इटली में इस ‘जलपरी’ को लेकर छिड़ी है अनोखी जंग
<p><em><strong>दक्षिणी इटली के पुगलिया में मछली पकड़ने वाले गांव में जलपरी की मूर्ति को लेकर विवाद हो गया है। आसपास के लोग इसे बेहद ‘उत्तेजक’ करार दे रहे हैं। </strong></em></p>
दक्षिणी इटली के मोनोपोली में लुइगी रोसो आर्ट स्कूल के छात्रों द्वारा बनाई गई एक कलाकृति आधिकारिक तौर पर उद्घाटन से पहले ही विवादों में आ गई है। दरअसल, स्थापना के दौरान इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा की गई हैं, जिसका अच्छा खासा मजाक तो उड़ ही रहा है, आलोचना भी कम नहीं हो रही।
इतालवी अभिनेत्री टिजियाना शियावरेली ने इंस्टाग्राम पर इसे लेकर की गई पोस्ट में लोगों की अभिरूचि को लेकर चिंता जताई जब मोनोपोली में एक दोस्त ने मूर्ति की उपयुक्तता को लेकर संदेह व्यक्त किया। एक इंस्टाग्राम पोस्ट में, टिजियाना शियावरेली ने इतालवी में लिखा, ‘पहली नजर में, यह कलाकार की गढ़ी हुई छवि के बजाय, दो सिलिकॉन स्तनों के साथ एक जलपरी की तरह लगता है, जिसे सर्जन से मिलना चाहिए। और सबसे ऊपर एक विशाल गधा, जो कभी जलपरी पर नहीं देखा गया।’ हालांकि अभिनेत्री ने आगे स्पष्ट किया कि उनका इरादा कलाकृति के रचनाकारों या मोनोपोली नगरपालिका प्रशासन को नाराज करने का नहीं था।

रिपोर्ट के अनुसार, लुइगी रोसो आर्ट स्कूल के हेडटीचर, एडोल्फो मार्सियानो, अपने छात्रों की बनाई गई विवादास्पद जलपरी प्रतिमा के बचाव में आए। उनका मानना है कि यह प्रतिमा ‘सुडौल महिलाओं की बड़ी आबादी को समर्पित है।’ उन्होंने यह भी खुलासा किया कि मोनोपोली के मेयर ने अपने छात्रों को शहर के लिए कई मूर्तियां बनाने के लिए नियुक्त किया था, जिसमें एक समुद्र के विषय से प्रेरित होना था।
मार्सियानो के अनुसार, जलपरी की मूर्ति का विचार छात्रों से ही आया था। परिषद द्वारा मॉडल को मंजूरी देने के बाद, छात्र अंतिम मूर्तिकला के साथ आगे बढ़े, जिसे तब चैक में रखा गया था। उन्होंने कलाकृति को वास्तविकता के प्रतिनिधित्व के रूप में देखा, विशेष रूप से महिला शरीर के। एडोल्फो मार्सियानो ने कहा कि यह अनुचित होता अगर उन्होंने एक बेहद पतली महिला की मूर्ति बनाई होती, क्योंकि यह वास्तविकता का प्रतिबिंब नहीं होता।
मोनोपोली के निवासी बेप्पे के अनुसार, जलपरी की मूर्ति को लेकर हाल के दिनों में बहुत चर्चा हुई है, कुछ लोगों को यह ‘बहुत उत्तेजक’ लगती है। उन्होंने आलोचना पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि कला के छात्र आलोचना के बजाय प्रशंसा के हकदार हैं।
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