18 साल बाद फिर लौट सकते हैं टाटा? बंगाल के नए उद्योग मंत्री बोले, 'हमारी पहली प्राथमिकता टाटा समूह को वापस लाना'

पश्चिम बंगाल में नयी भाजपा सरकार के गठन के बाद उद्योग मंत्री का पद संभालते ही तपस रॉय ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार की पहली प्राथमिकता टाटा समूह को दोबारा पश्चिम बंगाल में निवेश के लिए राजी करना..

18 साल बाद फिर लौट सकते हैं टाटा? बंगाल के नए उद्योग मंत्री बोले, 'हमारी पहली प्राथमिकता टाटा समूह को वापस लाना'
11-06-2026 - 10:54 AM

पश्चिम बंगाल में नयी भाजपा सरकार के गठन के बाद उद्योग मंत्री का पद संभालते ही तपस रॉय ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार की पहली प्राथमिकता टाटा समूह को दोबारा पश्चिम बंगाल में निवेश के लिए राजी करना होगी।

यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 18 साल पहले ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए आंदोलन के कारण टाटा मोटर्स को सिंगूर में प्रस्तावित अपनी महत्वाकांक्षी नैनो कार परियोजना छोड़नी पड़ी थी। उसी आंदोलन ने तृणमूल कांग्रेस को राजनीतिक मजबूती दी और 2011 में वाम मोर्चा की तीन दशक पुरानी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था।

अब, 15 साल बाद तृणमूल कांग्रेस खुद सत्ता से बाहर हो चुकी है और औद्योगीकरण की कमी भाजपा का प्रमुख चुनावी मुद्दा रही।

"बड़े उद्योगों को वापस लाना सरकार की प्राथमिकता"

उद्योग मंत्री तपस रॉय ने कहा, "राज्य में बड़े उद्योगों को लाना हमारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके लिए जो भी आवश्यक होगा, हम करेंगे। पिछली सरकार के दौरान उद्योग और कारोबार बंगाल छोड़कर चले गए। उद्योगों के आने से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।"

उन्होंने आगे कहा,"हमारी पहली प्राथमिकता टाटा समूह को वापस लाना है। सिंगूर में जो हुआ, उसे सबने देखा। जरूरत पड़ी तो मैं खुद जाकर टाटा समूह के अधिकारियों से मुलाकात करूंगा और उन्हें बंगाल लौटने के लिए मनाने की कोशिश करूंगा।"

गौरतलब है कि तपस रॉय पहले कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में रह चुके हैं तथा ममता बनर्जी सरकार में मंत्री भी रहे हैं। उन्होंने 2024 में भाजपा का दामन थामा था।

कैसे शुरू हुई थी सिंगूर की नैनो परियोजना?

2006 के विधानसभा चुनाव में जीत के तुरंत बाद वाम मोर्चा सरकार ने घोषणा की थी कि टाटा मोटर्स सिंगूर में दुनिया की सबसे सस्ती कार कही जाने वाली एक लाख रुपये की नैनो कार का निर्माण करेगी।

इसके लिए लगभग 1,000 एकड़ भूमि अधिग्रहित की गई और फैक्ट्री का निर्माण कार्य भी शुरू हो गया।

ममता बनर्जी के आंदोलन ने बदली तस्वीर

भूमि अधिग्रहण का कुछ संगठनों ने विरोध किया, लेकिन सरकार परियोजना पर आगे बढ़ती रही।

2006 के अंत में ममता बनर्जी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार के खिलाफ "उपजाऊ कृषि भूमि बचाओ" आंदोलन शुरू किया और 26 दिनों तक अनशन किया। इस आंदोलन को समाज के विभिन्न वर्गों का समर्थन मिला।

नंदीग्राम हिंसा बनी निर्णायक मोड़

मार्च 2007 में नंदीग्राम में प्रस्तावित केमिकल हब के लिए भूमि अधिग्रहण के विरोध में प्रदर्शन हुआ, जिस पर पुलिस कार्रवाई में 14 लोगों की मौत हो गई।

इस घटना ने पूरे राज्य में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन को नई ऊर्जा दी और वाम सरकार के खिलाफ माहौल बन गया।

2008 में टाटा ने छोड़ा सिंगूर

लगातार विरोध और राजनीतिक अस्थिरता के बीच 2008 में टाटा मोटर्स ने सिंगूर परियोजना बंद करने का फैसला किया।

उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुरंत टाटा समूह को गुजरात के साणंद में प्लांट लगाने का निमंत्रण दिया।

इसके बाद 2009 में पहली टाटा नैनो कार साणंद प्लांट से बाहर आई। तीन साल बाद 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत साबित हुआ।

उद्योगों के पलायन का असर

तृणमूल कांग्रेस के आलोचकों का कहना है कि टाटा समूह के बंगाल छोड़ने से राज्य की औद्योगिक छवि को लंबे समय तक नुकसान पहुंचा और बड़े निवेशकों ने पश्चिम बंगाल से दूरी बना ली।

सिंगूर के लोगों की बदलती सोच

हाल ही में सिंगूर के स्थानीय लोगों ने रोजगार की कमी और युवाओं के पलायन पर चिंता जताई।

"फैक्ट्री जाती रही, बेटा भी बाहर चला गया"

70 वर्षीय शेख मोहम्मद अली ने बताया, "मैंने अपनी जमीन खुशी-खुशी फैक्ट्री के लिए दी थी और मुआवजा भी मिला। मेरा बेटा यहीं प्रशिक्षण लेकर 4,500 रुपये महीने पर काम कर रहा था। लेकिन आंदोलन शुरू हुआ और सब कुछ बंद हो गया। आज वह उत्तराखंड में सोने का कारीगर बनकर काम कर रहा है।"

उन्होंने सवाल उठाया, "क्या 2,000 रुपये और 16 किलो चावल किसी परिवार का भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं? यह जमीन अब न रोजगार देती है और न ठीक से खेती के लायक बची है।"

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी पूरी तरह नहीं लौटी खेती

2016 में सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को अवैध करार देते हुए किसानों को जमीन वापस करने का आदेश दिया।

हालांकि, बड़े हिस्से में कंक्रीट और लोहे का मलबा होने के कारण जमीन दोबारा खेती योग्य नहीं बन सकी। राज्य सरकार ने 3,611 परिवारों को प्रति माह 2,000 रुपये और 16 किलो चावल की सहायता प्रदान की।

अब उद्योग और खेती दोनों चाहते हैं लोग

25 वर्षीय सैकत धारा, जो उर्वरक की दुकान चलाते हैं और भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेता दूधकुमार धारा के पोते हैं, कहते हैं,

"हमारी 5.5 बीघा जमीन परियोजना क्षेत्र में चली गई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वापस मिली, लेकिन हम केवल 2.5 बीघा पर ही खेती कर पा रहे हैं। कंक्रीट और लोहे के मलबे के कारण जमीन को दोबारा खेती योग्य बनाना बहुत महंगा है।"

उन्होंने कहा, "आज लोग उद्योग और खेती दोनों चाहते हैं। औद्योगीकरण के बिना आर्थिक स्थिति नहीं सुधरेगी। अब नई सरकार क्या करती है, यह देखना होगा।"

रोजगार बना सबसे बड़ा मुद्दा

हालिया विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बेरोजगारी और रोजगार की तलाश में युवाओं का दूसरे राज्यों में पलायन प्रमुख चुनावी मुद्दा रहा। ऐसे में भाजपा सरकार द्वारा टाटा समूह को वापस लाने की पहल को राज्य में औद्योगिक पुनरुत्थान की दिशा में एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।