रूप चतुर्दशीः 19 अक्टूबर की शाम 05 बजकर 50 मिनट से लेकर शाम 07 बजकर 02 मिनट तक पूजन का मुहूर्त रहेगा
पांच दिवसीय दीप महापर्व पर्व का दूसरा पर्व है रूप चतुर्दशी। चतुर्दशी तिथि 19 अक्टूबर यानी आज दोपहर 1 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 20 अक्टूबर की दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर होगा। रूप चौदस या छोटी दिवाली पर आज यानी 19 अक्टूबर की शाम 05 बजकर 50 मिनट से लेकर शाम 07 बजकर 02 मिनट तक पूजन का मुहूर्त..
पांच दिवसीय दीप महापर्व पर्व का दूसरा पर्व है रूप चतुर्दशी। चतुर्दशी तिथि 19 अक्टूबर यानी आज दोपहर 1 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 20 अक्टूबर की दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर होगा। रूप चौदस या छोटी दिवाली पर आज यानी 19 अक्टूबर की शाम 05 बजकर 50 मिनट से लेकर शाम 07 बजकर 02 मिनट तक पूजन का मुहूर्त रहेगा।
दीपावली से एक दिन पूर्व आने वाले इस पर्व यानी आज के दिन को छोटी दीपावली या नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। यह त्योहार उन लोगों को भी मनाना चाहिए जिन परिवारों में किसी की मौत आदि के कारण से यह त्योहार नहीं मनाया जाता हो। भगवान श्री कृष्ण ने इस दिन नरकासुर का वध किया था इसलिए इस दिन का नाम नरक चतुर्दशी पड़ गया।
इस तरह करें पूजनः- नरक चतुर्दशी पर संध्या समय सरसों अथवा तिल्ली के तेल के दीपक प्रज्ज्वलित करना चाहिए। घर के मुख्य द्वार पर यानी घर के बाहर यम दीपक प्रज्ज्वलित करें और धर्मराज के साथ पितरों का विशेष ध्यान करें। उन्हें नमन करके जीवन में मंगल हो, इसकी कामना करनी चाहए। विशेषतौर पर इस दिन धर्मराज यमराज और पितरों से यह प्रार्थना करें परिवार में किसी की कभी अकाल मृत्यु न हो। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जो भी दीप प्रज्ज्वलित करे वह पांच दीपक जरूर जलाये। एक अपने पूजा घर में, दूसरा रसोई में, तीसरा पानी के स्थान के पास, चौथा पीपल के पेड़ के नीचे और पांचवा यम दीपक देर रात्रि का प्रज्ज्वलित करना चाहिए। उल्लेखनीय यह है कि यम दीपक चार मुखी होना चाहिए।
रूप चौदस की सही तिथि एवं शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार इस वर्ष रूप चौदस अथवा नरक चतुर्दशी रविवार 19 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी। इस दिन चतुर्दशी तिथि दोपहर 1:51 बजे से लेकर अगले दिन 20 अक्टूबर दोपहर 3:44 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के अनुसार तेल अभ्यांगन स्नान सोमवार 20 अक्टूबर को प्रातः 5 से 6:14 बजे तक के मुहूर्त काल में किया जायेगा।
क्या है नरक चतुर्दशी की कहानी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में नरकासुर नाम का एक क्रूर राक्षस रहता है। उसे यह वरदान प्राप्त था कि भूदेवी (पृथ्वी माता) के सिवा कोई भी उसका वध नहीं कर सकता। इस वरदान के घमंड में वह निरंकुश हो गया और देवताओं, ऋषियों यहां तक कि स्वर्ग की अप्सराओं तक को परेशान करने लगा। उसके अत्याचारों से पूरा देवलोक भयभीत हो उठा। जब सबके सब्र का बांध टूटने लगा तो देवतागण भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और उनसे मदद मांगी। श्रीकृष्ण जानते थे कि उनकी पत्नी सत्यभामा स्वयं स्वयं भूदेवी का अवतार हैं इसलिए उन्होंने उनसे (सत्यभामा) साथ चलने का आग्रह किया। सत्यभामा रथ पर सवार होकर श्रीकृष्ण के साथ नरकासुर की राजधानी पहुंचीं।
दोनों ओर से घमासान युद्ध शुरू हो गया। नरकासुर ने अपने शक्तिशाली तीर से भगवान कृष्ण को घायल कर दिया। अपने पति को घायल देखकर सत्यभामा का क्रोध सातवे आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने तुरंत धनुष उठाया और एक तीखा बाण चलाया, जो सीधा नरकासुर के हृदय में जाकर लगा। उसी क्षण उसका अंत हो गया जिस दिन नरकासुर का वध हुआ, वह दिन कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि थी। नरकासुर की मृत्यु के साथ ही देवताओं और धरती पर शांति लौट आई। उसी खुशी में लोगों ने दीप जलाए, मिठाई बांटी और उत्सव मनाया। तब से हर साल इस तिथि को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है।
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