उत्तर प्रदेश में उद्यमियों को सरकार का तोहफाः 577 नियमों को समाप्त कर आपराधिक श्रेणी से किया बाहर, जेल जाने की बजाय भरना होगा केवल जुर्माना
<p><em>उत्तर प्रदेश को उत्तर प्रदेश बनाने के लिए जमीनी स्तर पर काम किये जा रहे हैं। प्रदेश में औद्योगिक वातावरण बेहतर बने इसके लिए हरसंभव कोशिश की जा रही है। इसी का नतीजा है कि उद्योग-व्यापार से संबंधित 577 नियमों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। इन नियमों के तहत किसी भी उद्यमी को छह महीने से एक साल तक जेल का प्रावधान था। इसे अब समाप्त कर जुर्माने में परिवर्तित कर दिया गया है। यही नहीं 2978 नियमों को डिजिटल भी किया गया है। उम्मीद है कि इससे उद्यमियों की दफ्तरों तक भागदौड़ बचेगी और उत्पीड़न से बचेंगे। औद्योगिक विकास विभाग ने शासन द्वारा कारोबारी राहत से जुड़ी प्रगति के जवाब में इस आशय की रिपोर्ट भेजी है।</em></p>
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में औद्योगिक संगठनों की लंबे समय से मांग चली आ रही थी मामूली चूक के कारण बहुत से नियमों के तहत उद्यमियों को जेल की सजा का भय सताता रहा है। इन अनावश्यक निययों के जल्द से जल्द समाप्त किया जाये। कारण उद्यमी भयाक्रांच रहते थे। जब से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई, कंप्लायंस खत्म करने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। उत्तर प्रदेश सरकार भी पिछले कई वर्ष से इस दिशा में काम कर रही थी। प्रत्येक विभाग से अनुपयुक्त नियम और नियामक अनुपालन (कम्प्लांयस) की सूची मांगी गई थी। करीब 22 विभागों ने शासन को ऐसे नियमों और अनुपालनों का ब्योरा भेजा। जिन पर अध्ययन करने के बाद 4504 अनुपालनों को कम कर दिया गया। इसके तहत 2978 अनुपालनों को सरल व डिजिटल कर दिया गया है। इनमें से 1528 नियम सरकार और कारोबारियों (जीटूबी) से संबंधित हैं। इनमें से 1450 नियम उपभोक्ताओं को राहत पहुंचाने वाले हैं।
औद्योगिक संगठनों का मानना था कि ऐसे हजारों नियम उद्योगों के लिए बाधा बने हुए थे। इन अनुपालनों के कारण उद्योगों से जुड़ी एक फाइल फाइनल होने का औसत समय 6 से 24 महीने तक हो जाता था। इन नियमों के समाप्ति के बाद ये समय घटकर 72 घंटे से 300 घंटे पर आ गया है।
व्यापारी भयाक्रांत रहते थे
उद्यमियों की सबसे ज्यादा आपत्ति बोझ बने नियमों की अवहेलना पर जेल जैसे प्रावधानों को लेकर थी। सभी बड़े औद्योगिक संगठनों ने इस संबंध में समस्याएं शासन को बताई थीं। उनकी आपत्तियों और परेशानियों को देखते हुए जेल भेजने के प्रावधान को खत्म कर दिया गया। उद्यमी को अपराधी बनाने वाले ये नियम सबसे ज्यादा अग्निशमन, श्रम, परिवहन और विधिक माप विज्ञान विभागों के थे। अब ऐसे कानूनों की कंपाउंडिंग कर दी गई है। यानी उन्हें अपराध के स्थान पर आर्थिक दंड में बदल दिया गया है।
इसी तरह उत्तर प्रदेश औद्योगिक अशांति अधिनियम (मजदूरी का समय पर भुगतान) 1978 के अंतर्गत जेल भेजने के प्रावधान को भी अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। अकेले 450 से ज्यादा पत्र इसी कानून को खत्म करने के लिए औद्योगिक संगठनों ने दिए थे। कारोबारियों की दलील थी कि केवल एक शिकायत पर विभाग और पुलिस उद्यमी पर केस दर्ज कर लेता है। जेल भेजने का खौफ दिखाकर पुलिस उत्पीड़न करती थी। अब इसे समाप्त कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में कृषि, बेसिक शिक्षा, वाणिज्य कर, सहकारी, धर्मार्थ कार्य, ऊर्जा, आबकारी, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन, उच्च शिक्षा, गृह विभाग, आवास, सिंचाई एवं जल संसाधन, न्याय, विधिक माप विज्ञान, पंचायती राज, राजस्व, चीनी उद्योग, गन्ना विकास, प्राविधिक शिक्षा, परिवहन और नगर विकास के नियमों में परिवर्तन किया गया है।
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