अब सुप्रीम कोर्ट ने भी ख़ारिज की किरेन रिजीजू और जगदीप धनखड़ के खिलाफ याचिका
<p>9 फरवरी 2023 को बॉम्बे हाई कोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने भी जनहित याचिका को खारिज करते हुए और हाई कोर्ट से सहमति जताते हुए केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजीजू और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका ख़ारिज कर दी। </p>
कॉलेजियम पर दिए थे बयान
उपराष्ट्रपति और कानून मंत्री के खिलाफ ये जनहित याचिका देश की सर्वोच्च अदालत, न्यायपालिका और कॉलेजियम के खिलाफ की गई टिप्पणियों को लेकर दायर की गई थी।
क्या कहा गया याचिका में
बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से दायर की गई इस जनहित याचिका में देश की न्यायपालिका, सुप्रीम कोर्ट और कॉलेजियम के खिलाफ की गई टिप्पणियों के लिए दोनो के खिलाफ कार्रवाई का अनुरोध किया गया था |
बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने अध्यक्ष अहमद आबिदी ने जनहित याचिका में दावा किया था कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के बयान सुप्रीम कोर्ट सहित संवैधानिक संस्थानों पर हमला करके संविधान में विश्वास की कमी दिखा रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि उपराष्ट्रपति और कानून मंत्री के संवैधानिक पदों पर बैठे जिम्मेदार लोगों द्वारा इस तरह का व्यवहार बड़े पैमाने पर जनता की नज़र में सर्वोच्च न्यायालय की महिमा को कम कर रहा है।
क्या कहा था किरेन रिजिजू ने
गौरतलब है कि किरेन रिजिजू लगातार सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को लेकर बयान देते आ रहे है। कानून मंत्री के बयानों की शुरूआत राजस्थान के उदयपुर में आयोजित हुई कॉन्फ्रेस से हुई थी। जहां पर राजस्थान हाईकोर्ट में जजो की नियुक्ति को लेकर सवाल हुए थे। इसके जवाब में पहली बार कानून मंत्री ने खुलकर कॉलेजियम प्रणाली पर हमला किया था। इसके बाद से ही लगातार कानून मंत्री कॉलेजियम सिस्टम को लेकर हमलावर रहें है।
क्या कहा था जगदीप धनखड़ ने
जयपुर दौरे के दौरान उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी न्यायपालिका की शक्तियों पर “मूल संरचना” सिद्धांत पर सवाल खड़े कर NJAC अधिनियम को रद्द करने को गंभीर कदम बताया था। उपराष्ट्रपति धनखड़ ने केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1973 के ऐतिहासिक फैसले पर अपना बयान दिया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि संसद के पास संविधान में संशोधन करने का अधिकार है, लेकिन इसकी मूल संरचना का नहीं।
सरकार का किया था विरोध
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने भी जनहित याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि यह केवल प्रचार के लिए दायर की गई तुच्छ याचिका है। एएसजी ने जनहित याचिका को अदालत के समय की भारी बर्बादी बताते हुए याचिका को खारिज करने का अनुरोध करते हुए भारी जुर्माना लगाने का अनुरोध किया। सरकार ने कहा था कि इस याचिका में कि गई प्रार्थना को कैसे पूर्ण किया जा सकता है या अनुमति दी जा सकती है। एएसजी ने कहा कि उपराष्ट्रपति और मंत्री को हटाना केवल संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार हो सकता है।
बॉम्बे हाई कोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट
दोनो पक्षो की बहस सुनने के बाद कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसवी गंगापुरवाला और जस्टिस संदीप मार्ने की पीठ ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता से पूछा था कि किस प्रावधान के तहत उपराष्ट्रपति को अदालत द्वारा अयोग्य घोषित किया जा सकता है। याचिकाकर्ता के जवाब से असंतुष्ट होते हुए पीठ ने जनहित याचिका पर विचार करने से ही इंकार करते हुए याचिका को खारिज करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस जनहित याचिका को खारिज कर दिया है।
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