‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ विवाद के बीच आंकड़े: 10 साल में 8,600 से ज्यादा शिकायतें
नयी दिल्ली।
एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के उल्लेख को लेकर गुरुवार सुबह सुप्रीम कोर्ट में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अगुवाई वाली पीठ ने इस संदर्भ पर कड़ा सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद से जवाबदेही तय करने की मांग की। अदालत ने चेतावनी दी, “हमें यह पता लगाना होगा कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है… जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई होगी।” इसके साथ ही कोर्ट ने पूरी किताब पर रोक लगाने का आदेश भी दिया।
विडंबना यह है कि अदालत की इस सख्त नाराज़गी ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोपों से निपटा कैसे जाता है? क्या सिर्फ इस विषय पर चर्चा को ही दबा देना समाधान है?
यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले साल न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास से भारी मात्रा में नकदी मिलने का मामला सामने आया था। जनदबाव के बीच सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यीय समिति गठित की, जिसने उनके महाभियोग की सिफारिश की।
कितनी शिकायतें दर्ज हुईं?
फरवरी 2026 में लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक (2016 से 2025) में सेवारत न्यायाधीशों के खिलाफ 8,600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गईं।
- सबसे ज्यादा शिकायतें 2024 में दर्ज हुईं—1,170
- इसके बाद 2025 में 1,102 शिकायतें
- 2019 में 1,037
- 2022 में 1,012
- सबसे कम शिकायतें 2020 में—518
स्रोत: फरवरी 2026 में लोकसभा में पूछे गए प्रश्न का उत्तर।
न्यायपालिका शिकायतों से कैसे निपटती है?
- भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और किसी भी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ शिकायतें प्राप्त करने का अधिकार है।
- किसी हाई कोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत उस अदालत के मुख्य न्यायाधीश को दी जाती है।
- हाई कोर्ट के न्यायाधीशों और मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ सभी शिकायतों की जांच पहले ‘इन-हाउस मैकेनिज्म’ के तहत की जाती है—जैसा कि जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में हुआ।
- संविधान के अनुच्छेद 235 के अनुसार, जिला और अधीनस्थ अदालतों पर अनुशासनात्मक नियंत्रण संबंधित राज्य के हाई कोर्ट के पास होता है। इसलिए निचली अदालत के किसी न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत राज्य के मुख्य न्यायाधीश द्वारा देखी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, शिकायत मिलने पर मुख्य न्यायाधीश पहले संबंधित न्यायाधीश से जवाब मांगते हैं। यदि जवाब संतोषजनक न हो या मामला गंभीर लगे, तो एक आंतरिक समिति गठित की जाती है।
यदि जांच में आरोप ‘गंभीर प्रकृति’ के पाए जाते हैं—यानी ऐसे जिनमें न्यायाधीश को हटाने की जरूरत हो—तो समिति उनसे इस्तीफा देने को कह सकती है।
न्यायिक भ्रष्टाचार के प्रमुख मामले
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा मामला:
मार्च 2025 में उनके दिल्ली स्थित आवास के बाहरी स्टोररूम में आग लगने के बाद वहां से जली हुई नकदी का बड़ा ढेर बरामद हुआ। अनुमान के मुताबिक रकम 15 करोड़ रुपये तक बताई गई।
न्यायमूर्ति वर्मा ने इस धन से अपना या अपने परिवार का कोई संबंध होने से इनकार किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे न्यायपालिका की साख के लिए गंभीर परीक्षा मानते हुए उन्हें उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्थानांतरित किया और आंतरिक जांच के आदेश दिए। समिति ने महाभियोग की सिफारिश की, जो फिलहाल सरकार के पास लंबित है।
एनसीएलएटी से जुड़ा मामला:
न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा ने अगस्त 2025 में एक मामले से खुद को अलग कर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि उच्च न्यायपालिका के एक वरिष्ठ व्यक्ति ने सुनवाई के नतीजे को प्रभावित करने का दबाव बनाया।
यह मामला बायजू रवींद्रन की कंपनी के खिलाफ दिवालिया याचिका से जुड़ा था, जिसमें बीसीसीआई ने 159 करोड़ रुपये के डिफॉल्ट का दावा किया था।
इस घटना ने न्यायपालिका में प्रभाव, भ्रष्टाचार और पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी।
आरके मित्तल मामला:
2018 में ट्रिब्यूनल जज आरके मित्तल पर दुर्घटना पीड़ितों के मुआवजे के लिए निर्धारित 50 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी से निकासी का आरोप लगा।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जांच की और जुलाई 2019 में सुप्रीम कोर्ट की जांच के बाद उन्हें रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल से बर्खास्त कर दिया गया। मार्च 2025 में उनसे जुड़ी 24
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