ECI ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, यदि मतदान अधिकारियों को किसी की नागरिकता पर संदेह हो, तो संबंधित अधिकारियों को सूचित करना उनका कर्तव्य है..!
दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर उठे विवादों के बीच चुनाव आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि यदि किसी मतदान अधिकारी को किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह होता है, तो उसे संबंधित अधिकारियों को सूचित करना..
नयी दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर उठे विवादों के बीच चुनाव आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि यदि किसी मतदान अधिकारी को किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह होता है, तो उसे संबंधित अधिकारियों को सूचित करना उनका वैधानिक कर्तव्य है।
यह बयान 26 नवंबर को तृणमूल कांग्रेस सांसद दोला सेन की याचिका के जवाब में दाखिल हलफनामे में दिया गया। याचिका में आयोग द्वारा 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, जिनमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है, में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि आगामी राज्य चुनाव मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर ही कराए जाएँ।
मृत, स्थानांतरित या गैर-नागरिक नाम हटाना आवश्यक: ECI
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, “कोई भी यह नहीं कह सकता कि मौजूदा मतदाता सूची में शामिल ऐसे लोग, जो अब नहीं रहे, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो गए हैं, या जिनका नाम किसी अन्य क्षेत्र में दर्ज है, उन्हें सूची से हटाया न जाए। इसी तरह, यदि कोई ग़ैर-नागरिक गलती से शामिल हो गया है, तो उसे भी हटाया जाना आवश्यक है।”
ECI ने याचिकाकर्ता पर आरोप लगाया कि वह “राजनीतिक स्वार्थ” के लिए इस प्रक्रिया को विवादित बना रहे हैं। आयोग ने कहा कि बिहार में SIR का सफलतापूर्वक पूरा होना दर्शाता है कि बड़े पैमाने पर मताधिकार छीने जाने के आरोप “निराधार” हैं।
ECI: मतदाता की पात्रता परखने का अधिकार हमारे पास
आयोग ने दोहराया कि उसे चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची तैयार करने के सभी पहलुओं पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
नागरिकता की जांच के संबंध में ECI ने कहा..
- उसे मतदाता के पंजीकरण के लिए पात्रता की जाँच करने का अधिकार है।
- इसमें नागरिकता का मूल्यांकन भी शामिल है।
आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR के दौरान नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों की माँग केवल मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के उद्देश्य से की जाती है। हलफनामे में कहा गया कि “SIR का मकसद नागरिकता की स्थिति तय करना नहीं है।”
गृह मंत्रालय के निर्देश का उल्लेख
ECI ने 8 अगस्त 2017 को गृह मंत्रालय द्वारा जारी उस सर्कुलर का हवाला दिया, जिसमें सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें निर्वासन प्रक्रिया में शामिल करने का निर्देश दिया गया था।
हलफनामे में कहा गया, “इसलिए, यदि EROs (एलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) को किसी के नागरिक होने पर संदेह का उचित आधार मिले, तो उन्हें संबंधित प्राधिकरण को इसकी जानकारी देना अनिवार्य है।”
SIR की वैधता पर कई याचिकाएँ लंबित
डोला सेन की याचिका के अलावा सुप्रीम कोर्ट SIR की वैधता को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाओं पर भी सुनवाई कर रहा है।
इनमें ADR (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) की याचिका भी शामिल है, जिसमें बिहार में संशोधन प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की गई है।
बिहार में इस वर्ष SIR के पहले चरण में मतदाताओं की कुल संख्या में लगभग 47 लाख की कमी दर्ज की गई थी। विपक्ष ने आरोप लगाया कि ECI “BJP के साथ मिलकर मतदाता धोखाधड़ी” कर रहा है।
उच्च दबाव, BLO की मौतें और FIR
पिछले सप्ताह ECI ने SIR के दूसरे चरण के लिए 12 राज्यों में फॉर्म जमा करने की अंतिम तिथि बढ़ा दी।
यह कदम उस समय आया जब बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) के बीच अत्यधिक कार्यभार की शिकायतें बढ़ रही थीं और कई मौतों, जिनमें पांच आत्महत्याएँ भी शामिल हैं, की खबरें सामने आईं।
नोएडा और गाज़ियाबाद में कई BLO पर लापरवाही के आरोप में FIR भी दर्ज हुई है।
ECI: मतदाता हटाने का दावा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया
ECI ने कहा कि पश्चिम बंगाल में आखिरी बार SIR 2002 में हुआ था और तब से पात्रता साबित करने वाले दस्तावेजों की संख्या 4 से बढ़कर 13 हो गई है।
आयोग ने कहा कि 99% से अधिक मतदाताओं को प्री-फिल्ड फॉर्म दिए जा चुके हैं, इसलिए बड़े पैमाने पर गलतियाँ या नाम कटने का दावा “बेहद अतिरंजित” है।
मतुआ समुदाय का विरोध और राजनीतिक निष्क्रियता
मतुआ समुदाय के विरोध पर आयोग ने कहा कि SIR को लेकर घबराने की कोई वजह नहीं है और बड़े पैमाने पर भूख हड़ताल की जानकारी आयोग को नहीं है।
ECI ने यह भी बताया कि 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को निर्देश दिया था कि वे ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद दावों-आपत्तियों पर उठाए गए कदमों का स्टेटस रिपोर्ट दें लेकिन केवल कुछ दलों ने ही रिपोर्ट सौंपी।
आयोग ने कहा कि यह दर्शाता है कि अधिकांश राजनीतिक दल “योग्य मतदाताओं के नाम सूची में शामिल कराने में लगभग निष्क्रिय” रहे हैं।
अंत में ECI ने कहा कि बिहार में SIR के खिलाफ कोई अपील दायर नहीं हुई, जो दर्शाता है कि यह पूरी प्रक्रिया “निष्पक्ष रूप से संचालित हुई” और मतदाता इससे संतुष्ट थे।
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