असम की मां ने अपने बेटे के साथ जंगली सिवेट शावक को भी पिलाया दूध, 17 साल बाद बेटे ने NCERT की किताब में देखी अपनी ही कहानी
असम के एक परिवार की दया और मानवता की मिसाल अब पूरे देश के छात्रों को प्रेरित कर रही है। करीब 17 साल पहले एक अनाथ जंगली सिवेट (पाम सिवेट) के शावक को अपने बच्चे की तरह पालने वाले सैकिया परिवार को तब बड़ा आश्चर्य हुआ, जब उनके बेटे ने कक्षा 10 की एनसीईआरटी की अंग्रेजी पुस्तक में उसी सिवेट..
नगांव (असम)। असम के एक परिवार की दया और मानवता की मिसाल अब पूरे देश के छात्रों को प्रेरित कर रही है। करीब 17 साल पहले एक अनाथ जंगली सिवेट (पाम सिवेट) के शावक को अपने बच्चे की तरह पालने वाले सैकिया परिवार को तब बड़ा आश्चर्य हुआ, जब उनके बेटे ने कक्षा 10 की एनसीईआरटी की अंग्रेजी पुस्तक में उसी सिवेट और अपने परिवार की कहानी पढ़ी।
यह भावुक कर देने वाली कहानी असम के नगांव जिले के टेटेलीसारा गांव की है, जहां धरनी सैकिया और उनकी पत्नी अंजलि सैकिया ने वर्ष 2009 में एक असहाय सिवेट शावक को नया जीवन दिया था।
नारियल के पेड़ से गिरा था 15 दिन का शावक
करीब 17 साल पहले गांव वालों को नारियल के एक पेड़ के नीचे लगभग 15 दिन का एक पाम सिवेट शावक मिला। वह इतना छोटा था कि अकेले जीवित रहना उसके लिए संभव नहीं था।
ग्रामीण उसे धरनी सैकिया के पास लेकर पहुंचे, जो इलाके में पशु-पक्षियों की देखभाल के लिए जाने जाते थे।
वन्यजीव बचाव केंद्र ने परिवार को सलाह दी कि यदि शावक को जीवित रखना है तो उसे मां का दूध पिलाना होगा।
अंजलि ने अपने छह महीने के बेटे के साथ सिवेट को भी पिलाया दूध
अंजलि सैकिया ने बताया कि जब उनके पति और बड़े बेटे शावक को घर लाए, तो उन्होंने कहा कि शायद उसे दूध की जरूरत है।
उस समय उनका छोटा बेटा गिब्बन सैकिया केवल छह महीने का था।
अंजलि ने बिना किसी झिझक के अपने बेटे के साथ-साथ उस अनाथ सिवेट शावक को भी स्तनपान कराने का फैसला किया।
उन्होंने बताया, "मुझे उस पर दया आ गई थी। मैंने करीब तीन महीने तक अपने बेटे के साथ भकत को भी स्तनपान कराया।" इसी ममता ने उस नन्हे जीव को नया जीवन दिया।
परिवार का सदस्य बन गया था 'भकत'
परिवार ने उस सिवेट शावक का नाम 'भकत' रखा। उसे कभी पिंजरे में नहीं रखा गया। वह पूरे घर और गांव में स्वतंत्र रूप से घूमता था और परिवार के सदस्यों के साथ घुलमिल गया था।
अंजलि बताती हैं, "हमने उसे कभी कैद नहीं किया। वह इंसानों की तरह बिस्कुट और घर का खाना खाता था।"
भकत परिवार के दोनों बेटों के साथ सोता था और जहां भी परिवार के सदस्य जाते, उनके पीछे-पीछे चला जाता था। धीरे-धीरे वह एक पालतू जानवर नहीं बल्कि परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गया।
डॉक्यूमेंट्री फिल्म ने पहुंचाई कहानी दुनिया तक
इस अनोखी कहानी को डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता रोमेल शुनमुगम ने कैमरे में कैद किया। उन्होंने करीब 10 दिनों तक टेटेलीसारा गांव में रहकर भकत और सैकिया परिवार के बीच बने इस अनूठे रिश्ते पर फिल्म बनाई।
फिल्मांकन के बाद परिवार और फिल्म निर्माता का संपर्क धीरे-धीरे समाप्त हो गया और सैकिया परिवार को यह अंदाजा भी नहीं था कि उनकी कहानी भविष्य में देशभर के छात्रों तक पहुंचेगी।
बोर्ड परीक्षा के बाद बेटे ने किताब में देखी अपनी कहानी
वर्षों बाद यह कहानी बेहद अप्रत्याशित तरीके से फिर सामने आई।
कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा पूरी करने के बाद गिब्बन सैकिया अपने घर लौटे। उनके हाथ में एनसीईआरटी की अंग्रेजी वर्कबुक 'Words and Expressions-2' थी।
जब वह पुस्तक के यूनिट-6 को पढ़ रहे थे तो अचानक उनकी नजर एक परिचित तस्वीर पर पड़ी।
तस्वीर में उनके पिता एक सिवेट को गोद में लिए हुए थे।
पूरे अध्याय में भकत की कहानी उसी की नजर से सुनाई गई थी। इसमें बताया गया था कि कैसे गांव वालों ने गिरे हुए शावक को बचाया और धरनी सैकिया के पास पहुंचाया।
हालांकि पुस्तक में धरनी सैकिया का नाम गलती से "धरिनी" लिखा गया है।
पाठ की एक भावुक पंक्ति है—
"अगर वह नहीं होते तो आज मैं जीवित नहीं होता।"
'यह किसी पुरस्कार से भी बड़ा सम्मान है'
धरनी सैकिया ने कहा कि उनकी कल्पना से भी परे था कि भकत की कहानी राष्ट्रीय स्तर की पाठ्यपुस्तक का हिस्सा बन जाएगी।
उन्होंने कहा, "इससे बड़ा संतोष और क्या हो सकता है। यह किसी भी पुरस्कार से बड़ा सम्मान है। हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारा छोटा भकत इतनी बड़ी पहचान हासिल करेगा।"
आखिर क्या हुआ भकत का?
डॉक्यूमेंट्री बनने के लगभग आठ महीने बाद भकत अचानक गायब हो गया। परिवार को आशंका थी कि आसपास पोल्ट्री फार्मों को नुकसान पहुंचने से नाराज कुछ लोगों ने उसे नुकसान पहुंचाया होगा।
इसी दौरान सैकिया परिवार बाढ़ प्रभावित टेटेलीसारा गांव छोड़कर कांपुर कस्बे में रहने चला गया।
हालांकि कुछ समय बाद धरनी सैकिया के बड़े भाई ने बताया कि उन्होंने भकत को एक साथी के साथ गांव में देखा था।
आज भी परिवार के पुश्तैनी घर के आसपास कभी-कभी सिवेट दिखाई देते हैं, लेकिन यह निश्चित रूप से कोई नहीं कह सकता कि वे भकत हैं या उसकी अगली पीढ़ी।
दया और सह-अस्तित्व की मिसाल बनी कहानी
भले ही भकत का अंतिम सफर रहस्य बना हुआ है, लेकिन उसकी कहानी आज हजारों विद्यार्थियों को इंसानों और वन्यजीवों के बीच करुणा, सह-अस्तित्व और संवेदनशीलता का संदेश दे रही है।
सैकिया परिवार के लिए यह अनुभव इस बात का प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से किया गया एक छोटा-सा दयालु कार्य भी समाज पर ऐसा अमिट प्रभाव छोड़ सकता है, जिसकी कल्पना शायद कभी नहीं की जा सकती।
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