सड़क पर सज़ा: राजस्थान पुलिस का सार्वजनिक जुलूस, आरोपियों के मुंडन करवा कर पहनाई सलवार !
राजस्थान के नागौर ज़िले के मेड़ता शहर में शुक्रवार को एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जो पुलिस की कार्यवाही से ज़्यादा सड़क नाटक जैसा प्रतीत हो रहा था। तीन आरोपियों को सिर मुंडवाकर, महिलाओं की सलवार पहनाकर और "हमसे गलती हुई" का नारा लगवाकर, पूरे शहर में परेड..
जयपुर। राजस्थान के नागौर ज़िले के मेड़ता शहर में शुक्रवार को एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जो पुलिस की कार्यवाही से ज़्यादा सड़क नाटक जैसा प्रतीत हो रहा था। तीन आरोपियों को सिर मुंडवाकर, महिलाओं की सलवार पहनाकर और "हमसे गलती हुई" का नारा लगवाकर, पूरे शहर में परेड करवाई गई।
तीनों आरोपियों पर आरोप है कि उन्होंने लॉटरी जीतने का झांसा देकर एक बुजुर्ग से ₹2 लाख की ठगी की। पुलिस के अनुसार, ये तीनों महिला वेश में बुजुर्ग को यह विश्वास दिलाने पहुंचे थे कि उन्होंने ₹4.5 लाख की लॉटरी जीती है। बुजुर्ग ने यह रकम उधार लेकर दी लेकिन तीनों ठग बाइक से भाग गए। जब पुलिस ने इन्हें पकड़ा, तब भी ये वही सलवार सूट पहने हुए थे, जो वारदात में उपयोग किए गए थे।
इसके बाद पुलिस ने इन तीनों को पकड़े जाने की उसी हालत में महिलाओं की पोशाक, मुंडे हुए सिर और folded hands के साथ बस स्टैंड से स्थानीय अदालत तक पैदल घुमाया। साथ ही, वे बार-बार कहते रहे: "हमसे गलती हुई है।"
यह सिर्फ उनके लिए नहीं बल्कि सभी देखने वालों के लिए एक सार्वजनिक संदेश था..चाहे वो सड़क पर हों, सोशल मीडिया पर या पूरे राज्य में।
पुलिस की रणनीति: "सार्वजनिक शर्मिंदगी" या "कानूनी प्रक्रिया"?
राजस्थान पुलिस ने बीते कुछ समय में संगठित अपराध और ठगी के मामलों में आरोपियों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने की रणनीति अपनाई है।
सूत्रों के अनुसार, इसका उद्देश्य है —
- आरोपियों का मनोबल तोड़ना,
- भावी अपराधियों को चेतावनी देना,
- और आम जनता को यह संदेश देना कि कानून व्यवस्था सख़्त है।
यह पहली बार नहीं है।
जनवरी में झुंझुनूं के गुढ़ागौड़जी में घर पर गोली चलाने के आरोपी युवकों को सिर्फ अंडरवियर में जुलूस की शक्ल में घुमाया गया था।
इन घटनाओं के वीडियो तेजी से वायरल होते हैं और सोशल मीडिया पर कई लोग पुलिस की "साहसिक कार्यवाही" की सराहना करते हैं।
पुलिस का पक्ष: "कोई शर्मिंदगी नहीं, यह प्रक्रिया है"
जब पुलिस अधिकारियों से इस "जुलूस" के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने इसे "सिर्फ कानूनी प्रक्रिया" बताया। उनके अनुसार,
- कभी-कभी आरोपियों को कोर्ट या घटनास्थल पर ले जाना पड़ता है,
- संसाधनों की कमी के कारण यह पैदल किया जाता है,
- इसका उद्देश्य "शर्मिंदा करना" नहीं है।
लेकिन क्या यह कानून के खिलाफ है?
कानूनी विशेषज्ञ और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।
वरिष्ठ वकील नरेश कुमार ने कहा, "किसी आरोपी को कोर्ट के निर्णय से पहले इस तरह सार्वजनिक रूप से अपमानित करना, न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन है। इससे अपराध कम होने की बजाय समाज में गलत संदेश जाता है।"
वे मानते हैं कि यह तरीका
- 'ट्रायल से पहले सज़ा' देने जैसा है,
- आरोपी के मानवाधिकारों का हनन है,
- और कानून की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
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