संभल पुलिस पर FIR का आदेश देने वाले जज का आठ महीने में तीन बार तबादला, सियासी और कानूनी घमासान

संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) विभांशु सुधीर का तबादला जिसे उन्होंने 2024 की सांप्रदायिक हिंसा के मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने के कुछ ही दिनों बाद किया, अब एक बड़े राजनीतिक और कानूनी विवाद का रूप ले चुका है। आठ महीनों के भीतर तीसरी बार तबादला किए जाने के कारण यह फैसला विपक्षी दलों, वकीलों के संगठनों और नागरिक समाज की ओर से तीखी प्रतिक्रिया का..

संभल पुलिस पर FIR का आदेश देने वाले जज का आठ महीने में तीन बार तबादला, सियासी और कानूनी घमासान
25-01-2026 - 10:42 AM
22-04-2026 - 05:53 PM

लखनऊ। संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) विभांशु सुधीर का तबादला जिसे उन्होंने 2024 की सांप्रदायिक हिंसा के मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने के कुछ ही दिनों बाद किया, अब एक बड़े राजनीतिक और कानूनी विवाद का रूप ले चुका है। आठ महीनों के भीतर तीसरी बार तबादला किए जाने के कारण यह फैसला विपक्षी दलों, वकीलों के संगठनों और नागरिक समाज की ओर से तीखी प्रतिक्रिया का विषय बन गया है। सभी ने इसे न्यायपालिका में कार्यपालिका के हस्तक्षेप का मामला बताते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं।

विवाद की जड़: FIR का आदेश और अचानक तबादला

इस पूरे विवाद की तात्कालिक वजह 9 जनवरी को सीजेएम विभांशु सुधीर द्वारा दिया गया वह आदेश है, जिसमें उन्होंने नवंबर 2024 में संभल हिंसा के दौरान एक युवक को गोली मारे जाने के मामले में तत्कालीन सर्किल ऑफिसर अनुज चौधरी सहित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे।

इस आदेश के कुछ ही दिनों के भीतर सुधीर का तबादला कर उन्हें संभल से हटाकर सुल्तानपुर में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर तैनात कर दिया गया। तबादले के समय को लेकर वकीलों ने विरोध प्रदर्शन किया और विपक्षी दलों ने इसे प्रशासनिक नहीं, बल्कि दंडात्मक कार्रवाई करार दिया।

गौरतलब है कि विभांशु सुधीर को 18 सितंबर 2025 को ही आगरा से संभल में तैनात किया गया था। महज चार महीने के भीतर, वह भी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एक संवेदनशील न्यायिक आदेश के बाद उनका हटाया जाना विवाद का केंद्र बन गया।

राजनीतिक प्रतिक्रिया: कांग्रेस ने बताया न्यायपालिका पर हमला

कांग्रेस ने इस मुद्दे पर भाजपा नीत उत्तर प्रदेश सरकार पर सीधा हमला बोला। नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इस तबादले को “प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि संस्थागत तोड़फोड़ और न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला” बताया।

खेड़ा ने सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की अपील करते हुए कहा कि संवैधानिक संतुलन की रक्षा के लिए न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि मामला केवल एक अधिकारी के तबादले तक सीमित नहीं है।
उनके शब्दों में, “यह मुद्दा किसी एक न्यायिक अधिकारी के तबादले से कहीं आगे जाता है; यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायपालिका व कार्यपालिका के बीच संवैधानिक संतुलन की जड़ पर चोट करता है।”

खेड़ा ने संभल हिंसा के दौरान सरकार और पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस फायरिंग में मुस्लिम समुदाय के प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। इस घटना को उन्होंने “चौंकाने वाली, निंदनीय और हिरासत में हत्या जैसी घटना” बताया और स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच की मांग की।

उन्होंने घटनाक्रम को एक पैटर्न करार देते हुए कहा, “भाजपा ने एक खतरनाक और निंदक राजनीतिक फार्मूला तैयार कर लिया है—सांप्रदायिक तनाव पैदा करो, राज्य की हिंसा छोड़ो, दोषियों को बचाओ और फिर जवाबदेही मांगने वाली हर संस्था को कुचल दो।”

प्रतिस्थापन विवाद और त्वरित पलटाव

विवाद को और हवा तब मिली जब विभांशु सुधीर की जगह एक अन्य न्यायिक अधिकारी आदित्य सिंह को संभल का सीजेएम नियुक्त किया गया। वही आदित्य सिंह, जिन्होंने 2024 में शाही जामा मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया था—एक ऐसा सर्वे, जिसके बाद हिंसा भड़की और गोलीबारी में चार लोगों की मौत हो गई थी।

हालांकि, 48 घंटे के भीतर ही आदित्य सिंह की नियुक्ति रद्द कर दी गई और उन्हें उनकी पुरानी तैनाती पर वापस भेज दिया गया। इसके बावजूद कांग्रेस ने कहा कि यह प्रकरण सरकार की मंशा को उजागर करता है। पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि यह “भाजपा सरकार के उस व्यवस्थित प्रयास को बेनकाब करता है, जिसके तहत न्यायिक प्रशासन को राजनीतिक इच्छा के अनुसार मोड़ा जा रहा है, तबादलों को नियंत्रण के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर किया जा रहा है।”

इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक नई अधिसूचना जारी कर दीपक कुमार जायसवाल को संभल का नया सीजेएम नियुक्त किया। आदित्य सिंह का फिर से तबादला कर दिया गया, जबकि विभांशु सुधीर सुल्तानपुर में ही बने रहे। यह फेरबदल उत्तर प्रदेश में 600 से अधिक न्यायिक अधिकारियों के तबादलों से जुड़ी एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा था।

सड़कों पर उतरे वकील

विवाद केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहा। संभल में वकीलों ने चंदौसी थाने और जिला कलेक्ट्रेट के पास प्रदर्शन किया। उन्होंने राज्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए इस तबादले को “न्याय की हत्या” करार दिया।

जिला सत्र न्यायालय बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राजेश यादव ने विभांशु सुधीर के कार्यकाल की सराहना करते हुए कहा, “जज विभांशु सुधीर ने जिले में न्याय वितरण प्रणाली के लिए उत्कृष्ट काम किया। उनके कार्यकाल में कई मामलों का निपटारा आठ दिनों के भीतर हुआ।” उन्होंने तबादला रद्द करने की मांग की।

एक अन्य अधिवक्ता रोशन सिंह यादव ने आरोप लगाया कि यह कदम दबाव में उठाया गया। उन्होंने कहा, “एक अच्छे जज को सजा देने का किसी को अधिकार नहीं है,” और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से हस्तक्षेप की अपील की।

संभल हिंसा की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद 24 नवंबर 2024 को संभल के कोट गरवी इलाके में हुई हिंसा से जुड़ा है। यह हिंसा मुगलकालीन जामा मस्जिद के कोर्ट-आदेशित सर्वे के दौरान भड़की थी। सर्वे उस कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसमें यह दावा किया गया था कि मस्जिद एक प्राचीन मंदिर के स्थल पर बनी है। झड़पों के दौरान गोलीबारी हुई, जिसमें कई लोगों की मौत हुई और पुलिसकर्मियों सहित अनेक लोग घायल हुए।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने भी विभांशु सुधीर के तबादले पर उच्च न्यायपालिका से स्वतः संज्ञान लेने की मांग की है। अखिलेश यादव ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट इस मामले में स्वतः संज्ञान लेंगे।”

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