जब शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं बल्कि मनुष्य निर्माण हो
मैं अखिल भारतीय जैन शिक्षण संस्थान, शाखा इन्दौर में पहुँचा। वहाँ के संस्थापक अध्यक्ष से मेरी पूर्व-नियोजित भेंट थी, इसलिए मुख्यद्वार से सीधे उनके कक्ष की ओर ले जाया जा रहा..
मैं अखिल भारतीय जैन शिक्षण संस्थान, शाखा इन्दौर में पहुँचा। वहाँ के संस्थापक अध्यक्ष से मेरी पूर्व-नियोजित भेंट थी, इसलिए मुख्यद्वार से सीधे उनके कक्ष की ओर ले जाया जा रहा था।
रास्ते में सड़क के दोनों ओर फलों से लदे विशाल, घने एवं छायादार वृक्ष खड़े थे। पक्षियों का मधुर कलरव सुनकर ऐसा अनुभव हो रहा था मानो मैं किसी ऋषि के आश्रम में आ गया हूँ। वातावरण में धीमी किन्तु मधुर नवकार मंत्र की चान्टिंग गूँज रही थी, जो मन-मस्तिष्क में मानो चुपचाप अल्फ़ा वेव्स को बढ़ा रही हो।
भवन में प्रवेश करते ही विद्या और विनय की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की एक सुंदर धवल प्रतिमा दिखाई दी। चंदन और मोगरे की धूप-बत्तियों की सुगंध वातावरण में ऐसी अनुभूति करा रही थी मानो कोई सुगंध-चिकित्सा चल रही हो।
कॉरिडोर में लगी चित्रावली में जैन दर्शन की रत्नत्रयी—सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चारित्र—तथा पंच महाव्रतों को अत्यंत आकर्षक एवं सचित्र रूप में समझाया गया था।
अस्तु, चिकित्सा शिक्षक होने के नाते उन्होंने अत्यंत आत्मीयता, उत्साह और सम्मान के साथ मेरा स्वागत किया।
वास्तव में मुझे ज्ञात हुआ था कि यहाँ से शिक्षित-दीक्षित विद्यार्थियों की देश और विदेश दोनों स्थानों पर विशेष मांग है। कारण यह था कि यहाँ से निकले विद्यार्थी जहाँ-जहाँ कार्यरत थे, वहाँ का समस्त स्टाफ उनके समर्पण, अपनत्व, कार्यनिष्ठा, परस्पर सरोकार, सहयोगी स्वभाव तथा द्वेषरहित व्यवहार के कारण स्वयं को कार्यस्थल पर अधिक ऊर्जावान अनुभव करता था।
इसके अतिरिक्त यह संस्थान-श्रृंखला केवल जैन समाज के विद्यार्थियों के लिए थी। यहाँ विद्यार्थियों को होमवर्क नहीं दिया जाता था। वर्तमान परिस्थितियों की तुलना में शिक्षकों को पर्याप्त वेतन प्रदान किया जाता था। विद्यार्थियों को निजी ट्यूशन अथवा कोचिंग की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।
सप्ताह में दो घंटे प्रत्येक विद्यार्थी की सक्रिय सहभागिता के साथ जैन शास्त्रों, गीता, रामायण तथा वेदों के चयनित श्लोकों पर गुरुकुलों की संवाद-शैली में विमर्श आयोजित किया जाता था।
इसके अतिरिक्त प्रत्येक विद्यार्थी के लिए जूडो-कराटे का प्रशिक्षण अनिवार्य था। किसी-न-किसी खेल में सहभागिता भी आवश्यक थी, जबकि गायन, वादन, लेखन आदि कलाओं का प्रशिक्षण ऐच्छिक रूप से उपलब्ध था।
प्रथम पीरियड जैन प्रार्थना से आरंभ होता था। इसके अंतर्गत दस मिनट अनुलोम-विलोम, कपालभाति, पाँच बार ओंकार का नाद तथा उसके पश्चात लगभग दस मिनट की ऐसी प्रार्थना होती थी, जिसमें ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का सार्वभौम भाव समाहित रहता था।
मुझे जो बात सबसे अधिक प्रभावित कर गई, वह यह थी कि प्रत्येक कक्षा-कक्ष के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा था—
"चरित्र निर्माण कार्यशाला" और उसके नीचे छोटे अक्षरों में—"हम माता सरस्वती के उपासक हैं, अतः हमें माता लक्ष्मी का वरदान भी अवश्य प्राप्त होगा।"
इसी कुतूहलवश मैं संस्थापक से मिलने आया था।
मैंने पूछा—“जैन साहब! ‘चरित्र निर्माण कार्यशाला’ तो समझ में आया कि आप स्वामी विवेकानन्द की परंपरा में विद्यार्थियों के उज्ज्वल चरित्र-निर्माण को प्राथमिकता देते हैं, किन्तु माता लक्ष्मी के वरदान वाली बात को थोड़ा विस्तार से समझना चाहता हूँ।”
वे मुस्कुराए और बोले—“मनोहरजी! पहले चरित्र-निर्माण को समझ लीजिए। हमारे यहाँ कार्य करने वाले सभी व्यक्ति कर्मचारी नहीं, बल्कि इस संस्थान-श्रृंखला के सहभागी हैं। उनका आचरण ही विद्यार्थियों को प्रामाणिकता, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का पाठ अनायास पढ़ाता रहता है।
चाहे वह भृत्य हो, माली हो अथवा शिक्षक—सही अर्थों में सभी आचार्य हैं; अपने आचरण से संस्कारों का हस्तांतरण करने वाले।
दूसरी बात यह है कि प्रत्येक संस्था और कंपनी चाहती है कि उसके यहाँ कार्य करने वाला व्यक्ति पूर्णतः ईमानदार हो। हमारे यहाँ से शिक्षित विद्यार्थी जिस भी संस्थान में जाते हैं, वहाँ के प्रति पूर्ण निष्ठा, प्रामाणिकता और समर्पण के साथ कार्य करते हैं। वे अपने निर्धारित दायित्वों से भी अधिक क्षमता और दक्षता का परिचय देते हैं तथा दूसरों के उत्थान में निःस्वार्थ सहयोग करते हैं।
इन्हीं गुणों के कारण कंपनियाँ हमारे विद्यार्थियों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती हैं।”
मैंने कहा—“जैन साहब! अब मैं समझ गया कि ऐसे चरित्रवान बच्चों की उपेक्षा माता लक्ष्मी भी नहीं कर सकतीं।”
वे हँसते हुए बोले—“मनोहरजी! हमारे बच्चों की कुछ विशेषताएँ ऐसी हैं, जिन पर हमें गर्व है। हमारे संस्कारित विद्यार्थी सपने में भी अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजने का विचार नहीं कर सकते।
हमारे यहाँ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का अक्षरशः पालन होता है और शिक्षक भी पूर्ण निष्ठा से अध्यापन कार्य करते हैं। हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व का स्पष्ट मत है कि शिक्षकों को पर्याप्त सम्मान और उचित मानदेय देकर ही उच्चस्तरीय शिक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।”
मैंने पूछा—“जैन साहब! इतनी कम फीस में आप संस्थान का संचालन कैसे कर लेते हैं?”
वे बोले—“वास्तव में जैन समाज के साधु-भगवंतों की प्रेरणा से देश-विदेश के अनेक जैन भामाशाह उदारतापूर्वक सहयोग प्रदान करते हैं। उन्हीं के कारण हम छात्रावासों में उत्कृष्ट सुविधाएँ उपलब्ध करा पाते हैं तथा शुद्ध शाकाहारी एवं पौष्टिक भोजन भी अत्यंत कम मूल्य पर दे पाते हैं।
इसीलिए हम तहसील स्तर तक अपनी शाखाएँ खोलने की योजना पर कार्य कर रहे हैं। अभी तो हमारी लगभग 800 शाखाएँ हैं, अर्थात् लगभग प्रत्येक जिला मुख्यालय पर एक शाखा।
और हाँ, हमारे पूर्व विद्यार्थी भी संस्थानों को नियमित रूप से सहयोग राशि प्रदान करते हैं। वे कहते हैं कि यह तो संस्कार और विद्यादान के ऋण को चुकाने का एक छोटा-सा प्रयास मात्र है।”
मैंने कहा—“यह तो अद्भुत है, अनुपम है और पूर्णतः अनुकरणीय भी।”
फिर मैंने पूछा—“क्या आपके सभी संस्थानों में छात्रावासों की व्यवस्था भी है?”
उन्होंने उत्तर दिया—“साधु-भगवंतों का स्पष्ट मत है कि छात्रावासों के बिना संस्कारों का गहन बीजारोपण संभव नहीं है।”
मैंने कहा—“जैन साहब! यह बात तो शत-प्रतिशत सत्य है। वैसे आपके संस्थान में प्रवेश के क्या नियम हैं?”
उन्होंने उत्तर दिया—“प्रवेश के लिए कुछ आवश्यक अहर्ताएँ हैं। जैसे—माता-पिता का शुद्ध शाकाहारी होना तथा बच्चे को पंच परमेष्ठी, पंच महाव्रतों के नाम और नवकार मंत्र का ज्ञान होना चाहिए। बस।”
इतने में पत्नी ने मुझे झिंझोड़कर जगा दिया और बोली—“पौने पाँच का अलार्म लगाकर स्वयं तो घोड़े बेचकर सो जाते हो, और मेरी नींद भी खराब कर देते हो!”
मैंने उनींदी आँखों से घड़ी की ओर देखा। सचमुच पौने पाँच बज रहे थे। सामने न कोई जैन शिक्षण संस्थान था, न कोई संस्थापक अध्यक्ष, न नवकार मंत्र की मधुर चान्टिंग, न चरित्र निर्माण कार्यशाला का बोर्ड।
मैं समझ गया कि मैं सपना देख रहा था।
परन्तु कुछ क्षण तक मैं बिस्तर पर बैठा सोचता रहा—क्या सचमुच यह केवल एक सपना था?
देश में हजारों शिक्षण संस्थान हैं, करोड़ों रुपये के परिसरों वाले विद्यालय हैं, वातानुकूलित कक्षाएँ हैं, स्मार्ट बोर्ड हैं, कोचिंग हैं, ट्यूशन हैं, पैकेज हैं, प्लेसमेंट हैं, रैंकिंग हैं और विज्ञापनों की चमक-दमक भी है; परन्तु चरित्र निर्माण कार्यशाला का बोर्ड कहीं दिखाई नहीं देता।
आज अधिकांश विद्यालयों के बाहर मानो अदृश्य रूप से लिखा दिखाई देता है—"यहाँ अंक बढ़ाए जाते हैं।"
परन्तु मैंने स्वप्न में जो बोर्ड देखा था, उस पर लिखा था—"यहाँ मनुष्य बनाए जाते हैं।"
अंतर बस इतना ही था।
फिर मुझे लगा कि संभवतः यह सपना नहीं, एक आवश्यकता थी, जिसे मेरे अवचेतन मन ने स्वप्न का रूप दे दिया था।
और हाँ, यदि कभी ऐसा संस्थान सचमुच बन गया, तो संभव है कि वहाँ से निकले विद्यार्थी केवल सफल कर्मचारी, अधिकारी, उद्योगपति या चिकित्सक ही नहीं बनेंगे, बल्कि ऐसे पुत्र-पुत्रियाँ भी बनेंगे जिनके कारण वृद्धाश्रमों की संख्या घटने लगे।
तब शायद शिक्षा विभाग को नई समस्या का सामना करना पड़े—विद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रतीक्षा सूची तो होगी, पर वृद्धाश्रमों में कमरों की नहीं!
और उस दिन मैं निःसंकोच कह सकूँगा—
"देखो, मेरा सपना सच हो गया।"
एक स्वप्न, जो शायद भारत की शिक्षा का भविष्य बन सकता है
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