प्रकृति की हत्या और हमारा मौन : क्या हम अपनी ही कब्र खोद रहे हैं?
वृक्षों, वनों, जलाशयों, पहाड़ों और जीव-जगत का विनाश और उस पर हमारा मूक समर्थन मानव सभ्यता के आत्मविनाश का सबसे भयावह अध्याय बनता जा रहा..
वृक्षों, वनों, जलाशयों, पहाड़ों और जीव-जगत का विनाश और उस पर हमारा मूक समर्थन मानव सभ्यता के आत्मविनाश का सबसे भयावह अध्याय बनता जा रहा है।
न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका, चौथा स्तम्भ और हम नागरिक.. यदि सभी अपनी ही जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियों को हम ऑक्सीजन नहीं, केवल पश्चाताप की राख ही सौंपेंगे।
फिर न न्यायालय बचेंगे, न संसदें, न मीडिया की बहसें, न वातानुकूलित भवन; क्योंकि जब धरती का तापमान बढ़ेगा, जलाशय सूखेंगे, वायु विषैली होगी और जंगल समाप्त होंगे, तब मानव सभ्यता स्वयं अपने अहंकार के बोझ तले दम तोड़ देगी।
क्या इन चारों स्तंभों को यह ज्ञात नहीं कि वृक्ष केवल लकड़ी नहीं होते, वे वर्षा के निर्माता हैं, प्राणवायु के दाता हैं, पक्षियों के घर हैं, धरती के तापमान के प्रहरी हैं, और मानव जीवन के मौन रक्षक हैं?
क्या पर्वत केवल पत्थर हैं?
क्या नदियाँ और जलाशय केवल भूमि-अधिग्रहण की वस्तुएँ हैं?
क्या विकास का अर्थ केवल कांक्रीट, धूल, धुआँ और जलते हुए शहर हैं?
आज स्थिति यह है कि सामान्य नागरिक की लोकतंत्र में हैसियत प्रायः केवल “मतदाता” तक सीमित होकर रह गई है। उसकी पीड़ा, उसकी हवा, उसका जल, उसकी छाया — सब कुछ विकास के नाम पर कुचल दिया जाता है।
परन्तु प्रश्न यह है कि सर्वशक्तिमान न्यायपालिका मानवता के व्यापक हित में स्वतः संज्ञान लेकर कठोर नीति क्यों नहीं बना सकती?
क्यों नहीं यह अनिवार्य किया जाता कि किसी भी वन, पर्वत, जलाशय अथवा हजारों वृक्षों के विनाश से पूर्व एक स्वतंत्र, सक्षम, निष्पक्ष और पारदर्शी उप-न्यायिक समिति बनाई जाए, जिसमें —
• प्रतिष्ठित पर्यावरणविद्,
• सामाजिक कार्यकर्ता,
• स्थानीय जनप्रतिनिधि,
• चिकित्सा एवं पर्यावरण विज्ञान के विशेषज्ञ,
• इंजीनियर,
• तथा सामान्य नागरिकों के वास्तविक हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग सम्मिलित हों।
यह समिति लाभ-हानि का कठोर ऑडिट करे, स्थानीय जलवायु, भविष्य की पीढ़ियों, भूजल, तापमान, वन्यजीवन और जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का गहन अध्ययन करे; उसके बाद ही न्यायपालिका की सहमति से किसी परियोजना को अनुमति मिले।
और यदि वृक्ष काटना अपरिहार्य हो भी, तो केवल कागजों में नहीं, वास्तविक धरातल पर उन्हें कहीं अन्यत्र प्रत्यारोपित किया जाए साथ ही उतने ही नहीं बल्कि उससे अधिक नर्सरियों में विकसित बड़े वृक्षों का सफल प्रत्यारोपण और वर्षों तक उनका संरक्षण सुनिश्चित किया जाए।
आज आग उगलती कांक्रीट की सड़कें धरती को तवे की तरह तपाने लगी हैं।
सड़कों के दोनों ओर वर्षाजल संरक्षण हेतु नियमित दूरी पर सोकपिट बनाए जाएँ, छायादार वृक्ष लगाए जाएँ, शहरी नियोजन में “ग्रीन कॉरिडोर” अनिवार्य किए जाएँ।
अन्यथा आने वाले वर्षों में शहर “हीट चेम्बर” बन जाएँगे, जहाँ मनुष्य केवल जीवित रहेगा, जीवन नहीं जी पाएगा।
एक अत्यन्त सामान्य पर्यावरण-चिन्तक, पर्यावरण लेखक, गीतापाठी और चिकित्सा विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते मैं चारों स्तंभों और स्वयं सहित प्रत्येक नागरिक से अत्यन्त विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि —
प्रकृति के विनाश में हमारी मुखर, गुप्त, स्वार्थपूर्ण अथवा मूक सहभागिता का सम्पूर्ण हिसाब होता है।
वृक्षों की कटाई केवल पर्यावरणीय अपराध नहीं, यह भविष्य की पीढ़ियों के विरुद्ध किया गया अन्याय है।
जो वृक्ष हमें छाया देते हैं, वर्षा लाते हैं, वायु को शुद्ध करते हैं, उन्हीं को काटकर यदि हम अपने बच्चों के लिए तपता हुआ नरक बना रहे हैं, तो इतिहास हमें कभी क्षमा नहीं करेगा।
धार्मिक दृष्टि से भी यह विषय अत्यन्त गंभीर है।
श्रीमद्भगवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण अनेक स्थलों पर यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि परमात्मा प्रत्येक प्राणी के भीतर स्थित हैं। यदि हम दूसरों को पीड़ा देते हैं, जीवों का आश्रय नष्ट करते हैं, प्रकृति का अपमान करते हैं, तो उसका दुष्परिणाम अवश्य भोगना पड़ता है।
(गीता के सोलहवें अध्याय तथा अठारहवें अध्याय का 61वाँ श्लोक विशेष रूप से विचारणीय है।)
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने स्पष्ट लिखा —
“करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फल चाखा।।“
और —
“काहू न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत कर्म भोग सब भ्राता।।“
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी अब यह स्वीकार करने लगा है कि मनुष्य का अंतर्मन उसके कर्मों का साक्षी होता है।
Man Against Himself के लेखक कार्ल मेनिन्जर ने लिखा है कि व्यक्ति भीतर से जानता है कि वह गलत कर रहा है, और यही आन्तरिक संघर्ष उसे मानसिक तथा शारीरिक रोगों की ओर धकेल सकता है।
सनातन दर्शन तो और भी आगे जाकर कहता है कि व्यक्ति के दुष्कर्मों का प्रभाव केवल उसी तक सीमित नहीं रहता, उसकी छाया आने वाली पीढ़ियों तक जाती है।
विकास आवश्यक है, परन्तु ऐसा विकास नहीं..
जो इन्दौर की बीआरटीएस और मेट्रो जैसी परियोजनाओं की तरह अरबों रुपये खर्च करके अंततः जनधन, समय, पर्यावरण और व्यवस्था — सबका विनाश कर दे।
ऐसा विकास नहीं, जो वृक्षों की हत्या कर शहरों को भट्ठी बना दे।
ऐसा विकास नहीं, जो जलाशयों को मिटाकर भविष्य की प्यास बो दे।
विकास वह है, जिसमें प्रकृति और प्रगति शत्रु नहीं, सहयोगी बनें।
कोई भी स्तम्भ — चाहे वह कितना ही शक्तिशाली, प्रतिष्ठित अथवा संवैधानिक अधिकारों से सम्पन्न क्यों न हो — यदि किसी भी प्रकार के तर्क, प्रक्रिया, तकनीकी आधार, विवशता अथवा औपचारिक बहानों की आड़ लेकर प्रकृति-विनाश की अनुमति देता है अथवा उससे विमुख हो जाता है, तो प्रकृति का न्याय अंततः सबका लेखा-जोखा करता है।
शिव का ताण्डव यह भेद नहीं करता कि कौन सर्वशक्तिमान था, कौन विवश था, कौन मौन था और कौन केवल नियमों की ओट में खड़ा था।
जब वृक्षों का संहार होता है, पर्वतों को चीर दिया जाता है, नदियों और जलाशयों का दम घोंटा जाता है, तब उसका दुष्परिणाम केवल धरती ही नहीं भुगतती, सम्पूर्ण मानव समाज और उसकी आने वाली पीढ़ियाँ भी उसका मूल्य चुकाती हैं।
सनातन दृष्टि स्पष्ट कहती है कि प्रकृति भी चेतना का ही विस्तार है; अतः उसके प्रति किया गया अन्याय निष्फल नहीं जाता।
यह कोई बद्दुआ नहीं, कोई अभिशाप नहीं, बल्कि कर्मफल का अटल सिद्धान्त है — एक ऐसा सत्य, जिसे धर्म भी स्वीकार करता है और आधुनिक विज्ञान भी।
आज पर्यावरण विनाश के परिणामस्वरूप बढ़ती हुई गर्मी, असामान्य वर्षा, सूखा, बाढ़, मानसिक तनाव, श्वसन रोग, कैंसर, नई-नई बीमारियाँ और जल संकट इसी कठोर सत्य के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
मनुष्य चाहे कानून की अदालतों से बच निकले, परन्तु प्रकृति और कर्म का न्याय अत्यन्त सूक्ष्म, मौन और अपरिहार्य होता है।
अन्त में स्व. श्री रामधारीसिंह दिनकर की सुस्पष्ट चेतावनी स्मरण रखनी चाहिए —
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”
आज तटस्थ रहना भी अपराध है।
क्योंकि जब वृक्ष कटते हैं, नदियाँ मरती हैं, पहाड़ टूटते हैं और पक्षियों के घर उजड़ते हैं — तब केवल प्रकृति नहीं मरती, मनुष्यता भी थोड़ी-थोड़ी मरती है।
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