अमेरिका–चीन व्यापार तनाव फिर भड़का: भारत और दुनिया के लिए क्यों है अहम
इस महीने के अंत में होने वाली संभावित अमेरिका–चीन उच्च-स्तरीय व्यापार वार्ता से पहले दोनों देशों के बीच फिर से तनाव बढ़ गया है। चीन ने 9 अक्टूबर को दुर्लभ खनिजों (Rare Earths) और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के निर्यात पर नए नियंत्रण लागू किए, जिसके बाद अमेरिका ने चीन के उत्पादों पर 100% आयात शुल्क लगाने की धमकी..
नयी दिल्ली। इस महीने के अंत में होने वाली संभावित अमेरिका–चीन उच्च-स्तरीय व्यापार वार्ता से पहले दोनों देशों के बीच फिर से तनाव बढ़ गया है। चीन ने 9 अक्टूबर को दुर्लभ खनिजों (Rare Earths) और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के निर्यात पर नए नियंत्रण लागू किए, जिसके बाद अमेरिका ने चीन के उत्पादों पर 100% आयात शुल्क लगाने की धमकी दी। इस घोषणा के बाद अमेरिकी शेयर बाजारों में शुक्रवार को तेज गिरावट देखी गई।
भारत के लिए यह स्थिति खास मायने रखती है, क्योंकि वह इस समय अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है। वहीं, चीन के निर्यात प्रतिबंधों से भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग पर भी सीधा असर पड़ सकता है। वर्तमान में चीन भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत है जबकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य बना हुआ है।
ट्रंप का बयान: “यह नैतिक अपमान है”
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हमें पता चला है कि चीन ने एक अत्यंत आक्रामक रुख अपनाया है। उन्होंने दुनिया को एक शत्रुतापूर्ण पत्र भेजकर कहा है कि 1 नवंबर 2025 से वे लगभग हर उत्पाद पर बड़े पैमाने पर निर्यात नियंत्रण लागू करेंगे, चाहे वे उत्पाद चीन में बने हों या नहीं। यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार के इतिहास में अभूतपूर्व और नैतिक रूप से निंदनीय कदम है।”
ट्रंप ने आगे कहा, “चीन के इस अभूतपूर्व कदम के जवाब में अमेरिका 1 नवंबर 2025 से (या इससे पहले) चीन से आने वाले सभी उत्पादों पर 100% शुल्क लगाएगा, जो वर्तमान दरों के अतिरिक्त होगा। इसके साथ ही हम सभी महत्वपूर्ण सॉफ़्टवेयर पर निर्यात नियंत्रण भी लगाएंगे।”
दुर्लभ खनिजों पर चीन के नियंत्रण से बढ़ेगी महंगाई
पूर्व भारतीय व्यापार सेवा अधिकारी और जीटीआरआई (GTRI) थिंक टैंक के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, बीजिंग का यह निर्यात नियंत्रण कहता है कि यदि किसी उत्पाद में 0.1% से अधिक चीनी दुर्लभ खनिज हैं या वह चीनी तकनीक से निर्मित है, तो उसके निर्यात के लिए चीन की स्वीकृति आवश्यक होगी।
इससे F-35 लड़ाकू विमानों, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के मोटर्स और पवन टरबाइन जैसे उत्पादों पर असर पड़ेगा क्योंकि चीन वैश्विक रेयर-अर्थ रिफाइनिंग क्षमता का 70% नियंत्रित करता है।
श्रीवास्तव ने कहा, “EVs, विंड टरबाइनों और सेमीकंडक्टर पार्ट्स के दाम बढ़ने की संभावना है। अमेरिका अब अपने खनिज आपूर्ति स्रोतों को ‘दोस्ताना देशों’—जैसे ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम और कनाडा—की ओर मोड़ने की कोशिश करेगा, जबकि चीन अपने गैर-पश्चिमी साझेदारों की ओर आपूर्ति को स्थानांतरित कर सकता है। इससे वैकल्पिक औद्योगिक नेटवर्क मजबूत होंगे।”
उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के व्यापार युद्ध से वैश्विक स्तर पर मूल्य वृद्धि (महंगाई) का खतरा है। उन्होंने कहा, “ट्रंप की ‘कड़ा रुख अपनाओ’ नीति उल्टी पड़ सकती है। अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ेंगी और उनकी आर्थिक नीतियों को झटका लगेगा। भारत के लिए सबक यह है कि अमेरिका के साथ कोई भी समझौता अंतिम नहीं होता। 2025 का अमेरिका–चीन ‘फेज वन ट्रेड डील’, जिसने अमेरिकी शुल्क को 30% और चीन के शुल्क को 10% तक सीमित किया था, अब 100% नए शुल्क आदेश से अप्रासंगिक हो गया है। भारत को समान स्तर पर और सावधानी से बातचीत करनी चाहिए, रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए।”
श्रीवास्तव ने आगे कहा, “नयी दिल्ली को महत्वपूर्ण तकनीकों और खनिजों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि भविष्य के व्यापारिक झटकों से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके। साथ ही, भारत को अपनी ‘तटस्थ स्थिति’ का लाभ उठाकर पश्चिमी और BRICS दोनों समूहों से संबंध मजबूत करने चाहिए।”
APEC से पहले चीन की ‘रणनीतिक चाल’
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन द्वारा किए गए ये कदम APEC सम्मेलन में संभावित ट्रंप–शी जिनपिंग बैठक से पहले एक रणनीतिक दबाव बनाने की नीति हो सकते हैं।
जापान स्थित MUFG रिसर्च की एक रिपोर्ट में कहा गया, “चीन ने दुर्लभ खनिजों और अन्य महत्वपूर्ण सामग्रियों पर निर्यात नियंत्रण का दायरा काफी बढ़ाया है, लेकिन इनमें से अधिकांश उपाय नवंबर या दिसंबर से लागू होंगे। इन्हें संभवतः वार्ता में लाभ उठाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।”
रिपोर्ट के अनुसार, “यह कदम वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, भू-राजनीति और अमेरिकी प्रतिक्रिया को गहराई से प्रभावित कर सकता है। अभी बाजारों ने इस प्रभाव को पूरी तरह समझा नहीं है। साथ ही, यह भी अस्पष्ट है कि चीन इन नियंत्रणों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे लागू करेगा।”
क्यों अहम है अमेरिका–चीन व्यापार
व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ रहा है, लेकिन सबसे बड़ा प्रभाव अमेरिका–चीन व्यापार से ही पड़ेगा।
Rhodium Group की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन में घरेलू मांग की कमजोरी वैश्विक व्यापार के लिए चिंता का विषय है। बीते दो दशकों में यह उम्मीद की गई थी कि चीन के औद्योगिक विकास से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में कम लागत वाले उत्पादों की भारी मांग पैदा होगी, लेकिन यह धारणा अब कमजोर पड़ गई है।
रिपोर्ट में कहा गया, “चीन के निर्यात और आयात के बीच का अंतर अब तक का सबसे बड़ा है, जो जर्मनी, जापान या दक्षिण कोरिया के सबसे खराब वर्षों के व्यापार असंतुलन से कई गुना अधिक है। यह असमानता वैश्विक उत्पादन और उपभोग में चीन की अभूतपूर्व पकड़ को दर्शाती है।”
भारत पर असर
रिपोर्ट के अनुसार, चीन के निर्यात ने अमेरिका और पश्चिमी देशों में मध्यम आय वर्ग की नौकरियों
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