आस्था, श्रद्धा और मंदिर की उपयोगिता..
<p><em>22 जनवरी 2024 का दिन हमारे लिए एक ऐतिहासिक दिन है क्यों कि इस दिन अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। पूरे देश का वातावरण राममय हो गया है। इससे पूरे देश में एक तरह की सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न हो रही है। विदेश में रह रहे प्रवासी भारतीयों में भी राम मंदिर में हो रही प्राण प्रतिष्ठा को लेकर जबरदस्त उत्साह है। अयोध्या में सिर्फ राम मंदिर का ही निर्माण नहीं हो रहा है वरन् अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, अपनी तरह का विशिष्ट रेलवे स्टेशन, हॉस्पिटल और यूनिवर्सिटी भी बन रहे हैं। कुल मिलाकर अयोध्या "मस्ट विजिट" हो गई है।</em></p>
कुछ मूर्ख लोग इस अवसर पर सवाल उठा रहे हैं कि हमें मंदिरों से ज्यादा अस्पतालों की जरूरत है। अस्पतालों की उपयोगिता को कोई भी व्यक्ति अस्वीकार नहीं कर सकता लेकिन इस तरह की तुलना तर्कसंगत नहीं है और वैसे भी आस्था और श्रद्धा तर्क का विषय नहीं हैं ।
जो लोग मंदिर के बजाय अस्पताल के निर्माण की बात करते हैं, उनसे मैं भी तर्क करने के लिए कह सकता हूं कि यदि उनकी नजर में सेनेटरी नैपकिन की उपयोगिता अगरबत्ती से ज्यादा है तो वे अगरबत्ती खरीदने और जलाने के बजाय ढेर सारे सैनिटरी नैपकिन खरीदें ,उपयोग में लें और लोगों को बांटे।
मंदिर के बारे में चर्चा से पहले मैं एक संस्मरण शेयर करना चाहूंगा कि बैंक में अपने सेवाकाल के दौरान जबलपुर में कई बार मैं बहुत निराश हो जाया करता था। ऐसे में मैं वहां बनी एक विशाल शिव जी की प्रतिमा के चरणों में जाकर बैठ जाया करता था। जब मैं लौटता था तो मेरी निराशा दूर हो जाती थी और मुझ में बहुत सारी पॉजिटिव एनर्जी आ जाती थी। ( इस ऊर्जा से जो कार्य हुआ, वह किसी चमत्कार से कम नहीं था।)
हिंदू धर्म अत्यंत वैज्ञानिक धर्म है और मंदिर तथा वहां पूजा-अर्चना की अवधारणा भी अत्यंत वैज्ञानिक है। मंदिर जाकर वहां पूजा करने से कोई भी व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त कर सकता है । अधिक सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि वह वहां जाकर अपनी दृष्टि,श्रवण, स्वाद, गंध और स्पर्श इंद्रियों को जागरूक कर ले। मंदिर में दर्शन, घंटी, प्रसाद ,फूल और आरती पर हाथ रखकर हाथों को आंखों से स्पर्श करना -यह सब अधिकतम पॉजिटिव एनर्जी प्राप्त करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यह माना जाता है कि तिलक लगाने से ग्रहण की गई पॉजिटिव एनर्जी का लॉस नहीं होगा । हिंदू धर्म में माना जाता है कि शुद्धता से ही शांति, वैभव और समृद्धि आती है। साफ-सुथरे मंदिर भी हमें यही संदेश देते हैं।
आज हम ' हाइजीन ' की बात करते हैं लेकिन हजारों साल पहले भी हिंदू धर्म में मंदिर जाने से पहले ठीक से स्नान करना अनिवार्य था । मंदिर में चढ़ाने के लिए नारियल को सर्वाधिक उपयुक्त इसलिए माना गया था कि प्रकृति की जबरदस्त पैकिंग के चलते फलों में यह सबसे ज्यादा शुद्ध होता है।
कोई भी व्यक्ति जब मंदिर जाता है तो यह सोच लेकर लौटता है कि ईश्वर उसका साथ देंगे और उसकी यह सोच उसमें नया आत्मविश्वास ,ऊर्जा और नई स्फूर्ति भर देती है। भव्य और सुंदर मंदिर और अधिक पॉजिटिव एनर्जी प्रदान करते हैं।
बहुत सारे लोग ईश्वर के भय से गलत काम करने से भी डरते हैं।
हमारे देश में मंदिरों का महत्व इसलिए भी अधिक है कि इनकी वजह से हमारी जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग रोजगार पाता है। इन दिनों एक चर्चा यह भी चल रही है कि मंदिरों की संपत्ति सरकार ले ले। सरकार का इस संपत्ति पर ना तो अधिकार है और ना सरकार को लेनी चाहिए। उल्टा मंदिरों के ट्रस्ट को सरकारों को भूमि आवंटित कर देनी चाहिए ताकि वे अपनी इच्छा से इन पर अपने स्वामित्व वाले हॉस्पिटल, स्कूल-कॉलेज आदि बना सकें।
मंदिर जनता को अपने धन के संग्रह के द्वारा बनाने चाहिए तथा नए अस्पताल बनाने की जिम्मेदारी सरकार ले। जहां तक स्कूल कॉलेजों का सवाल है, हमारे देश में इनकी कमी नहीं है लेकिन इनमें आधारभूत ढांचा बढ़ाने तथा इनमें शिक्षा के स्तर में सुधार की सख्त आवश्यकता है।
प्रसंगवश, हिंदू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अन्य धर्मों के अनुयायियों के प्रति सहिष्णुता सिखाता है ऐसे में अन्य धर्मावलंबियों को भी चाहिए कि वे राम मंदिर निर्माण का खुलकर स्वागत करें।
पुनश्च:
मेरे मित्र जो सरकारी बैंक में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर थे, की प्रतिक्रिया है कि मंदिर भी एक तरह से अस्पताल ही हैं, जहां मानसिक और आध्यात्मिक इलाज होता है। भगवान में श्रद्धा और मंदिर जाने के कारण ही हिंदुओं में मानसिक रोगों की कमी है। उन्हें मेरा उत्तर था, पेट दर्द और अनेक ऐसी बीमारियां हैं जिनमें 20 से 25 % मामलों में सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर कहते हैं कि रोगी को उनके अनुसार कोई रोग नहीं है लेकिन रोगी निरंतर कंप्लेंट करता है। ( मेरे अनुसार ऐसा फियर ऑफ फेलियर या अन्य किसी मनोवैज्ञानिक कारण से होता है।) ऐसे रोगियों को धार्मिक अनुष्ठान, पूजा पाठ, प्रसाद और धागे बांधना जैसे उपायों से मनोवैज्ञानिक ट्रीटमेंट देकर ठीक किया जा सकता है।कभी आपसे अनुभव शेयर करूंगा।
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