एक बार फिर चौराहे पर ईरानी महिलाएं..!

ईरानी महिलाओं के लिए यह युद्ध केवल मिसाइलों और सैन्य हमलों तक सीमित नहीं है। यह निगरानी, विस्थापन, भय और उनके शरीर पर लगातार नियंत्रण के खिलाफ भी एक लड़ाई है। जैसे-जैसे ईरान–अमेरिका–इजरायल संघर्ष तेज हो रहा है, ईरान की महिलाएं दोहरे संकट का सामना कर रही हैं, एक ओर युद्ध की तबाही और दूसरी ओर लंबे समय से जारी लैंगिक दमन..

एक बार फिर चौराहे पर ईरानी महिलाएं..!
28-05-2026 - 11:16 AM
28-05-2026 - 11:17 AM

ईरानी महिलाओं के लिए यह युद्ध केवल मिसाइलों और सैन्य हमलों तक सीमित नहीं है। यह निगरानी, विस्थापन, भय और उनके शरीर पर लगातार नियंत्रण के खिलाफ भी एक लड़ाई है। जैसे-जैसे ईरान–अमेरिका–इजरायल संघर्ष तेज हो रहा है, ईरान की महिलाएं दोहरे संकट का सामना कर रही हैं, एक ओर युद्ध की तबाही और दूसरी ओर लंबे समय से जारी लैंगिक दमन।”

चौराहे पर खड़ी ईरानी महिलाएं

Iran की महिलाओं के लिए मौजूदा संघर्ष केवल मिसाइलों और हवाई हमलों का युद्ध नहीं है। यह भय, विस्थापन, निगरानी और गहरी जड़ें जमा चुकी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ रोजमर्रा की जंग भी है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरानी महिलाएं उस संकट का सबसे बड़ा बोझ उठा रही हैं, जिसे उन्होंने पैदा नहीं किया।

ईरान के मुद्दे पर आमतौर पर क्षेत्रीय सुरक्षा, सैन्य गठबंधनों, तेल की कीमतों और भू-राजनीति के संदर्भ में चर्चा होती है। लेकिन, इन सुर्खियों के पीछे एक गंभीर मानवीय त्रासदी छिपी हुई है, जिसका असर लाखों आम लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है। युद्ध ने उन महिलाओं के जीवन में जोखिम और असुरक्षा को और बढ़ा दिया है, जो पहले से ही सामाजिक और कानूनी प्रतिबंधों का सामना कर रही थीं।

ईरानी महिलाओं को लंबे समय से विवाह, तलाक, विरासत, रोजगार, पहनावे और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे क्षेत्रों में भेदभाव का सामना करना पड़ा है। महिलाओं के जीवन पर राज्य का नियंत्रण अनिवार्य हिजाब और “मोरैलिटी पुलिसिंग” से जुड़े कानूनों में साफ दिखाई देता है। इसके बावजूद ईरानी महिलाओं ने हमेशा इन सीमाओं को चुनौती दी है।

Iranian Green Movement से लेकर “व्हाइट वेडनेसडे” अभियानों और वैश्विक नारे “Women, Life, Freedom” तक, ईरानी महिलाओं ने अन्याय के खिलाफ साहस और दृढ़ता के साथ आवाज उठाई है।

महिलाओं का जारी संघर्ष इन असमानताओं को और गहरा करने का खतरा पैदा कर रहा है।

विस्थापन और हिंसा का बढ़ता खतरा

United Nations की रिपोर्टों के अनुसार, नागरिक इलाकों और बुनियादी ढांचे पर हो रहे हमलों के कारण लाखों ईरानी विस्थापित हुए हैं, जिनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे हैं।

महिलाओं के लिए विस्थापन का मतलब केवल घर छोड़ना नहीं है। भीड़भाड़ वाले शरणार्थी शिविरों में रहना, भोजन की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित होना और शोषण, मानव तस्करी तथा लैंगिक हिंसा का अधिक खतरा झेलना इसके सामान्य परिणाम हैं।

बच्चे, विशेष रूप से लड़कियां, भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं। मिनाब में लड़कियों के एक प्राथमिक विद्यालय पर कथित हमले ने युद्ध की भयावह मानवीय कीमत को दुनिया के सामने ला दिया। जबकि युद्ध के दौरान अस्पतालों और स्कूलों को सुरक्षित माना जाना चाहिए, फिर भी नागरिक लगातार हिंसा का शिकार हो रहे हैं।

जब शैक्षणिक संस्थान नष्ट होते हैं, तो लड़कियां केवल शिक्षा ही नहीं खोतीं, बल्कि सुरक्षा और स्थिरता की भावना भी खो देती हैं।

स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट

महिलाओं के सामने एक और गंभीर समस्या स्वास्थ्य सेवाओं के ढहने की है। युद्ध के दौरान आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं, मातृत्व सेवाओं और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और कठिन हो जाती है।

इसके साथ ही ऊर्जा और तेल प्रतिष्ठानों पर लगातार हमलों ने पर्यावरणीय चिंताओं को भी बढ़ा दिया है। हवा और पानी में जहरीले प्रदूषण का महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है। संघर्ष के ये अदृश्य प्रभाव अक्सर युद्ध समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक बने रहते हैं।

राजनीतिक अस्थिरता और महिलाओं की स्वतंत्रता

ईरान के भीतर बढ़ती राजनीतिक अनिश्चितता ने महिलाओं की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। अधिक कट्टरपंथी नेतृत्व की संभावना ने यह आशंका पैदा कर दी है कि भविष्य में महिलाओं पर और कठोर नियंत्रण लगाए जा सकते हैं।

इतिहास गवाह है कि राजनीतिक अस्थिरता के दौर में अधिनायकवादी व्यवस्थाएं अक्सर महिलाओं की स्वतंत्रता पर और ज्यादा प्रतिबंध लगाती हैं। ईरान एक बार फिर उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे सकता है।

संघर्ष के बीच भी जारी है प्रतिरोध

फिर भी युद्ध, सेंसरशिप और निगरानी के बावजूद ईरानी महिलाएं अद्भुत साहस और धैर्य का परिचय दे रही हैं। इंटरनेट बंदी और संचार बाधाओं के बीच भी अनेक महिलाएं नागरिकों की पीड़ा को दर्ज कर रही हैं, राहत नेटवर्क संगठित कर रही हैं और विस्थापित परिवारों की मदद कर रही हैं।

वे केवल संघर्ष की पीड़ित नहीं हैं, बल्कि ईरान के सामाजिक और राजनीतिक भविष्य को आकार देने वाली सक्रिय भागीदार भी हैं।

युद्ध की वास्तविक कीमत केवल सैन्य नुकसान या राजनीतिक परिणामों से नहीं मापी जा सकती। इसे उन आम लोगों के जीवन से समझना होगा, जो अराजकता और विनाश के बीच जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

आज ईरानी महिलाएं दोहरे बोझ का सामना कर रही हैं.. बाहर से युद्ध की हिंसा और भीतर से पितृसत्ता का दबाव। फिर भी तबाही के बीच उनका प्रतिरोध जारी है।

संभव है कि उनका यही साहस भविष्य में न केवल ईरान में महिलाओं के अधिकारों की दिशा तय करे बल्कि स्वयं ईरान के भविष्य को भी आकार दे।

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डॉ. ज्योतिका टेकचंदानी डॉ. ज्योतिका टेकचंदानी अमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़, अमिटी यूनिवर्सिटी, उत्तर प्रदेश में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उनकी रुचि के क्षेत्र विदेश नीति विश्लेषण, भारतीय राजनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध, जेंडर स्टडीज़ और पश्चिम एशियाई राजनीति हैं, विशेष रूप से ईरान पर उनका विशेष ध्यान है।