नाबालिग से दुष्कर्म मामले में उम्रकैद बरकरार, आसाराम को तुरंत सरेंडर करने का आदेश
राजस्थान हाई कोर्ट ने स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को नाबालिग से दुष्कर्म मामले में मिली उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने आसाराम को किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार करते हुए तत्काल आत्मसमर्पण करने का आदेश..
राजस्थान हाई कोर्ट ने स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को नाबालिग से दुष्कर्म मामले में मिली उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने आसाराम को किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार करते हुए तत्काल आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है।
जोधपुर स्थित राजस्थान हाई कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि निचली अदालत द्वारा दी गई सजा में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। हालांकि अदालत ने गैंगरेप के आरोपों से आसाराम को बरी कर दिया, लेकिन अन्य सभी आरोपों में उनकी दोषसिद्धि को कायम रखा।
फिलहाल 86 वर्षीय आसाराम मेडिकल आधार पर जमानत पर बाहर चल रहे थे।
आसाराम ने अपने सह-आरोपियों शिल्पी और शरच्चंद के साथ हाई कोर्ट में अपील दायर कर निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने 20 अप्रैल को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
पीड़िता के वकील पी.सी. सोलंकी ने मीडिया से बातचीत में बताया कि हाई कोर्ट ने आसाराम की अपील खारिज कर दी है। वहीं सह-आरोपी शिल्पी और शरच्चंद को गैंगरेप के आरोपों से बरी कर दिया गया है। अदालत ने गैंगरेप के आरोपों को स्वीकार नहीं किया, लेकिन दुष्कर्म मामले में दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।
बुधवार को जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने तीनों आरोपियों की अपीलों पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा।
यह सनसनीखेज मामला अगस्त 2013 का है, जब जोधपुर स्थित एक आश्रम में पढ़ने वाली नाबालिग छात्रा ने आसाराम पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था। मामले की सुनवाई के बाद जोधपुर की विशेष पॉक्सो कोर्ट ने 25 अप्रैल 2018 को आसाराम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
इसके बाद आसाराम ने राजस्थान हाई कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने 16 फरवरी से 20 अप्रैल 2026 तक लगातार दिन-प्रतिदिन सुनवाई की, जिसके बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने इस मामले को “गढ़ा हुआ” बताते हुए पीड़िता और उसके परिवार के बयानों में विरोधाभास होने का दावा किया। बचाव पक्ष ने “समानता के सिद्धांत” का हवाला देते हुए कहा कि जब इसी साक्ष्य के आधार पर सह-आरोपियों शरद और प्रकाश को बरी किया गया, तो आसाराम को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
वहीं अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि पॉक्सो मामलों में पीड़िता का बयान ही पर्याप्त साक्ष्य माना जाता है। सरकारी वकीलों ने यह भी तर्क दिया कि मामले के गवाहों पर हमले और उनकी हत्या, आरोपियों द्वारा सबूत मिटाने की साजिश को दर्शाते हैं।
आसाराम लगातार बढ़ती उम्र और विभिन्न बीमारियों का हवाला देकर जमानत की मांग कर रहे थे। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कुछ शर्तों के साथ उन्हें पहली बार अंतरिम मेडिकल बेल दी थी।
इसके बाद 27 अगस्त 2025 को राजस्थान हाई कोर्ट ने उनकी जमानत अवधि बढ़ाने की मांग खारिज कर दी थी। हालांकि 29 अक्टूबर 2025 को हाई कोर्ट ने उन्हें छह महीने की मेडिकल बेल प्रदान की।
8 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम की जमानत रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट को तीन महीने के भीतर अपील पर फैसला सुनाने का निर्देश दिया था।
गौरतलब है कि जनवरी 2023 में गुजरात के गांधीनगर स्थित आश्रम में महिला अनुयायी से दुष्कर्म मामले में भी आसाराम को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
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