चातुर्मास : वैभव का उत्सव या धर्मप्रभावना का अवसर?
कुछ दिनों पूर्व एक व्हाट्सएप संदेश पढ़ने को मिला। उसमें अनुमान व्यक्त किया गया था कि देशभर में श्वेताम्बर जैन साधु-भगवंतों के चातुर्मासों पर इस वर्ष लगभग एक हजार करोड़ रुपये तक का व्यय सम्भावित है। संदेश लिखने वाले की पीड़ा व्यय की राशि..
कुछ दिनों पूर्व एक व्हाट्सएप संदेश पढ़ने को मिला। उसमें अनुमान व्यक्त किया गया था कि देशभर में श्वेताम्बर जैन साधु-भगवंतों के चातुर्मासों पर इस वर्ष लगभग एक हजार करोड़ रुपये तक का व्यय सम्भावित है। संदेश लिखने वाले की पीड़ा व्यय की राशि नहीं थी; उनका प्रश्न था कि क्या धर्मप्रभावना, संस्कार-संवर्धन और आत्मोत्थान के क्षेत्र में उसका प्रतिफल भी उसी अनुपात में दिखाई देता है?
उनकी चिंता यह भी थी कि यदि इस राशि का आधा भाग भी शिक्षा, संस्कार, स्वास्थ्य, छात्रवृत्ति, स्वरोजगार और आर्थिक रूप से संघर्षरत साधर्मियों के उत्थान में लगाया जाए, तो उसका दूरगामी प्रभाव कितना व्यापक हो सकता है।
वर्तमान स्थिति : कुछ गंभीर प्रश्न
क्या धर्मप्रभावना का मूल्यांकन केवल भीड़ और भव्यता से किया जाना चाहिए
सामान्यतः चातुर्मासों में सर्वाधिक व्यय नगर के बाहर से आने वाले यात्रियों और दर्शनार्थियों की भोजन व्यवस्था, आवास, फ्लेक्स, फोटोग्राफी, टेंट, सजावट, प्रचार-प्रसार तथा अन्य व्यवस्थाओं पर होता है। यह सब श्रद्धा से प्रेरित होता है, इसमें कोई संदेह नहीं; परंतु प्रश्न यह है कि क्या श्रद्धा का कम से कम पचास प्रतिशत भाग भविष्य-निर्माण की दिशा में भी प्रवाहित होना चाहिए?
आज नगरीय जैन युवाओं में जैन धर्म की मूल पहचान—नित्य मंदिर जाना, केशर-चन्दन का तिलक लगाना, स्वाध्याय करना, जमीकंद का त्याग, रात्रिभोजन का त्याग तथा शुद्ध शाकाहार—को अपनाने के प्रति रुझान कम होता जा रहा है। यह गहन चिंता का विषय है, क्योंकि निकट भविष्य में वही धर्म के सारथी बनने वाले हैं।
कुछ साधु-भगवंतों और समाज के प्रमुखों को इस बात की भी गंभीर चिंता है कि युवाओं का रुझान बीयर सेवन और मांसाहारी भोजन की ओर बढ़ रहा है। इसी प्रकार यह भी चिंतनीय है कि जब साधु-भगवंत दूरस्थ कॉलोनियों में आहार हेतु जाते हैं, तो बहुत कम परिवारों में सूर्यास्त पूर्व भोजन तैयार होता है। नगरीय विकास के साथ जैन परिवारों का कॉलोनियों में बसना स्वाभाविक है, किंतु धार्मिक आचरणों का क्षीण होना चिंता का विषय है।
विगत वर्षों से एक वास्तविक घटना भी चर्चा में रही है। एक साधु-भगवंत आहार के लिए एक सम्पन्न परिवार के यहाँ गए। वहाँ बने मदिरा-बार को कपड़ों से ढंक दिया गया था। कुछ दिनों बाद जब उन्हें इस तथ्य की जानकारी हुई, तो उन्हें पश्चात्ताप स्वरूप विशेष क्रियाएँ करनी पड़ीं।
क्या चातुर्मासों का सामाजिक ऑडिट होना चाहिए?
मेरे व्यक्तिगत अभिमत में प्रत्येक नगर के विगत चातुर्मासों का ऑडिट किया जाना चाहिए तथा उसकी सूक्ष्म विवेचना भी होनी चाहिए। उस विश्लेषण को साधु-भगवंतों, समाज के वरिष्ठजनों तथा युवा नेतृत्व के समक्ष पुनर्विचार हेतु रखा जाना चाहिए।
यह भी देखा जाना चाहिए कि जिन मदों में व्यय हुआ है, उनमें जैन धर्म के मूल तत्व—अहिंसा एवं भाव-अहिंसा—का कितना सम्मान हुआ। साथ ही यह भी विचारणीय है कि जिन व्यक्तियों अथवा संस्थाओं को इन आयोजनों से व्यावसायिक लाभ हुआ, उनका व्यवसाय कहीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पशु-क्रूरता अथवा हिंसा से तो सम्बद्ध नहीं है।
युवाओं के मन की वास्तविक स्थिति जानना भी आवश्यक
जैन समाज की जनगणना के साथ-साथ निम्न बिंदुओं पर भी पारदर्शी एवं वैज्ञानिक सर्वेक्षण होना चाहिए—
• कितने जैन युवा रात्रिभोजन के त्याग को विज्ञानसम्मत मानते हैं?
• जमीकंद के त्याग की अवधारणा के प्रति उनका दृष्टिकोण क्या है?
• बीयर सेवन को वे किस दृष्टि से देखते हैं?
• क्या वे अण्डों को प्रोटीन के स्रोत के रूप में शाकाहार का हिस्सा मानते हैं?
• जैन धर्म के मूल सिद्धांतों के प्रति उनकी अवधारणा क्या है?
• वे चातुर्मास के किस स्वरूप की कल्पना करते हैं और क्यों?
• रात्रिभोजन तथा जमीकंद सेवन की बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे कौन-कौन से कारण हैं?
वणिक बुद्धि क्या कहती है?
जैन समाज का बड़ा वर्ग व्यापार और उद्यम से जुड़ा रहा है। व्यापार की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह केवल व्यय नहीं देखता, बल्कि दीर्घकालीन प्रतिफल भी देखता है।
यदि हजारों करोड़ रुपये समाज के पास उपलब्ध हैं, तो क्या उनका एक भाग ऐसे स्थायी प्रकल्पों में निवेश नहीं किया जा सकता जो आने वाली पीढ़ियों तक धर्मप्रभावना करते रहें?
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने लगभग तीन हजार करोड़ रुपये की लागत से स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण करवाया। आज वहाँ हजारों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त हो रहा है। परिवहन, पर्यटन, होटल और अनेक व्यवसायों को उससे लाभ मिला है। इसी प्रकार महाकाल लोक ने भी उज्जैन और आसपास के क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति प्रदान की है।
क्या इसी वणिक दृष्टि से जैन समाज को भी चातुर्मासों में व्यय होने वाली विशाल राशि के एक बड़े भाग को ऐसे स्थायी निवेशों में नहीं लगाना चाहिए, जो पीढ़ियों तक समाज और धर्म दोनों की सेवा करें?
शिक्षा, स्वरोजगार, स्वास्थ्य सहायता, प्रतिभा संवर्धन और संस्कार केन्द्रों की स्थापना—क्या ये धर्मप्रभावना के स्थायी स्तंभ नहीं बन सकते?
एक पुरानी भेंट और एक अधूरा संवाद
लगभग पच्चीस-तीस वर्ष पूर्व इसी प्रकार के चिंतन के कारण मुझे एक प्रसिद्ध श्वेताम्बर जैन साधु-भगवंत से मिलने का अवसर मिला।
चिकित्सा शिक्षक होने के कारण भेंट सरलता से हो गई। मैंने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया..,
महाराजश्री को यह प्रश्न अनपेक्षित लगा। उन्होंने पूछा—“क्या आपके घर कोई अतिथि आए तो आप उसे केवल सादी दाल-रोटी खिलाएँगे और उसका मूल्य भी लेंगे?”
मैंने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया—“महाराजश्री! मेरे घर आने वाले अतिथि सांसारिक प्रयोजन से आते हैं, जबकि चातुर्मास में आने वाले यात्री आध्यात्मिक उत्थान के लिए आते हैं। मैंने शास्त्रों में पढ़ा है कि भोजन का ऋण भीष्म पितामह जैसी दिव्य आत्माओं को भी चुकाना पड़ा था।
मेरा विनम्र अभिमत है कि धर्म, साधना और आत्मकल्याण की भावना से आने वाले यात्रियों को अनावश्यक ऋणबोध अथवा कर्मबन्ध के भाव से बचाया जाना चाहिए।
यदि उन्हें सादा, सात्त्विक भोजन उपलब्ध कराया जाए और भोजन की लागत के अनुरूप सहयोग राशि ली जाए, तो इससे सादगी का संदेश भी जाएगा और बची हुई राशि को धर्म तथा समाज के स्थायी कार्यों में लगाया जा सकेगा।
मेरा तो यह भी विश्वास था कि यदि इस प्रकार का शुभारम्भ किसी प्रतिष्ठित साधु-भगवंत के चातुर्मास से हो जाए, तो उसका प्रेरणादायक संदेश पूरे देश में पहुँच सकता है। इसी अपेक्षा से मैं आपके पास आया हूँ।”
मेरी बात सुनने के पश्चात् महाराजश्री अन्य कार्य में व्यस्त हो गए और संवाद आगे नहीं बढ़ सका।
मैं वहाँ से लौट तो आया, परंतु वह प्रश्न आज भी मेरे मन में जीवित है।
आध्यात्मिक यात्रा और राजसी आतिथ्य
मेरे इस निवेदन के पीछे पर्याप्त कारण थे। जैन दर्शन में कर्मबन्ध के सिद्धांत को अत्यंत महत्त्व दिया गया है। वैसे तो श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस तथा भारतीय दर्शन की अनेक धाराओं में भी कर्म और ऋण के विषय में गंभीर चिंतन मिलता है।
चातुर्मास में आने वाले यात्रियों के प्रति समाज की श्रद्धा और सेवा-भावना वास्तव में प्रशंसनीय है। अनेक स्थानों पर प्रत्येक भोजन में अनेक प्रकार की मिठाइयाँ, घी-प्रधान व्यंजन, नमकीन, विविध सब्जियाँ और अनेक पकवान परोसे जाते हैं। यह सब प्रेम और भक्ति से प्रेरित होता है।
किन्तु मेरा प्रश्न कुछ भिन्न है।
भारतीय दर्शन, योगशास्त्र और आयुर्वेद सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि आहार केवल शरीर को ही नहीं, मन को भी प्रभावित करता है। सात्त्विक भोजन मन को शांत और अंतर्मुखी बनाता है, जबकि अत्यधिक स्वादप्रधान एवं भोगप्रधान भोजन मन को बाह्यमुखी बना सकता है। तन्द्रा, आलस्य और विषयासक्ति जैसी प्रवृत्तियाँ भी भोजन से प्रभावित होती हैं।
यदि कोई यात्री किसी त्यागी, तपस्वी और साधना-प्रधान संत के सान्निध्य में आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति की भावना से पहुँचता है, तो क्या उसे सादगीपूर्ण और साधना के अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना अधिक उपयुक्त नहीं होगा?
मेरा विनम्र अभिमत है कि यदि कोई यात्री आत्मचिंतन, साधना और आध्यात्मिक उन्नति के उद्देश्य से चातुर्मास वाले नगर में पहुँचता है तथा उसे बार-बार अत्यंत समृद्ध, स्वादप्रधान और राजसिक भोजन उपलब्ध कराया जाता है, तो यह कहीं न कहीं उसके मूल आध्यात्मिक उद्देश्य से ध्यान भटका सकता है।
साथ ही मेरा यह भी विनम्र अभिमत है कि धर्म, साधना और आत्मकल्याण की भावना से आने वाले यात्रियों को अनावश्यक ऋणबोध अथवा कर्मबन्ध की भावना से यथासंभव बचाया जाना चाहिए, ताकि उनका सम्पूर्ण ध्यान आध्यात्मिक साधना और आत्मोन्नति पर केन्द्रित रह सके।
त्याग, संयम और अपरिग्रह का संदेश देने वाले चातुर्मासों में यदि भोजन और व्यवस्थाओं में भी सादगी का तत्व बढ़े, तो वह स्वयं एक मौन प्रवचन बन सकता है।
धर्मप्रभावना का एक वैकल्पिक मॉडल
कल्पना कीजिए—यदि प्रत्येक बड़े चातुर्मास में यह संकल्प लिया जाए कि कुल व्यय का एक निश्चित प्रतिशत—
• छात्रवृत्तियों के लिए,
• संस्कार केन्द्रों के लिए,
• चिकित्सा सहायता के लिए,
• रोजगार सृजन के लिए,
• आर्थिक रूप से कमजोर साधर्मियों के उत्थान के लिए,
समर्पित किया जाएगा, तो धर्मप्रभावना का स्वरूप कितना व्यापक हो सकता है।
तब चातुर्मास केवल चार माह का धार्मिक आयोजन नहीं रहेगा; वह समाज-निर्माण का राष्ट्रीय अभियान बन सकता है।
विनम्र निवेदन
यह आलेख किसी साधु, संस्था या परंपरा की आलोचना नहीं है। यह केवल एक साधारण श्रावक की जिज्ञासा, चिंता और आत्ममंथन है।
मेरा विनम्र निवेदन है कि श्वेताम्बर जैन समाज के प्रमुखजन, संघ, ट्रस्ट और पूज्य साधु-भगवंत चातुर्मास के वर्तमान स्वरूप पर गंभीरता से विचार करें। यदि व्यय का एक बड़ा भाग शिक्षा, संस्कार, स्वास्थ्य और जीविकोपार्जन जैसे स्थायी निवेशों की ओर मोड़ा जा सके, तो धर्मप्रभावना की गति कई गुना बढ़ सकती है।
संभव है कि फ्लेक्स कुछ दिनों बाद उतर जाएँ, टेंट हट जाएँ, सजावट समाप्त हो जाए; परन्तु शिक्षित, संस्कारित, स्वावलंबी और धर्मनिष्ठ मनुष्य पीढ़ियों तक धर्म की प्रभावना करते रहते हैं।
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