मोदी-आरएसएस की तपस्या पर सत्ता का मौजमेला?

काश! भाजपा संगठन से जुड़े लोगों को यह अनुभूति हो कि उन्हें केवल पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव भोगने के लिए नहीं बैठाया गया..

मोदी-आरएसएस की तपस्या पर सत्ता का मौजमेला?
24-05-2026 - 08:10 AM
24-05-2026 - 08:58 AM

काश! भाजपा संगठन से जुड़े लोगों को यह अनुभूति हो कि उन्हें केवल पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव भोगने के लिए नहीं बैठाया गया है।

काश! भाजपा के पार्षदों, विधायकों, मंत्रियों, सांसदों, निगम-मंडलों के अध्यक्षों और सत्ता-सुख में डूबे पदाधिकारियों को यह गहराई से समझ में आए कि वे जिस कुर्सी पर बैठे हैं, वह उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा का चमत्कार भर नहीं, बल्कि वर्षों की वैचारिक तपस्या, लाखों कार्यकर्ताओं के परिश्रम, और कर्मनिष्ठ, यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य समवैचारिक संगठनों की दशकों की साधना का परिणाम है।

आज जिस राजनीतिक छतरी के नीचे बैठकर अनेक लोग सत्ता का सुख, सुरक्षा, सम्मान और प्रभाव प्राप्त कर रहे हैं, उसके निर्माण में अनगिनत कार्यकर्ताओं ने अपना यौवन, परिवार, समय और जीवन खपा दिया। अनेक स्वयंसेवकों ने बिना किसी पद, लाभ या प्रचार की अपेक्षा के गाँव-गाँव, गली-गली संगठन को खड़ा किया। पर दुर्भाग्य यह है कि सत्ता मिलते ही कुछ लोग स्वयं को ही व्यवस्था का केंद्र मान बैठते हैं। जनता से दूरी, कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, अहंकार, अकर्मण्यता और चाटुकारों से घिर जाना — यह प्रवृत्ति किसी भी दल को भीतर से खोखला कर देती है।

यदि जनप्रतिनिधि केवल उद्घाटन, मालाएँ, फोटो और भाषणों तक सीमित रह जाएँ, यदि जनता की समस्याएँ फाइलों और सिफारिशों में दम तोड़ती रहें, यदि संगठन के समर्पित कार्यकर्ता अपमानित और उपेक्षित महसूस करें, तो यह केवल राजनीतिक कमजोरी नहीं, बल्कि उस वैचारिक तपस्या का अपमान है जिसके बल पर सत्ता प्राप्त हुई।

सत्ता सेवा का माध्यम है, व्यक्तिगत वैभव का लाइसेंस नहीं। जनता ने भाजपा को इसलिए समर्थन नहीं दिया कि कुछ लोग वातानुकूलित कमरों में बैठकर अहंकार पालें; जनता ने समर्थन इसलिए दिया क्योंकि उसे विश्वास था कि यह दल राष्ट्रहित, जवाबदेही, अनुशासन और सेवा की संस्कृति को जीवित रखेगा।

भाजपा के जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों को यह स्मरण रखना चाहिए कि जनता बहुत सजग है। वह श्री नरेंद्र मोदी के नाम पर कुछ समय तक सहन कर सकती है, परंतु निरंतर अहंकार, निष्क्रियता और जनविमुखता को अनंतकाल तक स्वीकार नहीं करेगी। जिस दिन कार्यकर्ता का मन टूटता है और जनता का विश्वास डगमगाता है, उसी दिन सबसे मजबूत दिखने वाले राजनीतिक दुर्गों में भी दरारें पड़ना शुरू हो जाती हैं।

अभी भी समय है — पद को अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व समझिए; सत्ता को उपभोग नहीं, सेवा मानिए; और संगठन की तपस्या का सम्मान कीजिए। वरना इतिहास गवाह है कि जनता जितनी तेजी से सिर पर बैठाती है, उतनी ही तेजी से जमीन पर उतार भी देती है।

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डॉक्टर मनोहर भंडारी डॉक्टर मनोहर भंडारी चिकित्सक हैं और वे इंदौर के मेडिकल कॉलेज में अध्यापन करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त वे अपनी पैनी दृष्टि रखते हुए विभिन्न सामाजिक विषयों पर लंबे समय से लेखन कार्य भी करते रहे हैं।