मेरे साथ विगत अनेक वर्षों से अन्याय हुआ है फिर भी..
मैंने समय-समय पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार, शासन की ढुलमुल पकड़, और जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता पर अनेक तीखे आलेख और सोशल मीडिया पोस्ट लिखे। ऐसे ही एक दिन एक पत्रकार मित्र ने मुझसे पूछा : “इतनी नाराजगी के बाद अगला वोट किसे देंगे?” मेरा उत्तर तत्काल था : “भाजपा को और केवल भाजपा को..
माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय की अवमाननात्मक उपेक्षा, राज्यपाल के नाम और आदेश से जारी आदेश का विभागीय मंत्रीजी की अनुशंसा के बाद भी सवा तीन वर्ष तक पूर्ण पालन न होना, नॉन-क्लिनिकल चिकित्सा शिक्षकों के सातवें वेतनमान के अंतर्गत मूल वेतन निर्धारण का 2017 से आज तक लंबित रहना, यहाँ तक कि मार्च 2023 में माननीय मुख्यमंत्रीजी की अध्यक्षता में लिए गए केबिनेट निर्णय के बाद भी उसका पालन न होना — इन सबने स्वाभाविक रूप से भीतर पीड़ा और आक्रोश उत्पन्न किया है।
इसी पीड़ा के चलते मैंने समय-समय पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार, शासन की ढुलमुल पकड़, और जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता पर अनेक तीखे आलेख और सोशल मीडिया पोस्ट लिखे।
ऐसे ही एक दिन एक पत्रकार मित्र ने मुझसे पूछा : “इतनी नाराजगी के बाद अगला वोट किसे देंगे?”
मेरा उत्तर तत्काल था : “भाजपा को और केवल भाजपा को।”
क्यों?
क्योंकि व्यक्ति विशेष की पीड़ा और राष्ट्रहित के प्रश्न अलग-अलग होते हैं।
मैं भाजपा को वोट क्यों दूँगा?
* क्योंकि भाजपा के शासन में देश सुरक्षित महसूस करता है।
आज भारत विश्व मंच पर झिझकता हुआ राष्ट्र नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरा हुआ राष्ट्र दिखाई देता है।
* क्योंकि भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।
आज दुनिया भारत को केवल बाजार नहीं, बल्कि शक्ति, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक क्षमता के केंद्र के रूप में देखने लगी है।
* क्योंकि देश का नेतृत्व निर्णय लेने से डरता नहीं।
हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भले ही कैम्ब्रिज-ऑक्सफोर्ड की डिग्रियों वाले अर्थशास्त्री न हों, परंतु उनमें निर्णय लेने का साहस है।
वे न “घर में घुसकर मारने” वाली भाषा से बचते हैं, न राष्ट्रीय सम्मान पर समझौता करते हैं।
कम-से-कम विश्व का कोई नेता उन्हें उस प्रकार के अपमानजनक संबोधनों से नहीं पुकारता, जैसी जुर्रत कभी पाकिस्तान के नेताओं ने मनमोहनसिंह को देहाती औरत कह कर की थी।
* क्योंकि डिग्री से अधिक महत्वपूर्ण है समस्या की जड़ पहचानने की क्षमता।
कबीरदासजी औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं थे, फिर भी वे समाज की जड़ों को पहचानते थे।
नेतृत्व का मूल्यांकन केवल डिग्रियों से नहीं, परिणामों से होता है।
* क्योंकि देश की सेना आज अधिक सशक्त और आधुनिक है।
* क्योंकि नक्सलवाद को निर्णायक चुनौती दी गई है।
जो समस्या दशकों तक “असमाधेय” बताई जाती रही, उस पर कठोर कार्रवाई हुई।
* क्योंकि हिंदू समाज अब स्वयं को उपेक्षित नहीं महसूस करता।
* क्योंकि घुसपैठ और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के विरुद्ध कम-से-कम स्पष्ट राजनीतिक स्वर तो सुनाई देता है।
* क्योंकि राम मन्दिर केवल चुनावी नारा नहीं रहा।
भव्य मंदिर निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा ने करोड़ों लोगों की ऐतिहासिक भावनाओं को सम्मान दिया।
* क्योंकि Revocation of Article 370 केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा।
जो दशकों तक “असंभव” कहा गया, वह हुआ।
* क्योंकि योजनाओं में कम-से-कम घोषित स्तर पर धार्मिक भेदभाव नहीं दिखता।
पक्के घर हिंदुओं को भी मिले, मुसलमानों को भी।
उज्ज्वला योजना में भी पात्रता गैस कनेक्शन की थी, धर्म की नहीं।
* क्योंकि 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देना केवल राजनीति नहीं, सामाजिक स्थिरता का प्रश्न भी था।
जब सरकारी गोदामों में अनाज सड़ता था और दूसरी ओर कुपोषण था, तब व्यापक वितरण व्यवस्था बनाई गई।
* क्योंकि स्वच्छ भारत अभियान केवल झाड़ू की फोटो तक सीमित विषय नहीं था।
स्वच्छता, शौचालय और संक्रमण नियंत्रण का सीधा संबंध जनस्वास्थ्य और महिलाओं की गरिमा से है।
* क्योंकि “Vocal for Local” जैसी अवधारणाओं ने स्थानीय उत्पादन को चर्चा में लाया।
* क्योंकि नेतृत्व कम-से-कम प्रतीकात्मक रूप से सादगी, अनुशासन और भारतीयता प्रदर्शित करने का प्रयास करता दिखाई देता है।
परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि सब कुछ आदर्श है
यहीं सबसे बड़ी समस्या प्रारंभ होती है।
देश स्तर पर मजबूत नेतृत्व के बावजूद कुछ राज्यों में प्रशासनिक पकड़ अत्यंत कमजोर दिखाई देती है।
ऐसा प्रतीत होता है कि..
• मंत्री की अनुशंसा,
• मुख्यमंत्री की घोषणा और अनुशंसा,
• यहाँ तक कि न्यायालय के आदेश भी
कई बार नौकरशाही की फाइलों में दम तोड़ देते हैं।
मेरे जैसे अनेक लोग इस प्रशासनिक अकर्मण्यता और भ्रष्ट तंत्र के कारण वर्षों से पीड़ित हैं।
भाजपा संगठन को आत्ममंथन करना ही होगा
यदि संगठन का समर्पित कार्यकर्ता, शिक्षक, कर्मचारी, समर्थक और वैचारिक व्यक्ति ही लगातार उपेक्षित अनुभव करेगा, तो यह स्थिति दीर्घकाल में घातक हो सकती है।
सिर्फ चुनाव जीत लेना पर्याप्त नहीं होता।
सत्ता को संगठन की तपस्या का सम्मान करना ही पड़ता है।
कांग्रेस को वोट क्यों दूँ?
यह प्रश्न भी लोग पूछते हैं।
क्या उस दल को वोट दूँ :
• जिसने दशकों तक तुष्टीकरण की राजनीति की?
• जिसने राम मंदिर का विरोध किया?
• जिसके नेताओं की भाषा कई बार प्रधानमंत्री पद की गरिमा के प्रतिकूल दिखाई देती है?
• जो राष्ट्रवाद और सनातन के प्रश्न पर स्पष्ट नहीं दिखती?
मैं वैचारिक रूप से उस दिशा में स्वयं को खड़ा नहीं पाता।
इसलिए मेरा निष्कर्ष स्पष्ट है
हाँ, मैं आहत हूँ।
हाँ, मेरे साथ अन्याय हुआ है।
हाँ, मैं भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं पर लिखता रहूँगा।
हाँ, मैं संगठन को जगाने का प्रयास भी करता रहूँगा।
परंतु —राष्ट्रहित, सांस्कृतिक अस्मिता, सुरक्षा, निर्णायक नेतृत्व और भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा के प्रश्न पर मैं आज भी भाजपा के साथ खड़ा हूँ।
अतः —
वोट भी भाजपा को दूँगा
और प्रचार भी भाजपा का ही करूँगा।
क्योंकि आलोचना शत्रुता नहीं होती।
कभी-कभी कटु शब्द भी उसी व्यक्ति के होते हैं, जिसे अभी भी आशा होती है।
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