आज मनाई जा रही है देवउठनी एकादशी, जानें आज किस समय तक कर सकते हैं पूजा,तुलसी विवाह व पारण

<p>आज देवउठनी एकादशी मनाई जा रही है।इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु योग निद्रा से जागृत होते हैं। इस शुभ अवसर पर तीनों लोकों में भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। देवउठनी एकादशी तिथि से मांगलिक कार्य का शुभारंभ होता है। शास्त्रों में निहित है कि भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी तिथि पर क्षीर सागर में शयन करने चले जाते हैं और देव उठनी एकादशी तिथि पर जागृत होते हैं। धार्मिक मत है कि भगवान विष्णु की पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और मंगल का आगमन होता है। अतः देव उठनी एकादशी पर साधक श्रद्धा भाव से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं।आइए, देवउठनी एकादशी की सही समय, मुहूर्त एवं &nbsp;पारण समय जानते हैं</p>

आज मनाई जा रही है देवउठनी एकादशी, जानें आज किस समय तक कर सकते हैं पूजा,तुलसी विवाह व पारण
23-11-2023 - 12:03 PM
21-04-2026 - 12:04 PM

देवउठनी एकादशी व्रत करने की विधि
यह दिन बहुत ही प्रसन्नता का है क्योंकि आज भगवान विष्णु घर पधारने वाले हैं। चार मास के लम्बे विश्राम के बाद भगवान विष्णु के जागने पर भक्त उनको प्रसन्न करने के लिए पूजन, भजन एवं कीर्तन करते हैं।लोग इस दिन स्नान आदि करके भगवान विष्णु की पूजा का संकल्प लेते  हैं।इस विश्वास के साथ  घर के आंगन में भगवान के चरणों की आकृति बनाते और फल, फूल, मिठाई इत्यादि को एक जगह रखते हैं कि भगवान इसी रास्ते आएंगे। 

देवोत्थान एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु नींद से जागते हैं जिसकी खुशी और स्वागत में सभी देवी-देवता दीप उत्सव मनाते हैं। ऐसे में इस दिन भगवान की विशेष कृपा पाने के लिए अपने घर पर  दीप जरूर जलाएं। देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप और तुलसी का विवाह होता है। ऐसे में दिन तुलसी पूजा का विशेष महत्व हो जाता है।

रात्रि में सपरिवार भगवान का पूजन करें। सायंकाल को ही विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ कर शंख बजाकर भगवान को आमंत्रण दें। इस पूरी रात्रि श्रद्धानुसार भगवान के विभिन्न नामों का जप करें। भगवान का संकीर्तन करें। माता लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए श्री सूक्त का भी पाठ करें। ऐसा करने से भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। एकादशी के दिन खान-पान और व्यवहार में संयम और सात्विकता का पालन करना चाहिए।

देवउठनी एकादशी 2023 के मुहूर्त

कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि का प्रारंभ - 22 नवंबर 2023, रात 11.03
कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि का समापन - 23 नवंबर 2023, रात 09.01
पूजा का समय- सुबह 06.50 से सुबह 08.09
रात्रि पूजा का मुहूर्त- शाम 05.25 से रात 08.46


देवोत्थान एकादशी का पारण मुहूर्त– 
एकादशी के पारण का बहुत महत्व है। इसीलिए इसी शुभ मुहूर्त में पारण करें।
व्रत पारण समय- 24 नवंबर 2023  की सुबह 06.51 से सुबह 08.57 

तुलसी विवाह मुहूर्त 
इस साल तुलसी विवाह 23 नवंबर कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी को होगा।  कई जगहों पर तुलसी विवाह एकादशी के अगले दिन यानी कि द्वादशी के दिन होता है। द्वादशी मंगलवार 23 नवंबर 2023 को है।कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 22 नवंबर को रात 11.03 बजे से शुरू हो रही है। इसका समापन 23 नवंबर की रात 09.01 बजे होगा। एकादशी तिथि पर रात्रि पूजा का मुहूर्त शाम 05.25 से रात 08.46 तक है। अतः इस मुहूर्त में तुलसी विवाह संपन्न कराया जा सकता है । 

तुलसी विवाह
इस एकादशी से कई तरह की धार्मिक परंपराएं जुड़ी हैं। ऐसी ही एक परंपरा है तुलसी-शालिग्राम विवाह की। पुराणों में तुलसी जी को विष्णु प्रिया या हरि प्रिया कहा जाता है। विष्णु जी की पूजा में तुलसी की अहम भूमिका होती है।

तुलसी विवाह विधि
अगर तुलसी विवाह नहीं कर सकते हैं तो तुलसी की सामान्य पूजा भी की जा सकती है। जो इनका विवाह कराते हैं वो व्रत रखते हैं। शाम को तुलसी के पौधे को  दुल्हन की तरह सजाया जाता है और फिर शालिग्रामजी के साथ तुलसी के पौधे को परिणय बंधन में बांधा जाता है।

अगर आपका शालिग्राम जी यानि विष्णु जी की काले पत्थर की मूर्ति न मिले तो आप विष्णु जी की तस्वीर भी रख सकते हैं। शाम के समय सारा परिवार इसी तरह तैयार हो जैसे विवाह समारोह के लिए होते हैं।

तुलसी विवाह के दौरान शाम को तुलसी जी के पौधे को घर के आंगन, पूजास्थल या छत के बीच में रखना चाहिए।
तुलसी विवाह में वे सभी चीजें शामिल करें जो एक विवाह कराने में जरूरी होता है जैसे महंदी, मोली, रोली,धागा, फूल, चंदन, चावल, मिठाई, शगुन की हर चीज पूजन सामग्री के रूप में रखी जाती है।
जिस तरह के विवाह में लाल चुनरी का होना आवश्यक माना जाता है उसी तरह से तुलसी विवाह में लाल चुनरी का प्रयोग होना चाहिए।
विवाह के रिवाज शुरू करने से पहले सुहाग की सारी सामग्री के साथ तुलसी के पौधे पर लाल चुनरी जरूर चढ़ाएं।
जिस प्रकार से किसी शादी समारोह में विवाह मंडप होता है उसी तरह से गन्ने का प्रयोग करके तुलसी विवाह के लिए मंडप सजाना चाहिए।
तुलसी विवाह के दौरान भगवान शालिग्राम को माता तुलसी के पास रखें और पूजा के दौरान इस बात का ध्यान जरूर रखें कि उन पर चावल न चढ़ाएं बल्कि इसकी जगह तिल को अर्पित करें।
तुलसी और शालिग्राम जी के विवाह के दौरान दूध में भीगी हल्दी के साथ दोनों की पूजा करें।
अगर विवाह के समय बोला जाने वाला मंगलाष्टक आप को आता है तो वह अवश्य बोलें।
विवाह के दौरान 11 बार तुलसी जी की परिक्रमा करें।
सूर्यास्त के बाद तुलसी के पास दीपक जलाएं। कर्पूर जलाकर आरती करें।
प्रसाद को मुख्य आहार के साथ ग्रहण करें और उसका वितरण करें।
रात्रि में घरों के बाहर और पूजा स्थल पर दीये जलाए जाते हैं।

तुलसी विवाह पौराणिक कथा
तुलसी (पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था। राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था, बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी। बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था।

वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी। एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगा तो वृंदा ने कहा “स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी, और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प नही छोडूगी।

जलंधर तो युद्ध में चला गया और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी। उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।

सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता। फिर देवता बोले – भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है। भगवान ने जलंधर का रूप धारण कर, वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए।

जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया। उसका सिर वृंदा के महल में जा गिरा। जब वृंदा ने देखा कि उसके पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो उसके सामने खड़े है ये कौन है?

उन्होंने पूछा – आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके, वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।

सभी देवता हाहाकार करने लगे, लक्ष्मी जी रोने लगी और प्रार्थना करने लगे तो वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया। लेकिन भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे, अतः वृंदा के श्राप को जीवित रखने के लिए उन्होंने अपना एक रूप पत्थर रूप में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया।

भगवान विष्णु को दिया श्राप वापस लेने के बाद वृंदा जलंधर के साथ सती हो गई। उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और मैं बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा। यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है। बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं

वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। इसी घटना को याद रखने के लिए प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।