अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने जन्मसिद्ध नागरिकता पर रोक लगाने की ट्रंप की कोशिश को किया खारिज

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा कानूनी झटका देते हुए अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने , उनके उस प्रयास को खारिज कर दिया, जिसके तहत वे अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों को मिलने वाली जन्मसिद्ध नागरिकता (Birthright Citizenship) के अधिकार को सीमित करना चाहते..

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने जन्मसिद्ध नागरिकता पर रोक लगाने की ट्रंप की कोशिश को किया खारिज
01-07-2026 - 11:24 AM

वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा कानूनी झटका देते हुए अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उनके उस प्रयास को खारिज कर दिया, जिसके तहत वे अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों को मिलने वाली जन्मसिद्ध नागरिकता (Birthright Citizenship) के अधिकार को सीमित करना चाहते थे। यह अधिकार लंबे समय से अमेरिकी संविधान और समाज का अभिन्न हिस्सा माना जाता रहा है। अदालत के इस फैसले से ट्रंप की आव्रजन (इमिग्रेशन) पर सख्ती की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक पर रोक लग गई।

सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें ट्रंप के कार्यकारी आदेश (Executive Order) पर रोक लगाई गई थी। यह इस वर्ष दूसरी बार है जब सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की किसी बड़ी नीति को असंवैधानिक ठहराया है। इससे पहले फरवरी में अदालत ने उनके व्यापक वैश्विक टैरिफ (Global Tariffs) संबंधी फैसले को भी रद्द कर दिया था।

ट्रंप के आदेश में क्या था?

ट्रंप ने राष्ट्रपति पद संभालने के पहले ही दिन एक कार्यकारी आदेश जारी किया था। इसके तहत अमेरिकी सरकारी एजेंसियों को निर्देश दिया गया था कि यदि किसी बच्चे के जन्म के समय उसके माता-पिता में से कोई भी अमेरिकी नागरिक या वैध स्थायी निवासी (ग्रीन कार्ड धारक) नहीं है, तो उस बच्चे को अमेरिकी नागरिक के रूप में मान्यता न दी जाए।

इस आदेश को चुनौती देने वालों का कहना था कि यह अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन (14th Amendment) का उल्लंघन करता है। इस संशोधन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अमेरिका में जन्म लेने वाला और अमेरिकी अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) के अधीन आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अमेरिकी नागरिक होगा।

ट्रंप की आव्रजन नीति पर फिर लगा झटका

ट्रंप लंबे समय से कानूनी और अवैध दोनों तरह के प्रवास पर कड़ा रुख अपनाते रहे हैं। सत्ता में लौटने के बाद उन्होंने कई ऐसे कदम उठाए जिनका उद्देश्य अमेरिका में आव्रजन को सीमित करना था। हालांकि उनके आलोचकों ने इन नीतियों को नस्लीय और धार्मिक भेदभाव से प्रेरित बताया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका 4 जुलाई को अपनी स्थापना की 250वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। ऐसे मौके पर अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिकी नागरिक होने का संवैधानिक अधिकार क्या मायने रखता है।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि ट्रंप का आदेश लागू हो जाता तो हर वर्ष अमेरिका में जन्म लेने वाले लगभग 2.5 लाख बच्चों की कानूनी स्थिति प्रभावित हो सकती थी। साथ ही लाखों परिवारों को अपने नवजात बच्चों की नागरिकता साबित करने के लिए अतिरिक्त कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता।

सामूहिक याचिका के जरिए पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट

यह मामला न्यू हैम्पशायर में दायर एक क्लास-एक्शन (Class Action) मुकदमे के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। इसमें उन माता-पिता और बच्चों की ओर से याचिका दायर की गई थी जिनकी नागरिकता ट्रंप के आदेश से प्रभावित हो सकती थी।

अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन की वर्षों से यही व्याख्या की जाती रही है कि अमेरिका में जन्म लेने वाला प्रत्येक बच्चा नागरिक होगा। इसके केवल कुछ सीमित अपवाद हैं, जैसे विदेशी राजनयिकों (Diplomats) के बच्चे या युद्ध के दौरान किसी दुश्मन सेना के कब्जे वाले क्षेत्र में जन्मे बच्चे।

संविधान की सिटिजनशिप क्लॉज (Citizenship Clause) कहती है:

"संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्म लेने वाले या प्राकृतिक रूप से नागरिक बने सभी व्यक्ति, जो अमेरिका के अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं, अमेरिका तथा उस राज्य के नागरिक होंगे जिसमें वे रहते हैं।"

सरकार की अलग व्याख्या

ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि केवल अमेरिका में जन्म लेना नागरिकता पाने के लिए पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार "अमेरिकी अधिकार क्षेत्र के अधीन" होने का अर्थ यह नहीं कि हर जन्म लेने वाला बच्चा स्वतः नागरिक बन जाए।

सरकार का कहना था कि यह अधिकार उन प्रवासियों के बच्चों पर लागू नहीं होना चाहिए जो अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे हैं, या जिनका प्रवास अस्थायी है, जैसे छात्र वीजा, वर्क वीजा या अन्य अस्थायी वीजा पर रहने वाले लोग।

प्रशासन ने यह भी दलील दी कि नागरिकता केवल उन्हीं बच्चों को मिलनी चाहिए जिनके माता-पिता की मुख्य निष्ठा (Primary Allegiance) अमेरिका के प्रति हो। सरकार के अनुसार यह निष्ठा तभी स्थापित होती है जब कोई व्यक्ति अमेरिका में वैध और स्थायी रूप से बसने (Lawful Domicile) के इरादे से रह रहा हो।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में बना इतिहास

जब सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई की, तब ट्रंप इतिहास में पहले ऐसे कार्यरत अमेरिकी राष्ट्रपति बने जिन्होंने स्वयं सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहकर बहस सुनी। हालांकि विरोधी पक्ष के वकील की दलील शुरू होने के कुछ ही समय बाद वे अदालत से बाहर चले गए।

"बर्थ टूरिज्म" को लेकर सरकार की दलील

सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल डी. जॉन सॉयर ने अदालत में कहा कि जन्मसिद्ध नागरिकता की वर्तमान व्यवस्था ने "बर्थ टूरिज्म" जैसे बड़े उद्योग को जन्म दिया है।

उन्होंने दावा किया कि हजारों विदेशी नागरिक केवल इस उद्देश्य से अमेरिका आते हैं ताकि उनके बच्चे अमेरिका में जन्म लें और उन्हें नागरिकता मिल जाए।

हालांकि जब न्यायाधीशों ने उनसे पूछा कि इस समस्या के समर्थन में उनके पास कितने ठोस आंकड़े हैं, तो उन्होंने मुख्य रूप से मीडिया रिपोर्टों का हवाला दिया और स्वीकार किया कि "इसका सही आंकड़ा किसी के पास नहीं है।"

14वें संशोधन का ऐतिहासिक महत्व

अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन वर्ष 1868 में अमेरिकी गृहयुद्ध (1861-1865) के बाद लागू किया गया था। इसका उद्देश्य दास प्रथा समाप्त होने के बाद मुक्त हुए अफ्रीकी मूल के लोगों और उनके बच्चों को नागरिकता प्रदान करना था।

इस संशोधन ने 1857 के उस कुख्यात सुप्रीम कोर्ट फैसले को पलट दिया था जिसमें कहा गया था कि अफ्रीकी मूल के लोग कभी अमेरिकी नागरिक नहीं बन सकते।

सुनवाई के दौरान सरकार ने तर्क दिया कि इस संशोधन का उद्देश्य केवल उन पूर्व दासों और उनके बच्चों को नागरिकता देना था जिनका अमेरिका से स्थायी संबंध पहले से स्थापित था।

1898 का ऐतिहासिक फैसला बना विवाद का केंद्र

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर पहले ही 1898 के प्रसिद्ध मामले "यूनाइटेड स्टेट्स बनाम वोंग किम आर्क (United States v. Wong Kim Ark)" में फैसला दे चुका है।

उस ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि अमेरिका में जन्म लेने वाले विदेशी माता-पिता के बच्चों को भी जन्म के आधार पर अमेरिकी नागरिकता मिलेगी।

हालांकि ट्रंप प्रशासन का कहना था कि उस मामले में वोंग किम आर्क के माता-पिता अमेरिका में स्थायी रूप से रह रहे थे, इसलिए वह फैसला वर्तमान मामले पर लागू नहीं होता।

सुनवाई के दौरान कई न्यायाधीशों ने इस तर्क पर सवाल उठाए। रूढ़िवादी न्यायाधीश नील गोरसच ने सरकार से कहा,

"मुझे नहीं लगता कि आप वोंग किम आर्क के फैसले पर इतना अधिक भरोसा कर सकते हैं।"

ट्रंप लंबे समय से कर रहे थे विरोध

डोनाल्ड ट्रंप वर्षों से जन्मसिद्ध नागरिकता का विरोध करते रहे हैं।

पिछले वर्ष उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा था कि जन्मसिद्ध नागरिकता का उद्देश्य ऐसे लोगों के लिए नहीं था जो केवल छुट्टियां मनाने अमेरिका आएं, बच्चे को जन्म दें और स्थायी नागरिकता हासिल कर लें।

उन्होंने यह भी दावा किया था कि इस व्यवस्था का फायदा ड्रग कार्टेल और अन्य आपराधिक तत्व उठा रहे हैं तथा राजनीतिक शुचिता (Political Correctness) के नाम पर अमेरिका को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

निचली अदालत ने पहले ही लगा दी थी रोक

न्यू हैम्पशायर के यूएस डिस्ट्रिक्ट जज जोसेफ लैपलांट ने जुलाई 2025 में इस मामले को क्लास-एक्शन मुकदमे के रूप में आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी। इसी के साथ ट्रंप की नीति पर पूरे देश में रोक लग गई थी।

हालांकि पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग फैसले में संघीय न्यायाधीशों की देशभर में राष्ट्रपति की नीतियों पर रोक लगाने की शक्तियों को सीमित किया था, लेकिन उस फैसले में ट्रंप के जन्मसिद्ध नागरिकता संबंधी आदेश की वैधता पर कोई निर्णय नहीं दिया गया था।

आव्रजन मामलों में ट्रंप को कई बार मिला समर्थन

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ट्रंप को झटका दिया, लेकिन हाल के महीनों में अदालत की रूढ़िवादी बहुमत वाली पीठ ने कई अन्य आव्रजन मामलों में उनके पक्ष में फैसले दिए हैं।

25 जून को अदालत ने ट्रंप प्रशासन को हजारों हैती और सीरिया के प्रवासियों को मानवीय संरक्षण (Humanitarian Protection) से वंचित करने की अनुमति दी थी। इसी दिन अदालत ने अमेरिकी सरकार के उस अधिकार का भी समर्थन किया था जिसके तहत सीमा पर अत्यधिक दबाव होने पर शरण मांगने वालों (Asylum Seekers) को वापस भेजा जा सकता है।

इसके अलावा अदालत ने कई मामलों में अंतरिम तौर पर ट्रंप प्रशासन को बड़े पैमाने पर निर्वासन (Mass Deportation), कुछ प्रवासियों की मानवीय सुरक्षा समाप्त करने, ऐसे देशों में लोगों को भेजने जहां उनका कोई संबंध नहीं है तथा नस्ल या भाषा के आधार पर आक्रामक आव्रजन छापेमारी जैसी नीतियों को लागू करने की भी अनुमति दी है।

हर मामले में ट्रंप के पक्ष में नहीं रहा सुप्रीम कोर्ट

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा ट्रंप का समर्थन नहीं किया। फरवरी में अदालत ने राष्ट्रीय आपातकाल संबंधी कानून के तहत लगाए गए उनके व्यापक वैश्विक टैरिफ को असंवैधानिक ठहरा दिया था।

इसके अलावा सोमवार को अदालत ने ट्रंप को फेडरल रिजर्व की गवर्नर लिसा कुक को पद से हटाने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया।

मंगलवार को सुनाया गया यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायिक सत्र का अंतिम फैसला था। यह सत्र पिछले वर्ष अक्टूबर में शुरू हुआ था।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।