पाकिस्तान का तालिबान को ‘अंतिम संदेश’: सुरक्षा चिंताओं पर कार्रवाई करो, नहीं तो सत्ता परिवर्तन के लिए तैयार रहो
पाकिस्तान ने अफ़ग़ान तालिबान नेतृत्व को साफ चेतावनी दे दी है कि उसकी सुरक्षा मांगों को मानो और सुलह की राह चुनो, अन्यथा इस्लामाबाद काबुल में मौजूदा शासन को चुनौती देने वाले राजनीतिक समूहों का समर्थन..
इस्लामाबाद। पाकिस्तान ने अफ़ग़ान तालिबान नेतृत्व को साफ चेतावनी दे दी है कि उसकी सुरक्षा मांगों को मानो और सुलह की राह चुनो, अन्यथा इस्लामाबाद काबुल में मौजूदा शासन को चुनौती देने वाले राजनीतिक समूहों का समर्थन करेगा। यह दावा न्यूज़18 की रिपोर्ट में किया गया है।
विपक्षी अफ़ग़ान नेताओं से फिर संपर्क शुरू
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों ने कई अहम अफ़ग़ान राजनीतिक और विपक्षी नेताओं से पुनः संपर्क साधना शुरू कर दिया है। इनमें शामिल हैं—
- पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई
- पूर्व राष्ट्रपति अशरफ़ गनी
- नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट के नेता अहमद मसीहूद
- पूर्व उपराष्ट्रपति अब्दुल रशीद दोस्तोम
- अफ़ग़ानिस्तान फ़्रीडम फ़्रंट से जुड़े नेता
- पूर्व नॉर्दर्न अलायंस से जुड़े कई प्रमुख चेहरे
ये संदेश तुर्की के मध्यस्थों के जरिए भेजा गया है।
इससे पहले कई महीनों से पाकिस्तान की वार्ता प्रक्रिया ठप पड़ी हुई थी और इस्लामाबाद में तालिबान की जिद को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही थी—खासकर इस वजह से कि तालिबान टीटीपी (TTP) लड़ाकों पर लगाम नहीं लगा रहे थे और सीमा पार हमले बढ़ते जा रहे थे।
तालिबान–भारत नज़दीकी से पाकिस्तान चिंतित
यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब अफ़ग़ान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने भारत की यात्रा की। पाकिस्तान के अधिकारियों के अनुसार, तालिबान का यह कूटनीतिक रुख इस्लामाबाद से दूरी बनाने का संकेत माना जा रहा है।
तेजी से बिगड़ते रिश्तों के बीच पाकिस्तान अब तालिबान की नीति को न सिर्फ सुरक्षा खतरा, बल्कि रणनीतिक नुकसान भी मान रहा है।
इसी कारण उसने अब तालिबान विरोधी राजनीतिक गठबंधनों और प्रतिरोधी नेटवर्क्स से संपर्क बढ़ाना शुरू किया है—अफगानिस्तान के भीतर भी और बाहर भी।
पाकिस्तान ने तालिबान को क्या ऑफर दिया है?
इस्लामाबाद ने संकेत दिया है कि वह..
- अफ़ग़ान विपक्षी नेताओं को राजनीतिक जगह,
- सुरक्षा गारंटी,
- और यहां तक कि पाकिस्तान में ऑफिस स्पेसदेने को तैयार है।
यह दर्शाता है कि पाकिस्तान तालिबान-विरोधी एक संगठित राजनीतिक ब्लॉक बनाने की दिशा में बढ़ रहा है।
इन्हीं आश्वासनों को निर्वासित अफ़ग़ान महिला नेताओं,
नागरिक समाज कार्यकर्ताओं
और लोकतंत्र समर्थक समूहों
तक भी बढ़ाया जा रहा है जो एक समावेशी राजनीतिक ढांचे (लोया जिरगा या भविष्य के चुनावों के माध्यम से) की मांग कर रहे हैं।
पाकिस्तान की मुख्य मांगें क्या हैं?
क़तर और तुर्की की मध्यस्थता में हुई तीन दौर की वार्ता लगभग बेनतीजा रही है।
पहले चरण में जिस अस्थायी युद्धविराम पर चर्चा हुई थी, वह भी पिछले इस्तांबुल राउंड के बाद आगे नहीं बढ़ सका।
इस्लामाबाद ने अपनी मुख्य अपेक्षाएँ नहीं बदली हैं..
- TTP के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई
- बड़े हमलों में शामिल वांछित TTP नेताओं का पाकिस्तान को सुपुर्दगी
- ड्यूरंड लाइन पर तनाव बढ़ने से रोकने के स्पष्ट आश्वासन
- सीमा पार आवाजाही रोकने के लिए सीमित "बफ़र ज़ोन"
- व्यापार और द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता
काबुल का रुख
लेकिन अफ़ग़ान तालिबान सरकार इन मांगों से सहमत नहीं है—
विशेषकर TTP लड़ाकों का हस्तांतरण और सीमा के पास बफ़र ज़ोन बनाने की पाकिस्तान की मांग पर।
2021 के बाद पाकिस्तान का सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव
तालिबान शासन के 2021 में सत्ता में आने के बाद पहली बार पाकिस्तान इस स्तर पर तालिबान विरोधी राजनीतिक ताकतों से खुला संपर्क बना रहा है।
अधिकारियों का कहना है कि यह कदम मजबूरी से उठाया गया है क्योंकि अब इसकी जड़ में हैं तीव्र सुरक्षा खतरे और क्षेत्रीय स्थिरता का सवाल।
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