ई-कॉमर्स, कृषि, डाटा स्टोरेज पर केंद्रित भारत-अमेरिका व्यापार समझौता वार्ता
दिल्ली। भारत और अमेरिका ने एक व्यापक व्यापार समझौते के लिए औपचारिक वार्ता शुरू करने के ढांचे पर सहमति व्यक्त की है, जो कृषि, ई-कॉमर्स, डाटा स्टोरेज और महत्वपूर्ण खनिजों सहित 19 प्रमुख क्षेत्रों को कवर करेगा..
नयी दिल्ली। भारत और अमेरिका ने एक व्यापक व्यापार समझौते के लिए औपचारिक वार्ता शुरू करने के ढांचे पर सहमति व्यक्त की है, जो कृषि, ई-कॉमर्स, डाटा स्टोरेज और महत्वपूर्ण खनिजों सहित 19 प्रमुख क्षेत्रों को कवर करेगा। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले से परिचित लोगों ने यह जानकारी दी है।
इस सप्ताह अंतिम रूप दिए गए प्रारंभिक समझौते में एक ऐसा रोडमैप तैयार किया गया है, जो भारत को अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊंचे आयात शुल्कों से बचने में मदद कर सकता है।
अब जिन मुद्दों पर बातचीत शुरू होगी, उनमें शामिल हैं — अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार तक पहुंच, भारत के डाटा स्थानीयकरण (data localisation) नियम, और ई-कॉमर्स में बड़ी टेक कंपनियों की भूमिका — जो भारत में लंबे समय से राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय रहे हैं।
यह घोषणा अमेरिका की उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच 21 अप्रैल को नई दिल्ली में हुई बैठक के बाद आई है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब दोनों देशों के नेताओं ने 2025 की शरद ऋतु तक व्यापार समझौते के पहले चरण को पूरा करने पर सहमति व्यक्त की थी।
गौरतलब है कि अमेरिका ने फिलहाल भारतीय वस्तुओं पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए 26% पारस्परिक शुल्क को अस्थायी रूप से स्थगित कर रखा है, और अंतिम निर्णय इन वार्ताओं के परिणाम पर निर्भर करेगा।
कृषि उत्पादों को लेकर बाज़ार में प्रवेश की मांग इस बातचीत के सबसे विवादास्पद पहलुओं में से एक है। अमेरिका चाहता है कि भारत जैव-संशोधित (genetically modified) फसलें, जैसे कि सोयाबीन और मक्का — जो अमेरिकी निर्यात के प्रमुख उत्पाद हैं — के लिए अपने बाजार में प्रतिबंधों को कम करे। लेकिन भारतीय किसान और नियामक इन फसलों के प्रति कड़ा विरोध जताते रहे हैं।
इसी तरह, अमेज़न, वॉलमार्ट, गूगल और मेटा जैसी वैश्विक टेक कंपनियां भारत के ई-कॉमर्स और डिजिटल नियमों में सुधार की मांग कर रही हैं, जो देश के सख्त खुदरा और डाटा संरक्षण तंत्र को चुनौती देता है।
बातचीत में भ्रष्टाचार-रोधी नियमों, वस्तुओं के मूल प्रमाणन (rules of origin), नियामक प्रक्रियाओं और डिजिटल सेवाओं के नियमों को भी शामिल किया जाएगा। दोनों देश न केवल दंडात्मक शुल्कों से बचने का लक्ष्य रखते हैं, बल्कि 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को मौजूदा 127.6 अरब डॉलर से बढ़ाकर 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने की भी योजना बना रहे हैं।
हालांकि दोनों पक्षों ने पहले चरण की समयसीमा या उसके सटीक ब्योरे का खुलासा नहीं किया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार मंशा स्पष्ट है — ऐसा व्यापार समझौता बनाना जो व्यावसायिक आकांक्षाओं और राजनीतिक यथार्थों के बीच संतुलन साध सके।
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