‘लोक सेवक’ का दर्जा नहीं इसलिए कड़ा आरोप नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने कुलदीप सेंगर को कैसे दी राहत..पॉक्सो कानून के तहत मामला

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को 2017 के उन्नाव नाबालिग दुष्कर्म मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा को निलंबित कर दिया। यह फैसला तब आया जब अदालत ने प्रथम दृष्टया यह राय बनाई कि बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत गंभीर (एग्रेवेटेड) प्रवेशी यौन उत्पीड़न का आरोप सेंगर पर लागू..

‘लोक सेवक’ का दर्जा नहीं इसलिए कड़ा आरोप नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने कुलदीप सेंगर को कैसे दी राहत..पॉक्सो कानून के तहत मामला
25-12-2025 - 11:29 AM
22-04-2026 - 05:53 PM

नयी दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को 2017 के उन्नाव नाबालिग दुष्कर्म मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा को निलंबित कर दिया। यह फैसला तब आया जब अदालत ने प्रथम दृष्टया यह राय बनाई कि बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत गंभीर (एग्रेवेटेड) प्रवेशी यौन उत्पीड़न का आरोप सेंगर पर लागू नहीं होता।

यह निष्कर्ष, उनकी दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील लंबित रहते हुए, उन्हें अंतरिम राहत देने का मुख्य आधार बना।

POCSO के तहत कानूनी ढांचा समझें

POCSO अधिनियम की धारा 5 में कुछ परिस्थितियों में प्रवेशी यौन उत्पीड़न को गंभीर अपराध माना जाता है। इनमें वे मामले शामिल हैं, जब अपराध—

  • किसी लोक सेवक, पुलिसकर्मी, सशस्त्र बलों के सदस्य, अस्पताल स्टाफ या जेल कर्मियों द्वारा किया गया हो, या
  • जब आरोपी विश्वास या अधिकार की स्थिति में हो और उसका दुरुपयोग करे।

ऐसे गंभीर अपराधों में सजा कम से कम 20 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास (शेष प्राकृतिक जीवन) तक हो सकती है।

ट्रायल कोर्ट की दलील पर क्यों उठे सवाल

ट्रायल कोर्ट ने पहले सेंगर को आजीवन कारावास की सजा दी थी। अदालत का तर्क था कि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि होने के नाते सेंगर लोक सेवक की श्रेणी में आते हैं और उन्होंने जनता के भरोसे का गंभीर उल्लंघन किया।

हालांकि, अपीलीय स्तर पर न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति हरिश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने इस तर्क से अलग राय रखी।

हाईकोर्ट का प्रथम दृष्टया आकलन

पीठ ने कहा कि POCSO की धारा 5(c) या IPC की धारा 376(2)(b) के उद्देश्य से सेंगर कोलोक सेवक’ नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी माना कि वे POCSO की धारा 5(p) (विश्वास/अधिकार की स्थिति) के दायरे में भी नहीं आते।

अदालत ने कहा, इन तथ्यों के मद्देनज़र, सजा निलंबन के उद्देश्य से यह न्यायालय प्रथम दृष्टया इस निष्कर्ष पर है कि अपीलकर्ता को गंभीर प्रवेशी यौन उत्पीड़न के दायरे में नहीं लाया जा सकता।”
इसका अर्थ यह हुआ कि इस चरण पर POCSO की धारा 6 या IPC की धारा 376(2) के तहत कड़ी सजा लागू नहीं होगी।

पहले से काटी गई सजा अहम कारक

हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यदि अपराध को POCSO की धारा 3 (प्रवेशी यौन उत्पीड़न) माना जाए, तो सजा धारा 4 के तहत आती है, जिसमें न्यूनतम 7 वर्ष का प्रावधान है।

सेंगर करीब 7 वर्ष 5 महीने हिरासत में बिता चुके हैं। अदालत ने माना कि यह तथ्य सजा निलंबन के पक्ष में

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।