योग दिवस (21 जून) पर विशेष आलेखः कहीं जीवनशैली जनित रोगों और हृदयाघातों का मूल कारण सांस लेने का गलत ढंग तो नहीं..?
आयुर्वेद की स्वास्थ्य विषयक परिभाषा के अनुसार चिंतन करें तो प्रसन्न तन, मन और आत्मा अर्थात् पूर्ण स्वास्थ्य के लिए हमारे स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System) के दोनों भागों - सिंपैथेटिक (Sympathetic) और पैरासिंपैथेटिक (Parasympathetic) तंत्रिका तंत्र - का संतुलित होना आवश्यक है..
आयुर्वेद की स्वास्थ्य विषयक परिभाषा के अनुसार चिंतन करें तो प्रसन्न तन, मन और आत्मा अर्थात् पूर्ण स्वास्थ्य के लिए हमारे स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System) के दोनों भागों - सिंपैथेटिक (Sympathetic) और पैरासिंपैथेटिक (Parasympathetic) तंत्रिका तंत्र - का संतुलित होना आवश्यक है। इन दोनों का पूर्ण संतुलन ही वास्तविक स्वास्थ्य है I
आपाधापी, गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भरी जीवन शैली ने संतुलन को नष्ट-सा कर दिया है:
जब तक हमने अपनी परम्परागत और नैसर्गिक आंतरिक बुद्धिमत्ता का अनुसरण किया, तब तक हम कमोबेश स्वस्थ ही थे । धीरे-धीरे बाजारवाद, विज्ञापनों और ऐसे अनेक लोगों के प्रभाव या बहकावे में, जो भारतीय संस्कृति (जिसे निष्पक्ष दृष्टि से हम मानवतावादी और विश्व बंधुत्व की संस्कृति निरूपित कर सकते हैं) के छद्म रूप से शत्रु हैं परन्तु मित्रता के मुखौटों में, जिन्होंने हमारी सभी प्रकार की नैसर्गिक बुद्धिमत्ता, वैज्ञानिकता और स्वविवेक को पूरी तरह से नष्ट कर दिया अथवा हमारे भीतर उनके प्रति उपेक्षा का भाव भर दिया। इसके परिणामस्वरूप, हम लगभग पूरी तरह से सिंपैथेटिक तंत्रिका तंत्र की चपेट में आ गए हैं ।
हमारा जीवन लगभग चौबीसों घंटे 'लड़ो या भागो' (Fight or Flight) की स्थिति, तनाव, गलाकाट प्रतिस्पर्धा में बीतने लगा । दूसरे के भीतर भी परमात्मा का जो सनातन बोध था, उसके विपरीत, यदि दूसरे के अत्यधिक अनिष्ट से स्वयं का तनिक भी लाभ हो तो उसे भी हमने अपना लिया I मैं, मेरा, मेरे और "हाय पैसा, हाय पैसा" हमारा लक्ष्य हो गया, जिसके चलते रिश्ते और सामाजिकता, तथा निष्कपटता अदृश्य-सी हो गई । हमारा पूरा जीवन ही मानो सिंपैथेटिक तंत्रिका तंत्र द्वारा गवर्न (संचालित) हो गया। यहाँ तक कि साँस भी जो नैसर्गिक रूप से पैरासिंपैथेटिक थी, वह भी उथली और सिंपैथेटिक हो गई ।
परम्परागत मूल्यों और भोजन पद्धतियों का ह्रास
बड़ों का सम्मान और लिहाज बाजारवाद, फिल्मों और विज्ञापनों ने नष्ट कर दिया । मंदिर, आस्था, प्रार्थना, क्षमा, भाल पर तिलक लगाना, ब्रह्ममुहूर्त में जागना आदि अंधविश्वास हो गए । संस्कृत में लिखें धार्मिक ग्रंथों का नियमित पारायण या श्रवण भी छुट गए हैं I अन्न को ब्रह्म मानने की बजाय, केवल पेट भरने का एक 'यूज एंड थ्रो' तथा उपेक्षित साधन मान लिया गया । परंपरागत रूप से, बैठकर, शांति से, प्रसन्नता से, भीगे पैरों, भोजन को भगवान का प्रसाद मानते हुए उसे प्रणाम करते हुए, चबा-चबाकर, संयमित भोजन करने की प्रथा छूट गई । इसके विपरीत जूते-मोजे पहनकर, खड़े-खड़े, बातचीत और बहस करते हुए, जो मिला उसे जैसे-तैसे मुँह में ठेलते हुए, जल्दी-जल्दी, चम्मच से खाने को, तथा ढेर सारा जूठा छोड़ने को हमने आधुनिकता और वैज्ञानिकता मान लिया I भोजन नामक फाइल निपटाकर तुरन्त ही तनावपूर्ण ड्यूटी पर लग जाना अब आम हो गया है, जबकि ये सभी स्वयं के लिए तनिक भी स्वास्थ्यप्रद नहीं हैं ।
फिजियोलॉजी की दृष्टि से देखें तो भोजन ग्रहण करने का यह ढंग वैज्ञानिक भी नहीं हैं, क्योंकि ये 'पुलिंग ऑफ ब्लड', तापमान नियंत्रण, 'रिडिस्ट्रीब्यूशन ऑफ ब्लड' [रक्त का पुनर्वितरण], पाचन रसों के स्राव और गैस्ट्रिक एम्प्टीइंग [आमाशय से अधपचे भोजन का आंतों में धीरे-धीरे जाना] आदि फिजियोलॉजिकल प्रक्रियाओं की दृष्टि से अनुचित हैं I देर से जागने, बिस्तर पर चाय, कमोड के उपयोग से शुरु हमारी पूरी दिनचर्या ही शरीर, सामाजिकता, सरोकार, सहकार, प्रकृति के साथ सहजीवन का तिरस्कार कर देर रात में मोबाइल के अतिनिकट सानिध्य में नीन्द पर समाप्त होती है I परिणाम सामने हैं, सिंपैथेटिक तंत्रिका तंत्र हावी हो गया है और जीवनशैली जनित रोगों का महाप्रकोप बढ़ गया है । हमने पढ़ाई में भी संस्कृत और हिंदी अथवा भारतीय भाषाओं का पूर्णरूपेण त्याग कर दिया है, जिससे मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों का विकास नहीं हो रहा है ।
योग दिवस के संदर्भ में यह आलेख सांस लेने के सही ढंग पर ही केन्द्रित है I
जब हम सामान्य अवस्था में सांस लेते हैं तो दो तरह की मांसपेशियां काम करती हैं, एक तो डायफ्राम और दूसरी एक्सटर्नल इंटरकॉस्टल मसल्स I इन दोनों के संकुचन से लगभग 350-500 मिलीलीटर वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है। जैसे ही इनका संकुचन समाप्त होता है, उतनी ही वायु फेफड़ों से स्वत: [ऑटोमेटिकली] बाहर निकल जाती है I यह क्रम एक मिनट में औसतन 15 बार चलता है I डायफ्राम के संकुचन के कारण 350-500 मिलीलीटर वायु का 70% हिस्सा प्रवेश करता है, शेष 30% एक्सटर्नल इंटरकॉस्टल मसल्स के कारण होता है I
श्वसन बनाम सांस लेने का सही तरीका: डायफ्राम के संकुचन के कारण डायफ्राम नीचे आता है और पेट के अंगों को दबाता है जिसके कारण पेट बाहर आता है और सांस छोड़ने पर डायफ्राम पुनः यथास्थिति में आ जाता है और पेट भीतर चला जाता है I इस विषय में एमबीबीएस के प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों को विस्तार से बताया-पढ़ाया-समझाया जाता है I फिर भी अन्य नागरिकों की तरह अधिकांश चिकित्सा विद्यार्थी तक गलत ढंग से सांस लेते हैं I चिकित्सा विज्ञान के अनुसार सांस भीतर लेते समय पेट बाहर आने का अर्थ है कि सांस सही ली जा रही है I यह सांस पैरासिंपैथेटिक अथवा डायफ्रामिक श्वसन कहलाता है, इसमें डायफ्राम नामक मांसपेशी की अहम् भूमिका होती है I
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