तमिलनाडु राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केरल के राज्यपाल की प्रतिक्रिया: “जज संवैधानिक मुद्दों पर कैसे फैसला कर सकते हैं?”
केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे "अत्यंत आपत्तिजनक कृत्य" बताया। यह फैसला तमिलनाडु के राज्यपाल से संबंधित है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राज्यपाल को समयसीमा निर्धारित की है।
तिरुवनंतपुरम। केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे "अत्यंत आपत्तिजनक कृत्य" बताया। यह फैसला तमिलनाडु के राज्यपाल से संबंधित है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राज्यपाल को समयसीमा निर्धारित की है।
‘हिंदुस्तान टाइम्स’ को दिए एक इंटरव्यू में राज्यपाल आर्लेकर ने कहा कि ऐसे मामलों में निर्णय लेने का अधिकार संसद को है, न कि न्यायपालिका को। उन्होंने कहा कि राज्यपाल एक संवैधानिक पद पर होता है, और किसी भी व्यक्ति या न्यायालय द्वारा यह कहना कि राज्यपाल को किसी समयसीमा के भीतर निर्णय लेना चाहिए, संविधान में निहित नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए था, और यदि समयसीमा तय करनी है तो यह केवल संविधान संशोधन के जरिए ही हो सकता है।
राज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे. बी. पारड़ीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ के फैसले को "सीमाओं से परे दखल" (overreach) करार दिया और कहा कि ऐसे संवैधानिक विषयों पर संसद को निर्णय लेना चाहिए।
उन्होंने पूछा कि दो जजों की बेंच इस तरह का फैसला कैसे दे सकती है? उन्होंने कहा कि “जिस पीठ ने यह मामला सुना, उन्हें इसे संविधान पीठ को भेजना चाहिए था। लेकिन कोर्ट ने वही कहा जो वह कहना चाहता था। जिस विषय पर चर्चा हो रही थी, वह संवैधानिक था। संविधान में कहीं यह नहीं लिखा गया है कि राज्यपाल को विधेयक पर निश्चित समय में निर्णय लेना है। यदि सुप्रीम कोर्ट अब यह कहता है कि एक, दो या तीन महीने के अंदर निर्णय होना चाहिए, तो यह संवैधानिक संशोधन बन जाता है। और अगर यह काम कोर्ट करेगा, तो फिर संसद और विधायिका की क्या जरूरत है?”
राज्यपाल ने आगे कहा, “संविधान यह नहीं कहता कि राज्यपाल को निश्चित समय में निर्णय लेना चाहिए। संविधान में संशोधन करने का अधिकार संसद को है, और इसके लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है। लेकिन यहां दो जज बैठकर संविधान के प्रावधान का भाग्य तय कर रहे हैं? मैं यह समझ नहीं पा रहा हूं। यह न्यायपालिका की सीमा से बाहर जाने वाला कृत्य है। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। हो सकता है मैं गलत हूं।”
तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा विधेयकों को रोकने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि संभवतः राज्यपाल को उन विधेयकों को लेकर कुछ आपत्तियां रही हों, जिन्हें संबोधित किया जाना चाहिए।
उन्होंने न्यायपालिका की तुलना करते हुए कहा, “हमने देखा है कि अदालतों में मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट खुद कई मुद्दों पर फैसला नहीं देते। वहां भी कुछ कारण होते हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट के पास अपने फैसले में देर करने के कारण होते हैं, तो राज्यपाल के पास भी हो सकते हैं। यह स्वीकार किया जाना चाहिए। अगर देश की जनता यह महसूस करती है कि समयसीमा होनी चाहिए, तो इसे संसद के जरिए किया जाना चाहिए।”
मुन्नमबम मामले पर, जहां लगभग 600 परिवारों को ज़मीन से बेदखल किए जाने का खतरा है, उन्होंने विश्वास जताया कि वक्फ अधिनियम में हालिया संशोधन से यह मुद्दा सुलझ जाएगा।
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि मुन्नमबम का मामला वक्फ अधिनियम में किए गए संशोधनों के आलोक में सुलझ जाना चाहिए। संबंधित पक्षों को इसका संज्ञान लेकर जल्द से जल्द लोगों को न्याय देना चाहिए। हर राजनीतिक दल वहां गया है और अपना समर्थन व्यक्त किया है। अब देखना है कि राज्य और राजनीतिक दल इस पर न्याय कैसे देते हैं। उनके पास एक मजबूत हथियार वक्फ संशोधन अधिनियम के रूप में है।”
पृष्ठभूमि
तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए न केवल राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर निर्णय लेने की समयसीमा निर्धारित की, बल्कि यह भी कहा कि यदि राज्यपाल कोई विधेयक राष्ट्रपति को भेजते हैं, तो राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा (अनुच्छेद 201 के तहत)।
कोर्ट ने कहा, “यदि तय अवधि से अधिक देरी होती है, तो इसके उचित कारण दर्ज किए जाने चाहिए और संबंधित राज्य को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए।”
साथ ही कोर्ट ने अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल की कार्रवाई के लिए भी समयसीमा तय की।
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