता |
सभी पक्षों से संवाद |
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प्राथमिकता |
वैचारिक और कूटनीतिक समर्थन |
राष्ट्रीय हित और आर्थिक सुरक्षा |
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परिणाम |
तेल मूल्य वृद्धि से बड़ा आर्थिक झटका |
संभावित संकट के बीच तैयारी और संतुलन |
निष्कर्ष
हालिया इजरायल-ईरान तनाव ने एक बार फिर भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को लेकर बहस को तेज कर दिया है। जहां 1973 में भारत ने वैचारिक और राजनीतिक समर्थन पर अधिक भरोसा किया था, वहीं वर्तमान दौर में रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा सुरक्षा और बहुपक्षीय कूटनीति को प्राथमिकता दी जा रही है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की यह नीति उसे पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों की बेहतर रक्षा करने में मदद कर रही है।
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