छिड़ेगी नई जंग? पुतिन की धमकियों को नजरअंदाज कर नाटो में शामिल हुआ रूस का ये पड़ोसी
<p><em><strong>2008 में जॉर्जिया और 2022 में यूक्रेन. दोनों ही देश नाटो में शामिल होना चाहते थे, लेकिन रूस ऐसा नहीं चाहता था। नतीजा यह हुआ कि जॉर्जिया और यूक्रेन दोनों को ही रूस के हमलों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद रूस का पड़ोसी देश फिनलैंड मंगलवार को नाटो में शामिल हो गया। ऐसे में दुनियाभर में बस एक ही आषंका है, क्या अब एक नई जंग शुरू होने वाली है? </strong></em></p>
फरवरी 2022 से पहले तक फिनलैंड के कभी नाटो में शामिल होने की चर्चा भी नहीं होती थी. लेकिन पिछले साल जब पुतिन ने यूक्रेन के खिलाफ जंग का ऐलान किया तो फिनलैंड ने नाटो से जुड़ने की कोशिश तेज कर दी। अब फिनलैंड नाटो का सदस्य बन गया है। फिनलैंड एक ऐसा देश था, जिसने किसी एक तरफ जाने की बजाय न्यूट्रल होने का रास्ता चुना था लेकिन यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद उसका इरादा बदल गया। नाटो में फिनलैंड का शामिल होना रूस के लिए एक बड़ा झटका है क्योंकि फिनलैंड के शामिल होने का मतलब है कि नाटो रूस की सीमा के और करीब पहुंच गया है। पुतिन की नाटो से चिढ़ की भी यही वजह है।
नाटो मतलब क्या...
नाटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन एक सैन्य गठबंधन है, जिसका मकसद साझा सुरक्षा नीति पर काम करना है। अगर कोई बाहरी देश किसी नाटो देश पर हमला करता है, तो उसे बाकी सदस्य देशों पर हुआ हमला माना जाएगा और उसकी रक्षा के लिए सभी देश मदद करेंगे। नाटो का गठन 1949 में हुआ था लेकिन इसकी नींव दूसरे विश्व युद्ध के समय ही पड़ गई थी। दरअसल, दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के इलाकों से सेनाएं हटाने से इनकार कर दिया था। 1948 में बर्लिन को भी घेर लिया. इसके बाद अमेरिका ने सोवियत संघ की विस्तारवादी नीति को रोकने के लिए 1949 में नाटो की शुरुआत की।
12 से हुए 31 सदस्य देष
जब नाटो का गठन हुआ था, तब उसमें 12 सदस्य थे। इनमें अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, इटली, नीदरलैंड, आइसलैंड, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, नॉर्वे, पुर्तगाल और डेनमार्क शामिल थे। फिनलैंड के शामिल होते ही अब इसमें 31 सदस्य हो गए हैं। ये देश हैं- अल्बानिया, बुल्गारिया, क्रोएशिया, चेक, एस्टोनिया, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, लातविया, लिथुआनिया, मोंटेनेग्रो, नॉर्थ मेसेडोनिया, पोलैंड, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन, तुर्की और फिनलैंड. फिनलैंड नाटो का 31वां सदस्य होगा.
क्यों मजबूर हुआ फिनलैंड?
6 दिसंबर 1917 को फिनलैंड आजाद हुआ। उस पर सैकड़ों सालों तक रूसी साम्राज्य का शासन था। आजादी के 22 साल बाद ही 1939 में सोवियत ने फिनलैंड पर हमला कर दिया। बाद में, फिनलैंड की नाजी जर्मनी के साथ भी जंग हुई। आखिरकार, फिनलैंड का 10 फीसदी इलाका चला गया। हालांकि, वो आजाद ही रहा। 1948 में फिनलैंड और सोवियत संघ के बीच इस समझौता हुआ. इस समझौते के बाद फिनलैंड आधिकारिक रूप से ‘न्यूट्रल देश’ बन गया। हालात तब बदल गए जब 1991 में सोवियत संघ टूटा। सोवियत संघ के टूटने के चार साल बाद ही 1995 में फिनलैंड यूरोपियन यूनियन का सदस्य बन गया। इसके बाद 2014 में रूस ने फिर हमला कर क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। क्रीमिया यूक्रेन का हिस्सा हुआ करता था फिर 2022 में रूस ने यूक्रेन के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया। इन सबने फिनलैंड को नाटो में शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया। रूस और यूक्रेन की जंग के बाद फिनलैंड में एक सर्वे हुआ था। इस सर्वे में सामने आया कि 76 फीसदी लोग नाटो से जुड़ने के पक्ष में थे।
इससे नाटो और फिनलैंड को क्या फायदा?
फिनलैंड के नाटो में शामिल होने से दोनों को ही फायदा होगा। फिनलैंड के शामिल होने की दो वजहें हैं। पहला ये कि उसकी 1,340 किलोमीटर लंबी सीमा रूस से लगती है। दूसरी वजह कि अगर भविष्य में रूस उस पर हमला करता है तो अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे 30 देश उसके पीछे खुलकर खड़े होंगे। वहीं, नाटो को भी इससे फायदा है। फिनलैंड के नाटो में आने के कारण अब ये सैन्य गठबंधन रूसी सीमा के और करीब पहुंच गया है। एक और वजह ये भी है कि फिनलैंड के पास आधुनिक सेनाएं और सक्षम सशस्त्र बल हैं, जो उत्तरी यूरोप में नाटो की ताकत बढ़ाएंगे। नाटो के प्रमुख स्टोल्टेनबर्ग का कहना है कि कुछ सालों में फिनलैंड ने अपनी सेना को और ज्यादा मजबूत और ज्यादा बेहतर तरीके से ट्रेन्ड किया है।
आगे क्या हो सकता है
अगर फिनलैंड में नाटो की तैनाती बढ़ती है तो फिर रूस भी अपनी तैनाती बढ़ाएगा। फिलहाल, अभी तो कोई ऐसी टकराव की स्थिति नजर नहीं आ रही है लेकिन फिनलैंड के अलावा स्वीडन भी नाटो का सदस्य बनने की रेस में है। फिनलैंड के साथ ही स्वीडन ने भी नाटो की सदस्यता के लिए आवेदन किया था. अगर स्वीडन भी नाटो में शामिल होता है तो हो सकता है कि रूस और पश्चिमी देशों में नया टकराव देखने को मिले।
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