पिता की संपत्ति बेचने के मामले में भाई को सुप्रीम कोर्ट से मिली जीत, वसीयत में हिस्सा न होने के बावजूद अदालत ने क्यों दिया फैसला उसके पक्ष में?
दिल्ली में बाल्मीकि गेट के पास स्थित एक पुराने मकान को लेकर वर्षों से चल रहा पारिवारिक विवाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में समाप्त हो गया। अदालत ने अपने फैसले में यह दोहराया कि अचल संपत्ति (immovable property) का स्वामित्व केवल रजिस्टर्ड सेल डीड (Registered Sale Deed) के माध्यम से ही हस्तांतरित हो सकता..
नयी दिल्ली। दिल्ली में बाल्मीकि गेट के पास स्थित एक पुराने मकान को लेकर वर्षों से चल रहा पारिवारिक विवाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में समाप्त हो गया। अदालत ने अपने फैसले में यह दोहराया कि अचल संपत्ति (immovable property) का स्वामित्व केवल रजिस्टर्ड सेल डीड (Registered Sale Deed) के माध्यम से ही हस्तांतरित हो सकता है..
वसीयत (Will), सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) या एग्रीमेंट टू सेल (Agreement to Sell) से नहीं, जब तक कि वे कानूनी रूप से सिद्ध न हों।
मामला क्या था?
1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने सुरेश नामक व्यक्ति की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसने दावा किया था कि उसके दिवंगत पिता ने उसे रजिस्टर्ड वसीयत के माध्यम से घर का एकमात्र मालिक बना दिया था।
सुरेश ने इसके समर्थन में जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA), एग्रीमेंट टू सेल, शपथपत्र (affidavit) और रसीद जैसी कई दस्तावेज भी पेश किए थे।
उसका भाई रमेश, जिसने उसी संपत्ति का आधा हिस्सा किसी अन्य व्यक्ति को बेच दिया था, अदालत में यह साबित करने में सफल रहा कि उसने केवल अपने वैध हिस्से की बिक्री की है।
विवाद की पृष्ठभूमि
सुरेश और रमेश दोनों ने दावा किया था कि उनके पिता की मृत्यु (अप्रैल 1997) के बाद दिल्ली स्थित संपत्ति उन दोनों को विरासत में मिली।
सुरेश ने कहा कि संपत्ति पूरी तरह उसकी है, क्योंकि पिता ने 16 मई 1996 की वसीयत में यह घर उसी के नाम कर दिया था।
उसने यह भी आरोप लगाया कि रमेश वहां सिर्फ लाइसेंसी (Licensee) के रूप में रहता था लेकिन बाद में उसने अनधिकृत रूप से आधा मकान बेच दिया। रमेश ने इन दावों को खारिज किया और कहा कि पिता ने 1973 में मौखिक रूप से उसे यह संपत्ति दे दी थी।
उसने यह भी बताया कि सुरेश ने पहले एक अन्य मामले में पिता के स्वामित्व को स्वीकार किया था, जो बाद में 1997 में वापस ले लिया गया।
पहली सुनवाई में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज ने सुरेश के पक्ष में फैसला दिया और उसके दस्तावेजों को मान्य ठहराया। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा। लेकिन, रमेश ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की — और अंततः शीर्ष अदालत ने निचली दोनों अदालतों के आदेश रद्द कर दिए।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों और कानूनी दलीलों का विश्लेषण करने के बाद कहा, “चूंकि यह संपत्ति मृतक पिता के नाम पर थी इसलिए उनकी मृत्यु के बाद यह सभी क्लास-1 वैधानिक वारिसों (Class-I legal heirs) में समान रूप से विभाजित होगी।”
अदालत ने पाया कि..
- सुरेश द्वारा प्रस्तुत वसीयत को न तो उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63 (Section 63 of Succession Act) और न ही साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 (Section 68 of Evidence Act) के अनुसार साबित किया गया था।
- कोई मान्य सेल डीड भी मौजूद नहीं थी।
इसलिए, संपत्ति को केवल सुरेश की व्यक्तिगत मिल्कियत नहीं माना जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि “केवल रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से ही अचल संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित किया जा सकता है। अप्रमाणित वसीयत, पावर ऑफ अटॉर्नी या एग्रीमेंट टू सेल से किसी को स्वामित्व का अधिकार नहीं मिलता।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि रमेश द्वारा तीसरे पक्ष को बेचा गया हिस्सा केवल उसके कानूनी हिस्से तक ही वैध रहेगा। उससे अधिक हिस्से की बिक्री अवैध मानी जाएगी।
इस आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेश रद्द कर दिए और सुरेश की पूरी याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि संपत्ति सभी वारिसों की संयुक्त संपत्ति बनी रहेगी, जब तक कि कोई वैध बँटवारा या समझौता नहीं हो जाता।
फैसले का कानूनी महत्व
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