एकलौते भारत में किस्म किस्म के होली और उसके अनोखे रंग !
<p>अगर आपसे पुछा जाये की भारत में होली का त्योहार कितने प्रकार से मनाते हैं? तो शायद आप का जवाब होगा कि हमने तो सिर्फ दो ही तरीके से सुना हैं। एक तो पानी वाले रंग से और दूसरा तरीका अबीर- गुलाल से | लेकिन आज हम आपको बताएँगे भारत में होली जैसे प्रसिद्ध त्यौहार को कई तरीके से मनाते हैं, जैसे कि रंग, अबीर- गुलाल, फूल, अंगारा की होली, लड्डू या बरसाना (ब्रज) की लट्ठमार होली या फिर पत्थरों से भी होली का पर्व बड़े ही चाव या धूमधाम से मनाया जाता है।</p>
आइए आपको बताते हैं कितनी तरह की होली मनाई जाती हैं और क्यों खास है ब्रज की लट्ठमार होली, कैसी हुई थी इसकी शुरुआत।
ब्रज की होली
दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहां जितने जोश और उमंगों में होली खेली जाती है, वैसा रंग दुनिया में कहीं नहीं देखा जाता। रंगों की होली, गुलाल की होली, लट्ठमार होली, लड्डूमार होली, फूलों की होली, कीचड़ की होली जैसी कई प्रकार की होली खेली जाती है।
ब्रज की होली कई दिनों पहले ही शुरू हो जाती है, यही यहां की परंपरा है दूर-दूर से लोग ब्रज की होली की मस्ती देखने आते हैं। कहते हैं यहां परंपरागत तौर पर सवा महीने की होली होती है।
देश भर से लोग यहां की होली की उमंग और जोश देखने आते हैं। खास तौर पर लोग वृंदावन, बरसाना, नंदगांव और दाऊ दी की होली देखने आते हैं।
फूलों की होली
भारत में कई जगह फूलों की भी होली खेली जाती हैं, जैसे कि गुजरात के द्वारका में, ब्रज क्षेत्र के मथुरा में द्वारकाधीश मन्दिर में भी फूलों की होली खेली जाती हैं।इस तरह के होली में रंग और गुलाल के जगह फूलों के पंखुड़ियों को अलग- अलग करके उसे एक दूसरों पर फेंक कर के होली का त्योंहार मानते हैं।
लड्डूमार होली
बरसाना में होली का आनंद कुछ अलग है, देश में शायद ही कोई होगा जो बरसाने की होली को देखना नहीं चाहता है। यहां होली की शुरुआत लड्डूमार होली से होती है, बरसाने को श्री राधा रानी के जन्म स्थल माना जाता है।मथुरा के वृंदावन और श्री राधारानी के बरसाना में जहाँ एक ओर लट्ठमार होली होती हैं, तो दूसरी ओर बांकेबिहारी मन्दिर में फूलों की होली के साथ ही साथ लड्डू होली भी खेली जाती हैं।
युवतियां और महिलाएं यहां ग्वालों पर लड्डू से प्रहार करती हैं और फाग गाती हैं। होली का ये रंग दूर दूर से आए लोगों को खूब लुभाता है।
लट्ठमार होली
लड्डूूमार होली के बाद यहां लट्ठमार होली होती है, जिसका खास आकर्षण होता है नंदगांव से आए ग्वालों पर बरसाना की ग्वालिनें लट्ठ बरसाकर होली खेलती हैं। हर साल फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को यहां लट्ठमार होली बड़े ही जोश और उमंगों से खेली जाती है। जिसका बकायदा निमंत्रण एक दिन पहले बरसाना से नंदगांव भेजा जाता है।
रंग और गुलाल की होली
जब बात होली की हो रही हो तो बिना रंग और गुलाल की बात न हो तो यह त्योहार अधूरा हैं। जितने भी रूप में होली मनाई जाती हो, उसमें रंग और गुलाल कॉमन हैं।फिर भी इस प्रकार से होली पूरे भारत में एक साथ एक दिन मनाई जाती हैं, जिसमें उत्तर प्रदेश से बिहार और अधिकतर उत्तर भारत में यह रंगों और गुलालों का पर्व हैं, जब कि दक्षिण भारत से मध्य भारत और उत्तर- पूर्वी क्षेत्रों में बड़े ही धूमधाम से इसे मनाते हैं।
अंगारों की होली
शायद ही आपको यकीन हो कि ऐसे भी होली का त्योहार मनाया जाता हैं, जिसमें रंग के जगह जलते हुये अंगारों को प्रयोग में लाया जाता हैं।ऐसी होली राजस्थान के उदयपुर जिले के एक गांव "बलीचा" में ऐसी होली मनाई जाती हैं, यह गांव आदिवासी समुदाय वाला गांव हैं, जहाँ पर आदिवासी समाज होलिका दहन के दूसरे दिन सुबह ऐसी होली खेलते हैं, जिसमें जलते हुए अंगारों पर दौड़ते हुये प्रदर्शन करके अपनी वीरता और साहस का परिचय देते हैं। आज भी होली के पावन अवसर पर अंगारों पर चल कर तथा नाच गाना के साथ इस तरह से होली को मनाते हैं।
पत्थरों वाली होली
इसे ही पत्थरमार होली भी कहते हैं। राजस्थान राज्य के बाड़मेर और जैसलमेर में छोटे- छोटे पत्थरों से एक दूसरे पर मारते हुये होली का पर्व मनाते हैं।होली के दिन कई टोली बनाकर संगीत और ढोल नगाड़ों के साथ एक जगह इकट्ठा हो कर एक दूसरे पर पत्थर फेंकना शुरू कर देते हैं, जिससे कि अगला व्यक्ति बचने के लिये ढाल रूपी पगड़ी पहनकर या भागकर बचाव करते हैं और इस कला का भरपूर आनन्द लेते हैं।मारने के लिए जो पत्थर लेते हैं, वे कंकड़ होते हैं छोटे- छोटे आकर के ताकि उससे किसी को चोट न लगे।
उपलों के राख की होली
राजस्थान के ही डूंगरपुर इलाकों में ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाने वाला गोबर से बने उपले जिसे कंडा भी कहते हैं को जला कर उसका राख बना कर उसे एक दूसरे के ऊपर डाल कर होली का त्योहार मनाते हैं।
क्या है लट्ठमार होली की परंपरा
कहा जाता है कि लट्ठमार होली की ये परंपरा राधारानी और श्रीकृष्ण के समय से चली आ रही है, नटखट कान्हा उस समय अपने सखाओं को साथ लेकर राधा और अन्य गोपियों के साथ होली खेलने और उन्हें सताने के लिए नंदगांव से बरसाना पहुंच जाया करते थे।
परेशान होकर राधारानी और उनकी सखियां कन्हैया और उनके गोप-ग्वालों पर लाठियां बरसाई थीं। लाठियों के वार से बचने के लिए कृष्ण और उनके सखा ढालों प्रयोग करते थे। तब से राधा और कृष्ण के भक्त आज भी उस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। हर साल बरसाने में बड़े स्तर पर लट्ठमार होली का आयोजन किया जाता है।
छड़ी मार होली
गोकुल में लाठी की जगह छड़ी से खोली खेले जाने की अनोखी परंपरा है, छड़ीमार होली के दिन गोपियों के हाथ में लट्ठ के बदले छड़ी होती है। गोपियां होली खेलने आए कान्हाओं पर छड़ी बरसाती हैं। इस दिन एक अनोखे रिवाज का भी पालन किया जाता है, कान्हा की पालकी होती है और उनके पीछे गोपियां सज धज कर हाथों में छड़ी लेकर चलती हैं। यह परंपरा सालों पुरानी है।
धुलेंडी की धूम
होलिका दहन के एक दिन बाद धुलेंडी होती है, इस दिन लोग यहां एक दूसरे को रंग और गुलाल लगाते हैं। मंदिरों में होली का आयोजन होता है, मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर में भी होली का खास आयोजन होता है। धुलेंडी के अगले दिन बलदेव और दाऊजी मंदिर में हुरंगा मनाया जाता है। आसपास के हुरियारे होली खेलने आते हैं और फाग गाते हैं, यह कई घंटों तक चलता है।
इस प्रकार रंगोत्सव वाले इस होली पर्व को भारत के अनेक स्थानों पर अलग- अलग रूपों में होली को मनाया जाता हैं। अधिकतर ऐसे अनोखी होली उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र और राजस्थान के कई हिस्सों में देखने को मिलता हैं।
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