ईरान में प्रतिबंधों का असर, भारत के बासमती कारोबार पर असर; 2,000 करोड़ रुपये की खेप बंदरगाहों पर फंसी
ईरान को प्रीमियम बासमती चावल के निर्यात में एक बार फिर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। तेहरान सरकार द्वारा खाद्य आयात पर दी जा रही सब्सिडी वापस लेने के बाद भारतीय निर्यातकों ने अपनी खेपें रोक दी..
नयी दिल्ली। ईरान को प्रीमियम बासमती चावल के निर्यात में एक बार फिर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। तेहरान सरकार द्वारा खाद्य आयात पर दी जा रही सब्सिडी वापस लेने के बाद भारतीय निर्यातकों ने अपनी खेपें रोक दी हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कम से कम 2,000 करोड़ रुपये मूल्य की बासमती चावल की खेपें फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों पर ईरान भेजे जाने की मंजूरी का इंतजार कर रही हैं।
इस व्यवधान का सबसे ज्यादा असर पंजाब और हरियाणा पर पड़ा है, जो भारत के प्रमुख बासमती उत्पादक राज्य हैं। यहां के किसान, मिलर और प्रोसेसर इस संकट से सीधे प्रभावित हो रहे हैं।
रियाल में भारी गिरावट, सब्सिडी खत्म
ताजा झटका अमेरिकी प्रतिबंधों के और सख्त होने के बाद ईरानी मुद्रा रियाल में आई तेज गिरावट के कारण लगा है। डॉलर के मुकाबले रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। इसके चलते ईरानी सरकार ने खाद्य आयात के लिए दी जा रही सब्सिडी वाली विनिमय दर को बंद कर दिया है।
पंजाब राइस मिलर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रणजीत सिंह जोस्सन ने कहा, “अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ईरानी रियाल में भारी गिरावट आई है और यह रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। इसके कारण ईरानी सरकार ने खाद्य आयात पर वर्षों से दी जा रही सब्सिडी को जारी रखने से इनकार कर दिया है। इससे निर्यातक कारोबार जारी रखने में हिचकिचा रहे हैं।”
पहले ही बंद हो चुका है बार्टर रास्ता
ईरान के साथ व्यापार पहले प्रतिबंधों के चलते बैंकिंग चैनल बाधित होने के बाद बार्टर (वस्तु-विनिमय) व्यवस्था के जरिए किया जा रहा था। यह व्यवस्था तब खत्म हो गई, जब भारत ने ईरान से कच्चे तेल का आयात बंद कर दिया।
रणजीत सिंह जोस्सन ने कहा, “इसके बावजूद ईरान भारत से चाय, बासमती चावल और दवाइयों जैसे खाद्य उत्पादों का आयात करता रहा, लेकिन अब ऐसा लगता है कि इन आयातों पर भी रोक लगाई जा रही है।”
भारतीय बासमती के लिए ईरान क्यों अहम
ईरान भारतीय बासमती चावल के सबसे बड़े खरीदारों में से एक रहा है। वह हर साल करीब 12 लाख टन बासमती चावल का आयात करता है, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 12,000 करोड़ रुपये है। इनमें से करीब 40 प्रतिशत आपूर्ति पंजाब और हरियाणा से होती है, जिससे यह बाजार इन राज्यों के मिलरों और निर्यातकों के लिए बेहद अहम बन जाता है।
लंबे समय से बनी अनिश्चितता का असर अब इस सेक्टर पर दिखने लगा है। चावल मिलरों का कहना है कि प्रोसेस्ड बासमती किस्मों की कीमतों में 3 से 4 रुपये प्रति किलो तक की गिरावट आ चुकी है। यदि यह संकट लंबे समय तक जारी रहा, तो किसानों को मिलने वाली कीमतें भी कमजोर पड़ सकती हैं।
विनिमय दर के झटके से व्यापार चक्र बिगड़ा
ईरान-इज़रायल संघर्ष से पहले अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ईरानी रियाल की विनिमय दर करीब 90,000 रियाल प्रति डॉलर थी। अब यह कमजोर होकर लगभग 1,50,000 रियाल प्रति डॉलर तक पहुंच गई है, जिससे आयात लागत काफी बढ़ गई है। पहले ईरान खाद्य आयात के लिए 28,500 रियाल प्रति डॉलर की रियायती दर देता था, लेकिन यह सुविधा अब समाप्त कर दी गई है।
आमतौर पर ईरान 21 जून के आसपास, जब उसकी घरेलू फसल बाजार में आती है, तो विदेशों से आयात रोक देता है और सितंबर में दोबारा खरीद शुरू करता है। इस अंतराल के दौरान भारतीय निर्यातक भंडारण तैयार करते हैं। मौजूदा रोक ने इस पूरे व्यापार चक्र को बाधित कर दिया है और आगामी खरीद सीजन से पहले मिलरों के नकदी प्रवाह पर दबाव बढ़ा दिया है।
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