सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बिना साथ रहने के बावजूद पत्नी पति से भरण-पोषण का दावा कर सकती है

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाया कि यदि पत्नी, पति के साथ रहने से इनकार कर देती है, भले ही पति ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली का डिक्री प्राप्त कर लिया हो, तो भी वह दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने की हकदार है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बिना साथ रहने के बावजूद पत्नी पति से भरण-पोषण का दावा कर सकती है
13-01-2025 - 12:09 PM
13-01-2025 - 12:09 PM

नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाया कि यदि पत्नी, पति के साथ रहने से इनकार कर देती है, भले ही पति ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली का डिक्री प्राप्त कर लिया हो, तो भी वह दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने की हकदार है। यह जानकारी Live Law द्वारा दी गई।

मुख्य प्रश्न पर विचार

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजय खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार शामिल थे, ने यह प्रश्न उठाया, क्या वह पति, जिसने वैवाहिक अधिकारों की बहाली का डिक्री प्राप्त किया हो, धारा 125(4) CrPC के तहत अपनी पत्नी को भरण-पोषण देने से मुक्त हो सकता है, यदि पत्नी इस डिक्री का पालन करने और matrimonial home (वैवाहिक घर) लौटने से इनकार कर दे?”

मामले की पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उत्तरदायी पति (Dinesh) ने अपनी पत्नी (Reena) की उपेक्षा की थी, विशेष रूप से तब जब उसे गर्भपात का सामना करना पड़ा और उसे matrimonial home में प्रताड़ित किया गया। इस आधार पर, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी के पास वैवाहिक घर न लौटने के लिए पर्याप्त और वैध कारण थे।

अदालत की टिप्पणियां

  • पति ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री का सहारा लेकर पत्नी के भरण-पोषण के दावे से बचने की कोशिश की।
  • जब तक विवाह-विच्छेद (डाइवोर्स) नहीं होता, पति ने इस डिक्री का उपयोग अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए किया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह स्थिति पति के अच्छे इरादों की कमी और पत्नी के प्रति जिम्मेदारी से बचने का प्रयास दर्शाती है।

धारा 125 CrPC और सामाजिक न्याय

  • अदालत ने कहा कि धारा 125 CrPC का उद्देश्य सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है। यह प्रावधान पत्नी को गरीबी और बेसहारा स्थिति से बचाने के लिए है।
  • यह प्रावधान वैवाहिक विवादों के बावजूद लागू होता है और यहां तक कि तलाकशुदा पत्नियों के लिए भी, कुछ शर्तों के तहत, लागू हो सकता है।

पत्नी को ₹10,000 प्रतिमाह भरण-पोषण का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें पति को पत्नी को ₹10,000 प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

महत्वपूर्ण फैसले

  1. वैवाहिक अधिकारों की बहाली का डिक्री अंतिम नहीं:
    इस डिक्री के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि पत्नी भरण-पोषण की हकदार है या नहीं।
  2. अलग रहने के कारणों की स्वतंत्र समीक्षा:
    • हर मामले के अलग-अलग तथ्यों के आधार पर यह आकलन करना होगा कि पत्नी के पास अलग रहने के लिए वैध और पर्याप्त कारण हैं या नहीं।
    • केवल डिक्री का पालन न करना, अपने आप में, भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं बन सकता।
  3. पूर्ववर्ती फैसलों का उल्लेख:
    • Kirtikant D. Vadodaria बनाम गुजरात राज्य (1996): सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए धारा 125 CrPC की भूमिका पर बल।
    • Amrita Singh बनाम रतन सिंह (2018): यह स्पष्ट किया गया कि पति द्वारा प्राप्त वैवाहिक अधिकारों की बहाली का डिक्री अपने आप में पत्नी की भरण-पोषण अयोग्यता को निर्धारित नहीं करता।

न्यायालय का निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

  • प्रत्येक मामले की परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर फैसला किया जाना चाहिए।
  • भरण-पोषण का अधिकार सामाजिक और नैतिक दायित्व पर आधारित है।
  • यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को सुदृढ़ करता है और उन्हें प्रताड़ना से बचाने के लिए कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।

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