सर गंगाराम: वह भारतीय इंजीनियर जिन्हें पाकिस्तान आज भी श्रद्धा से याद करता है
सर गंगाराम, एक सिविल इंजीनियर और समाजसेवी, उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में से एक हैं जिनकी विरासत भारत-पाकिस्तान सीमा से परे तक फैली हुई है। उनका योगदान दिल्ली और लाहौर, दोनों ही शहरों में स्पष्ट रूप से..
सर गंगाराम, एक सिविल इंजीनियर और समाजसेवी, उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में से एक हैं जिनकी विरासत भारत-पाकिस्तान सीमा से परे तक फैली हुई है। उनका योगदान दिल्ली और लाहौर, दोनों ही शहरों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
जहां अधिकांश लोग दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल से परिचित हैं, वहीं बहुत कम लोग जानते हैं कि लाहौर में भी एक ऐसा ही अस्पताल है जिसे 1921 में सर गंगाराम ने बनवाया था, यानी दिल्ली वाले अस्पताल से 30 साल पहले। आज भी यह अस्पताल लाहौर में हर दिन हजारों मरीजों का इलाज करता है।
लाहौर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका
इतिहास और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध लाहौर शहर में आज भी सर गंगाराम जैसे महान लोगों के योगदान के निशान मौजूद हैं।
उन्होंने न केवल शहर का आधुनिकीकरण किया बल्कि एक नई वास्तुशैली को जन्म दिया।
उत्कृष्ट इंजीनियर और कुशल कृषक
सर गंगाराम एक सक्षम कृषक भी थे।
उन्होंने हज़ारों एकड़ बंजर ज़मीन को उपजाऊ खेतों में बदला, वो भी इंजीनियरिंग कौशल और आधुनिक सिंचाई प्रणाली का उपयोग कर।
उन्हें लाहौर में निम्नलिखित महत्वपूर्ण भवनों और संस्थानों के निर्माण का श्रेय जाता है:
- लाहौर हाई कोर्ट
- लाहौर म्यूज़ियम
- एचिसन कॉलेज
- जनरल पोस्ट ऑफिस
- कैथेड्रल चर्च
- मायो स्कूल ऑफ़ आर्ट्स (अब नेशनल कॉलेज ऑफ आर्ट्स - NCA)
- गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी का केमिस्ट्री विभाग
- मायो अस्पताल का अल्बर्ट विक्टर विंग
- हैली कॉलेज ऑफ कॉमर्स
- रावी रोड हाउस फॉर डिसएबल्ड
- गंगाराम ट्रस्ट बिल्डिंग
- लेडी मेनार्ड इंडस्ट्रियल स्कूल
इसके अलावा, उन्होंने सर गंगाराम अस्पताल, लेडी मैकलागन स्कूल और रेनाला खुर्द पावर हाउस भी बनवाया।
उन्होंने मॉडल टाउन जैसी उच्चवर्गीय कॉलोनी की योजना बनाई और लाहौर को नई जल शोधन प्रणाली भी दी। उन्होंने पठानकोट से अमृतसर तक रेलवे लाइन भी बनवाई।
उनके 12 वर्षों के कार्यकाल में लाहौर में हुए निर्माण को ही "गंगाराम युग की वास्तुकला" कहा गया।
गंगाराम ट्रस्ट की स्थापना
वे केवल एक प्रतिभाशाली इंजीनियर ही नहीं थे, बल्कि जन सेवा के प्रति अत्यंत समर्पित भी थे।
सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से उन्होंने 1923 में ‘गंगाराम ट्रस्ट’ की स्थापना की।
इस ट्रस्ट ने लाहौर के केंद्र में सर गंगाराम चैरिटेबल अस्पताल की नींव रखी, जो बाद में एक आधुनिक अस्पताल बन गया। इसी प्रेरणा से दिल्ली में भी सर गंगाराम अस्पताल की स्थापना हुई। आज दोनों अस्पताल अपने-अपने देशों में विश्वसनीय चिकित्सा संस्थान हैं।
हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक मतभेद रहे हैं, लाहौर के लोग आज भी सर गंगाराम को गहरे सम्मान और स्नेह से याद करते हैं।
इंजीनियर से अग्रणी कृषक तक का सफर
सर गंगाराम अग्रवाल का जन्म 13 अप्रैल 1851 को मंगटनवाला गांव (अब पाकिस्तान में) हुआ था।
उनके पिता दौलत राम अग्रवाल पहले स्थानीय पुलिस थाने में जूनियर सब-इंस्पेक्टर थे और बाद में अमृतसर में कोर्ट कॉपीस्ट बने।
गंगाराम ने गवर्नमेंट हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की और 1869 में गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में प्रवेश लिया।
1871 में उन्हें रुड़की के थॉमसन सिविल इंजीनियरिंग कॉलेज (अब IIT Roorkee) में छात्रवृत्ति मिली और 1873 में स्वर्ण पदक के साथ स्नातक हुए।
इसके बाद वे सहायक अभियंता (Assistant Engineer) बने और दिल्ली में इंपीरियल असेंबली भवन के निर्माण में सहयोग दिया। कुछ समय उन्होंने पंजाब के PWD (लोक निर्माण विभाग) में सेवा दी, फिर कृषि की ओर रुख किया।
उन्होंने मोंटगोमरी जिले (अब फैसलाबाद) में 50,000 एकड़ बंजर ज़मीन को उपजाऊ खेतों में बदला।
उन्होंने इसके लिए हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट और 1,000 मील लंबी नहर बनाई। यह अपने समय की सबसे बड़ी निजी परियोजना थी – अभूतपूर्व और देश में अद्वितीय।
उन्होंने इससे करोड़ों कमाए, लेकिन अधिकांश दान कर दिए। पंजाब के गवर्नर सर मैल्कम हेले ने उनके बारे में कहा था, “वो एक नायक की तरह जिए और संत की तरह दान किया।”
दिल्ली में परिवार लेकिन लाहौर में विरासत
10 जुलाई 1927 को सर गंगाराम का लंदन में निधन हो गया। 1947 के विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया लेकिन लाहौर से उनकी विरासत जुड़ी ही रही।
सआदत हसन मंटो की कहानी ‘हार’ (The Garland) में एक घटना का उल्लेख है, जिसमें भीड़ ने उनका पुतला तोड़ने की कोशिश की लेकिन एक घायल व्यक्ति को इलाज के लिए उन्हीं के अस्पताल में ले गए। ब्रिटिश सरकार ने उनके सामाजिक कार्यों को देखते हुए उन्हें ‘सर’ की उपाधि दी थी।
गंगाराम हवेली: विरासत आज भी जीवित
लाहौर के गुलबर्ग इलाके में स्थित सर गंगाराम की हवेली, जो वर्षों से खंडहर बन चुकी थी, को हाल ही में फिर से बहाल किया गया। साल 2024 जून में यह काम पूरा हुआ। इस कार्य का नेतृत्व व्यवसायी और आर्किटेक्ट फराज़ ज़ैदी ने किया।
जैदी ने बताया कि "लोगों को नहीं पता था कि लाहौर के बीचों-बीच ऐसा कोई ऐतिहासिक स्थान मौजूद है। एक दिन मुझे भारत से परुल दत्ता का कॉल आया — जो गंगाराम की पड़पोती हैं। उन्होंने धन्यवाद देते हुए बताया कि वे इस घर की 20 वर्षों से खोज कर रही थीं। बाद में वह अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ लाहौर आईं और हमारे साथ 5 दिन रहीं। यह देखकर बहुत खुशी हुई कि सरहद के उस पार भी लोग हमारे काम की सराहना कर रहे हैं।"
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