बेताल द्वारा दवा और मनुष्य की एक्सपायरी की तुलनात्मक विवेचना..!
<p><em>विक्रम- बेताल ! ये बता कि दवाइयों और मनुष्य की एक्सपायरी में क्या अन्तर हैं?<br /> बेताल- राजन ! पहले समानताओं की बात सुनो, जिस दिन दोनों अवतरित होते हैं, उसी दिन उनकी एक्सपायरी निश्चित हो जाती है I परन्तु ....</em>..<br /> </p>
विक्रम –परन्तु क्या?
बेताल-राजन ! दवा की एक्सपायरी अनेक तरीकों से होती है, जैसे रोगी के घर की अलमारियों में, सरकारी सप्लाई की दवाओं के उपयोग में न आने के कारण अस्पतालों के गोदामों में, डॉक्टरों के यहाँ फिजिशियन्स सेम्पल की दवा रखने की अलमारियों में तथा दवाइयों की दुकानों में I
विक्रम- बेताल ! एक स्थान को तू भूल गया है, दवा के कारखानों में I
बेताल –राजन ! कुछ कारखानों में तो वे अपनी मृत्यु को सहज ही प्राप्त हो जाती हैं परन्तु कुछेक कारखाने ऐसे भी होते हैं, जो दवा को नए वस्त्रों में पुनः अवतरित कर देते हैं, भाड़ में जाए एक्सपायरी I जैसे आत्मा नया शरीर धारण करती है, वैसे ही दवा भी नए वस्त्र धारण कर बन-ठनकर बाजार में रोगियों को अपने जाल में फंसाने के लिए निकल पड़ती हैं I
विक्रम – बेताल ! मैंने तो ये भी सुना था कि कुछ दवा दुकानदार भी अपनी एक्सपायर्ड दवाओं के शरीर परिवर्तन का ठेका कुछ दवा कारखानों को नि:संकोच और नि:शुल्क सहयोग देते हैं I
बेताल- जी राजन ! यह पारस्परिक समझौते के तहत होता है, जिसे ये लोग अंडर स्टैंडिंग कहा करते हैं I
बेताल फिर बोला - राजन ! मनुष्य के मामले में सब कुछ पूर्व निर्धारित रहता है कि उसकी एक्सपायरी किस तिथि को, किस समय, कितने बजकर कितने मिनट और सेकण्ड पर, किस स्थान पर और कैसे होगी, सब कुछ एकदम फिक्स I न तोला भर इधर और न माशा भर उधर I फिर भी........
विक्रम- बेताल ! तू फिर भी बोलकर और रुककर मेरी उत्कंठा को व्यर्थ ही बढ़ा रहा है, बता फिर भी शब्द के क्या निहितार्थ हैं?
बेताल- राजन ! अनेक मनुष्य जीवनभर इस प्रत्याशा में हरामखोरी करते रहते हैं कि अभी अवसर मिला है तो रिश्वत या भ्रष्टाचार या अनाचार अथवा दूसरों का अनिष्ट कर, मिलावट कर, कम तौलकर अथवा अन्यान्य हजारों उपायों से धन एकत्रित करते चलो, बाद में उस धन का सपरिवार अनन्त काल तक सुख भोगते रहेंगे I साथ ही मृत्यु को भी धोखा दे देंगे परन्तु......
विक्रम- बेताल ! आज तेरे मुंह से बारम्बार परन्तु शब्द के उपरान्त स्पीड ब्रेकर आ रहे हैं, आखिर क्या बात है?
बेताल- राजन ! वास्तव में ऐसे मनुष्य ये नहीं जानते हैं कि हरेक व्यक्ति में एक ही परमात्मा विराजमान हैं, भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः” अर्थात् इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है I ऐसे में यदि दूसरे के शरीर में विद्यमान कृष्ण भगवान को कष्ट पहुंचाकर कोई व्यक्ति सुख भोगने की अपेक्षा करता है तो परमात्मा को उस पर बहुत हंसी आती है I क्योंकि उन्होंने दुर्योधन जैसे दुष्ट के साथ-साथ भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण जैसे धर्मनिष्ठ व्यक्तियों को भी नहीं छोड़ा था I इसलिए भगवान ऐसे दुष्टबुद्धि व्यक्तियों को उसके परिजनों सहित इसी जन्म में प्रतिसाद स्वरूप दुःख दे देकर अपनी लीला रचते रहते हैं I
विक्रम- बेताल ! बस कर, अन्यथा तू ऐसे हरेक व्यक्ति की सूची मुझे बताने लगेगा और उस सूची को सुनते-सुनते ही मेरी एक्सपायरी आ जाएगी I
और जैसा कि होता आया है, बेताल फुर्र हो गया I
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