भारत की ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने को क्यों उत्सुक हैं वियतनाम और इंडोनेशिया? जानिए इसकी ताकत, रणनीतिक महत्व और वैश्विक मांग

भारत ने पुष्टि की है कि उसकी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस के निर्यात में बड़ी प्रगति हुई है। वियतनाम ने इसकी खरीद के लिए समझौता कर लिया है, जबकि इंडोनेशिया के साथ भी सौदा अंतिम चरण में पहुंच चुका है। यह जानकारी रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने शनिवार (6 जून) को सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग के दौरान..

भारत की ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने को क्यों उत्सुक हैं वियतनाम और इंडोनेशिया? जानिए इसकी ताकत, रणनीतिक महत्व और वैश्विक मांग
07-06-2026 - 10:14 AM

भारत ने पुष्टि की है कि उसकी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस के निर्यात में बड़ी प्रगति हुई है। वियतनाम ने इसकी खरीद के लिए समझौता कर लिया है, जबकि इंडोनेशिया के साथ भी सौदा अंतिम चरण में पहुंच चुका है। यह जानकारी रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने शनिवार (6 जून) को सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग के दौरान दी।

उन्होंने बताया कि हनोई के साथ समझौता पूरा हो चुका है, हालांकि इसकी आधिकारिक घोषणा अभी नहीं की गई है। वहीं जकार्ता के साथ बातचीत अंतिम चरण में है।

2012 से चल रही थी वियतनाम के साथ बातचीत

वियतनाम के साथ ब्रह्मोस खरीद को लेकर बातचीत वर्ष 2012 से जारी थी। दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ वियतनाम के समुद्री सीमा विवाद और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन को देखते हुए भारत काफी सावधानी बरत रहा था।

अब भारत ने समझौते को आगे बढ़ा दिया है लेकिन मिसाइलों की संख्या और सौदे की कुल कीमत जैसी व्यावसायिक जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।

इससे पहले भारत ने 2022 में फिलीपींस के साथ 375 मिलियन डॉलर का बड़ा ब्रह्मोस निर्यात समझौता किया था। इस सौदे के तहत तीन मिसाइल सिस्टम देने थे, जिनमें से दो पहले ही तटीय सुरक्षा के लिए तैनात किए जा चुके हैं।

कैसे विकसित हुई ब्रह्मोस मिसाइल

ब्रह्मोस मिसाइल का विकास भारत और रूस ने संयुक्त रूप से दो दशकों से अधिक समय में किया है। इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मॉस्कवा नदी के नाम पर रखा गया है।

इसका निर्माण हैदराबाद में किया जाता है और इसे भारत की सबसे आधुनिक रक्षा प्रणालियों में गिना जाता है। संयुक्त समझौते के तहत भारत को इसमें संशोधन, उन्नयन और निर्यात करने का अधिकार प्राप्त है।

ब्रह्मोस की प्रमुख विशेषताएं

  • वजन लगभग 3,000 किलोग्राम
  • लंबाई लगभग 10 मीटर
  • शुरुआती मारक क्षमता 300 किलोमीटर, जिसे भारत ने स्वदेशी तकनीक से बढ़ाकर लगभग 500 किलोमीटर कर दिया है।
  • गति लगभग 4,000 किलोमीटर प्रति घंटा
  • जमीन के बेहद करीब उड़ान भरने की क्षमता, जिससे इसे रडार पर पकड़ना और रोकना बेहद कठिन हो जाता है।

रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी के अनुसार,"ब्रह्मोस एक बेहद प्रभावी और सफल मिसाइल है। इसकी सटीक निशाना लगाने की क्षमता ही दुनिया भर में इसकी बढ़ती मांग का प्रमुख कारण है।"

परमाणु हथियार नहीं होने से निर्यात आसान

राहुल बेदी ने स्पष्ट किया कि ब्रह्मोस परमाणु मिसाइल नहीं है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत इसका निर्यात संभव है।

यदि इसमें परमाणु वारहेड होता, तो अंतरराष्ट्रीय समझौतों के कारण इसके निर्यात पर कई प्रतिबंध लागू हो जाते।

85 प्रतिशत तकनीक भारतीय

विशेषज्ञों के अनुसार ब्रह्मोस प्रणाली का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा भारतीय तकनीक पर आधारित है, जबकि इंजन और कुछ विशेष धातु के पुर्जे अभी भी रूस से प्राप्त किए जाते हैं।

वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस क्यों खरीदना चाहते हैं ब्रह्मोस?

फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों की ब्रह्मोस में बढ़ती रुचि के पीछे कई कारण हैं..

1. चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला

दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ तनाव झेल रहे ये देश अपनी समुद्री सुरक्षा मजबूत करना चाहते हैं। ब्रह्मोस जैसी तेज और सटीक मिसाइल उनके लिए मजबूत प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करती है।

2. कम लागत में अत्याधुनिक तकनीक

ब्रह्मोस पश्चिमी देशों की कई मिसाइल प्रणालियों की तुलना में अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध है, जिससे सीमित रक्षा बजट वाले देशों के लिए यह आकर्षक विकल्प बन जाती है।

3. भारत का व्यापक सहयोग

भारत केवल मिसाइल ही नहीं देता बल्कि प्रशिक्षण, तैनाती में सहायता और स्पेयर पार्ट्स भी कम लागत पर या पैकेज के हिस्से के रूप में उपलब्ध कराता है।

4. बहुउद्देश्यीय क्षमता

ब्रह्मोस को कई प्लेटफॉर्म से दागा जा सकता है..

  • भूमि से
  • युद्धपोतों से
  • पनडुब्बियों से
  • लड़ाकू विमानों से

यही बहु-आयामी क्षमता इसे अन्य मिसाइल प्रणालियों से अलग बनाती है।

ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल की चर्चा

रक्षा सूत्रों के अनुसार, ब्रह्मोस का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी किया गया हो सकता है। हालांकि भारत सरकार की ओर से इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

भारत तेजी से बढ़ा रहा रक्षा निर्यात

पिछले दो दशकों में भारत का रक्षा क्षेत्र पूरी तरह सरकारी नियंत्रण से निकलकर निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ काफी विकसित हुआ है।

2001 से निजी कंपनियों को रक्षा उपकरण बनाने की अनुमति मिलने के बाद वे अब ब्रह्मोस जैसी प्रणालियों के पुर्जों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

रक्षा निर्यात के लक्ष्य

वर्ष

अनुमानित रक्षा निर्यात

2023-24

लगभग 21,000 करोड़ रुपये

2024-25

लगभग 28,000 करोड़ रुपये

2025-26 (लक्ष्य)

लगभग 38,000 करोड़ रुपये

2029-30 (दीर्घकालिक लक्ष्य)

50,000 करोड़ रुपये

ब्रह्मोस के अलावा ये हथियार भी हो रहे हैं निर्यात

भारत अब केवल ब्रह्मोस ही नहीं बल्कि..

  • आकाश मिसाइल
  • पिनाका रॉकेट सिस्टम
  • ड्रोन
  • गोला-बारूद
  • नौसैनिक रक्षा प्रणालियां

का भी निर्यात कर रहा है।

भारत इजराइल के साथ उन्नत ड्रोन तकनीक पर काम कर रहा है, जबकि आर्मेनिया जैसे देशों ने आकाश और पिनाका जैसी भारतीय मिसाइल प्रणालियां खरीदी हैं।

भारत बन रहा वैश्विक रक्षा बाजार का नया खिलाड़ी

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सह-विकसित (Co-developed) रक्षा प्रणालियां और स्वदेशी तकनीकी क्षमता उसे अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में मजबूत प्रतिस्पर्धी बना रही हैं। हालांकि कुछ महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए भारत अभी भी रूस जैसे साझेदार देशों पर निर्भर है, लेकिन ब्रह्मोस की बढ़ती वैश्विक मांग यह संकेत देती है कि भारतीय रक्षा उद्योग तेजी से विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है।

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THE NEWS THIKANA, संपादकीय डेस्क यह द न्यूजठिकाना डॉट कॉम की संपादकीय डेस्क है। डेस्क के संपादकीय सदस्यों का प्रयास रहता है कि अपने पाठकों को निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ विभिन्न विषयों के सच्चे, सटीक, विश्वसनीय व सामयिक समाचारों के अलावाआवश्यक उल्लेखनीय विचारों को भी सही समय पर अवगत कराएं।