पूंछ गोलाबारी: दोस्त के मदरसे में बच्चों को बचाने वाले हिंदू शख्स को मिला 'हीरो' का दर्जा
जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती शहर पूंछ में एक सप्ताह पहले हुई भीषण गोलाबारी के बाद एक ऐसी कहानी सामने आई है जिसने दोस्ती, इंसानियत और एकता की मिसाल कायम की है..
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती शहर पूंछ में एक सप्ताह पहले हुई भीषण गोलाबारी के बाद एक ऐसी कहानी सामने आई है जिसने दोस्ती, इंसानियत और एकता की मिसाल कायम की है।
51 वर्षीय प्रदीप शर्मा, जो पूर्व भाजपा विधायक हैं, को आज ‘हीरो’ के रूप में सराहा जा रहा है—एक ऐसा व्यक्ति जिसने धर्म और राजनीति की सीमाओं से ऊपर उठकर इंसानियत को प्राथमिकता दी।
जब पाकिस्तान की ओर से दागे गए मोर्टार गोलों ने स्थानीय मदरसे जामिया ज़िया उल उलूम को निशाना बनाया—जहाँ उनके बचपन के दोस्त का संचालन था और जहाँ 1200 से अधिक छात्र पढ़ते हैं—तो शर्मा तुरंत मौके पर पहुंचे।
वायरल हो रहे वीडियो में उन्हें घायल बच्चों को गोद में उठाकर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाते हुए देखा जा सकता है। पूंछ के लोग उन्हें अब "गार्जियन एंजल" (रक्षक देवदूत) कहकर पुकार रहे हैं।
इस हमले में एक मौलवी की मौत हो गई और तीन बच्चे घायल हो गए। जैसे ही गोलाबारी शुरू हुई, मदरसे के प्रमुख सैय्यद हबीब ने अपने बचपन के दोस्त प्रदीप शर्मा को फोन किया।
दोनों की पहली मुलाकात 9वीं कक्षा में पूंछ गवर्नमेंट स्कूल में हुई थी। दशकों बाद, भले ही उनके रास्ते अलग हो गए—एक धार्मिक नेतृत्व में और दूसरा राजनीति में—उनकी दोस्ती और गहरी होती गई। और वही दोस्ती इस संकट में उन्हें फिर एकसाथ ले आई।
शर्मा ने भावुक होकर बताया, "मौलवी साहब मेरी गोद में ही चल बसे। मैंने उनके गाल पर कपड़ा रखा, पर उन्हें बचाया नहीं जा सका। फिर मैं तीन बच्चों को बचाने भागा। अस्पताल भरा हुआ था, स्ट्रेचर नहीं मिला, तो उन्हें अपनी गोद में ही थामे रहा जब तक स्ट्रेचर नहीं आया।"
जब किसी ने उन्हें कहा कि वे खुद को बचाएं, तो उन्होंने जवाब दिया, "गोले मेरे लिए नहीं थे। कम से कम आज तो नहीं।"
शर्मा ने यह भी कहा, "उस वक्त मेरे साथ हिंदू, मुस्लिम और सिख सब थे। हम सब एकसाथ बच्चों को बचा रहे थे। उस पल कुछ और मायने नहीं रखता था—बस उन बच्चों की जान बचाना ज़रूरी था।"
सैय्यद हबीब ने कहा, "मैंने बिना सोचे समझे प्रदीप भाई को फोन किया। मुझे पता था वो जरूर आएंगे—और वो आए।"
जहाँ शर्मा घायलों की मदद कर रहे थे, वहीं सैय्यद ने बाकी हज़ारों बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की।
यह पहला मौका नहीं था जब दोनों ने एकजुटता दिखाई हो। कोविड-19 संकट के दौरान भी वे साथ मिलकर काम कर चुके हैं। लेकिन यह हमला पूंछ की आत्मा को झकझोर गया।
उनकी यह अटूट दोस्ती आज पूंछ के लिए आशा की एक प्रतीक बन गई है—एक ऐसी मिसाल जो हिंसा से जूझते समय में सांप्रदायिक सौहार्द और ज़मीनी स्तर पर नेतृत्व की ताकत को दर्शाती है।
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