गणगौर पूजा आज.., सुहाग की लंबी उम्र के घर-घर पूजी जाएंगी गौर माता..
पूरे राजस्थान की गलियों से लेकर मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ सहित देश भर में के कोने कोने तक, जब चैत्र माह की तीज यानी तृतीया तिथि को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस मनाया जाता गणगौर का विशिष्ट त्योहार। यह केवल एक व्रत नहीं बल्कि उत्सव है प्रेम, समर्पण और अटूट विश्वास का।
गणगौर का पर्व राजस्थान और देश के कई हिस्सों में विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार भगवान शिव और माता पार्वती के पवित्र दांपत्य जीवन का प्रतीक माना जाता है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए गणगौर व्रत रखती हैं, वहीं कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की प्राप्ति की कामना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मां पार्वती ने भगवान शिव की पूजा के लिए बालू से शिवलिंग बनाया था और विधिपूर्वक उसका पूजन किया था। इस घटना से प्रेरित होकर ही आज भी महिलाएं गणगौर व्रत और पूजा को गुप्त रूप से करती हैं। गुप्त पूजन और व्रत का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यह अधिक फलदायी होता है।
साल 2026 में गणगौर का उल्लास 21 मार्च, शनिवार को मनाया जाएगा।
तृतीया तिथि का आगाज: 21 मार्च, रात्रि 02:30 (AM) बजे से।
तृतीया तिथि का समापन: 21 मार्च, रात्रि 11:56 (PM) बजे तक।
मुख्य पूजन: शनिवार, 21 मार्च 2026 (पूरा दिन सौभाग्य की सिद्धि के लिए उत्तम है)
क्यों खास है गणगौर? (महत्व)
गणगौर का अर्थ: 'गण' यानी शिव और 'गौर' यानी गौरी। यह पर्व साक्षात शिव-शक्ति के मिलन का प्रतीक है।
अखंड सौभाग्य का वरदान: सुहागिनें अपने पति की लंबी आयु और खुशहाली के लिए माता पार्वती से आशीर्वाद मांगती हैं।
मनचाहे वर की आस: कुंवारी कन्याएं इस दिन अच्छे जीवनसाथी की कामना के साथ ईसर-गणगौर की पूजा करती हैं।
सांस्कृतिक विरासत: यह पर्व रिश्तों में मिठास और परिवार में सुख-समृद्धि लाने वाला माना जाता है।
पूजन की तैयारी: क्या-क्या चाहिए? (सामग्री)
पूजा की थाली: पूजा की थाली सजाने के लिए इन चीजों को पहले ही जुटा लें:
ईसर गौर: ईसर-गणगौर की सुंदर मूर्तियां (मिट्टी या लकड़ी की)
श्रृंगार का सामान: मेहंदी, सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी और गहने।
ताजे फूल: गुलाब, कमल और दूब (हरियाली का प्रतीक)।
मिष्ठान: घेवर (गणगौर का खास प्रसाद), फल और घर के बने पकवान।
धार्मिक सामग्री: दीपक, अगरबत्ती, कुमकुम और अक्षत।
ऐसे करते हैं पूजन
संकल्प और शुद्धि: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। याद रखें, इस व्रत में भक्ति के साथ-साथ संयम का भी बड़ा महत्व है।
मूर्तियों का श्रृंगार: घर के पवित्र स्थान पर ईसर-गणगौर की मूर्तियों को विराजित करें। उन्हें सुंदर वस्त्र पहनाएं और गहनों से सजाएं।
भजन और लोकगीत: गणगौर की पूजा बिना गीतों के अधूरी है। मारवाड़ी लोकगीतों और भजनों के साथ माता पार्वती का आह्वान करें। शाम के समय सामूहिक आरती और कीर्तन का आनंद लें।
कहानी और अर्घ्य: गणगौर की कथा सुनें और भगवान सूर्य व चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने परिवार की खुशहाली की दुआ करें।
व्रत का पारण: 21 मार्च की रात को पूजा संपन्न करने के बाद सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत खोलें और अपनों में प्रसाद बांटें।
इस दिन 'दूब' से पानी छिड़कते हुए पूजा करना और मेहंदी लगाना बेहद शुभ माना जाता है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी रिश्तों की ताजगी बनाए रखती है।
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