इंदिरा के बाद पीएम मोदी ने ही लुटाया है इस देश पर इतना प्यार... 10 साल मे जा पहुंचे 7वीं बार
<p><em>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिनों के यूएई दौरे पर हैं। ये मोदी का सातवां दौरा है। किस तरह पीएम मोदी के कार्यकाल में दोनों देश नजदीक आए हैं। भारत-यूएई संबंधों की बुनियाद में क्या है और दोनों देशों के बीच अब भी किस तरह की चुनौतियां हैं। </em></p>
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 और 14 फरवरी को यूएई दौरे पर हैं तो ये समझना भी जरूरी है कि 2014 में पीएम बनने के बाद उनकी संयुक्त अरब अमीरात की यह सातवीं यात्रा है। बल्कि पिछले 8 महीनों में तो पीएम तीसरी मर्तबा मध्य पूर्व के इस देश जा रहे हैं।
इस दौरान पीएम की मुलाकात यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ होगी। हाल के दिनों में दुनिया में जो घटनाक्रम रहे हैं, उसके आईने में दोनों देश द्विपक्षीय संबंधों को नई धार देने की कोशिश करेंगे। सरकारी बयानों की मानें तो “दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी, आपसी हित से जुड़े क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी और विस्तृत बातचीत की जाएगी।”
प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात राष्ट्रपति के अलावा यूएई के उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री से भी तय है। पीएम दुबई में विश्व सरकार शिखर सम्मेलन में भी हिस्सा लेंगे और फिर एक भाषण देंगे। दुबई के बाद पीएम का कार्यक्रम अबू धाबी का है। यहां वे अबू धाबी के पहले हिंदू मंदिर बीएपीएस का उद्घाटन करेंगे। यहीं उनका एक और कार्यक्रम भारतीय समुदाय को संबोधित करने का भी है।
भारत-यूएई के बीच कारोबार, निवेश, प्रवासी
भारत-यूएई संबंध राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक बुनियादों पर टिके हैं। भारत-यूएई की निकटता का सबसे मजबूत आधार द्विपक्षीय व्यापार है। 2020-23 के आधिकारिक आंकड़ों पर अगर नजर डालें तो इस दौरान भारत और यूएई के बीच लगभग 85 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार हुआ। ये तो व्यापारिक साझेदारी हुई। भारत के लिए यूएई इसलिए भी जरूरी है क्योंकि वह 2022-23 के दौरान भारत में एफडीआई निवेश करने वाले टॉप 4 देशों में शामिल रहा। संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय समुदाय के तकरीबन 35 लाख लोग रहते हैं। भारतीय समुदाय यूएई का सबसे बड़ा प्रवासी समूह है। दोनों देशों के बीच फरवरी 2022 में एक व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) पर दस्तखत हुआ। इसको संबंधों में मील का पत्थर माना गया।
इंदिरा गांधी से लेकर मोदी तक
भारत और यूएई संबंधों का एक मजबूत आधार साल 1976 में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने रखा। वे यूएई तब गए थे। इसके बाद भी 2003 और 2010 के तत्कालीन राष्ट्रपति यूएई के आधिकारिक दौरे पर गए। मगर प्रधानमंत्री को लेकर ये सिलसिला कुछ खास परवान चढ़ता नहीं दिखा। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रहते हुए मई, 1981 में यूएई गईं। उसके बाद कोई भी प्रधानमंत्री अगले तकरीबन साढ़े तीन दशकों तक यूएई नहीं गया। पीएम मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यूएई से नए सिरे से इस हवाले से भी राब्ता कायम होना शुरू हुआ। पीएम 2015, 2018, 2019, 2022, 2023 में दो बार और अब 2024 की शुरुआत ही में यूएई के दौरे पर होंगे। इस तरह अपने दस साल के कार्यकाल में पीएम मोदी ने कुल 7 मर्तबा यूएई को तरजीह दी है। पीएम मोदी की ये यात्रा यूएई के अलावा कतर को भी कवर करेगी। कतर ने अभी हाल ही में 8 भारतीयों की सजा माफ की है।
भारत-यूएई संबंध: चुनौतियां भी कम नहीं
ये ठीक बात है कि पिछले एक दशक में भारत-यूएई के बीच संबंध मजबूत हुए हों मगर दोनों देशों के बीच कुछ चुनौतियां भी है।
पहली: चीन का यूएई में बढ़ता आर्थिक प्रभाव हमेशा से भारत के लिए खतरा रहा और हाल के वर्षों में चीन ने जिस तरह से इस पूरे खित्ते में खासकर यूएई में अपनी चेक बुक डिप्लोमेसी के जरिये कम ब्याज पर कर्ज देने का शिगुफा छेड़ा है, भारत के लिए इससे निपटना जाहिर तौर पर ये एक अहम चुनौती रहेगी।
दूसरी: यूएई के कफाला सिस्टम की भी खूब आलोचना होती है। संयुक्त अरब अमीरात की ये व्यवस्था, जो नौकरी देने वाले मालिकान हैं, उनको मजदूरों और कर्मचारियों के बरक्स ज्याद ताकत देती है। इस कारण यूएई पर मानवाधिकार उल्लंघन के भी गंभीर आरोप लगते रहे हैं। चूंकि बड़ी संख्या में वहां भारतीय कामगार हैं, ये चिंता भारतीय से भी बहुत हद तक जुड़ी हुई है। इसके अलावा पाकिस्तान को यूएई की बड़े पैमाने पर मदद और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच संबंधों में संतुलन बिठाना भारत-यूएई के लिए काफी अहम होगा।
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