सीएम सरमा का आरोप—गौरव गोगोई ने बच्चों की सहमति के बिना बदला उनका धर्म और नागरिकता
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 9 फरवरी को दावा किया कि कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने अपने नाबालिग बच्चों की सहमति के बिना उनका धर्म और नागरिकता बदल दी। उन्होंने कहा कि इस तरह के फैसले तब तक नहीं लिए जा सकते, जब तक कोई व्यक्ति वयस्कता (18 वर्ष) प्राप्त..
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 9 फरवरी को दावा किया कि कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने अपने नाबालिग बच्चों की सहमति के बिना उनका धर्म और नागरिकता बदल दी। उन्होंने कहा कि इस तरह के फैसले तब तक नहीं लिये जा सकते, जब तक कोई व्यक्ति वयस्कता (18 वर्ष) प्राप्त न कर ले।
चाबुआ में एक प्रेस ब्रीफिंग को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वह यह स्पष्टता पाने के लिए किशोर न्यायालय (जुवेनाइल कोर्ट) में एक मामला दायर करेंगे कि क्या माता-पिता को अपने बच्चों के 18 वर्ष का होने से पहले उनका धर्म या नागरिकता बदलने का अधिकार है।
सरमा ने कहा, “मैं गौरव गोगोई के खिलाफ एक जुवेनाइल केस दायर करूंगा। अगर माता-पिता बिना बच्चों की सहमति के उनकी पहचान बदल सकते हैं, तो सवाल उठता है—क्या संविधान माता-पिता को यह अनुमति देता है कि वे अपने बच्चों का धर्म या नागरिकता वयस्क होने से पहले बदल दें?”
उन्होंने तर्क दिया कि जहां एक वयस्क व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत निर्णय से धर्म या नागरिकता बदलने का अधिकार है, वहीं नाबालिग ऐसे फैसलों को समझने या उनकी सहमति देने की स्थिति में नहीं होते। मुख्यमंत्री ने कहा, “बच्चे छोटे हैं; वे इन बातों को नहीं समझते। गौरव गोगोई को अपने बच्चों के 18 साल के होने तक इंतजार करना चाहिए था, उससे पहले ऐसे बदलाव नहीं करने चाहिए थे।”
सरमा ने आगे कहा कि भारतीय संविधान माता-पिता को एकतरफा तौर पर अपने बच्चों का धर्म या नागरिकता तय करने की अनुमति नहीं देता, क्योंकि ये ऐसे विषय हैं जिन पर व्यक्ति वयस्कता प्राप्त करने के बाद अपनी व्यक्तिगत पसंद से निर्णय लेता है।
उन्होंने जोड़ा, “अगर गौरव गोगोई जुवेनाइल कोर्ट जाते हैं तो मैं इसका स्वागत करता हूं। इससे एक बड़ा विमर्श शुरू होगा और यह तय होगा कि क्या माता-पिता अपने बच्चों की सहमति के बिना उन्हें हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तित कर सकते हैं।”
मुख्यमंत्री के इन बयानों से एक नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है, और आने वाले दिनों में यह मुद्दा कानूनी व संवैधानिक बहस का रूप लेने की संभावना है।
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