क्या खरी खरी सुनाई नई संसद उद्घाटन के विरोधी दलों को गुलाम नबी आज़ाद ने
<h3><em>" विपक्ष को वो मुद्दे उठाना चाहिए, जिनका पब्लिक से संबंध है। संसद का उद्घाटन प्रधानमंत्री करें या राष्ट्रपति, इससे पब्लिक की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। "</em></h3> <p><em>नई संसद का आज यानी 28 मई 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उद्घाटन ने किया। नई संसद के प्रधानमंत्री के उद्घाटन करने के चलते 20 दल विरोध कर रहे थे । बीजेडी, YSRCP, बसपा समेत कुछ दलों में उद्घाटन समारोह में आने की बात कही है। उद्घाटन के पहले गुलाम नबी आजाद ने नई संसद के बनने, उसके उद्घाटन पर कई बातें कही हैं। आजाद ने नई संसद के बनने पर मोदी को बधाई भी दी है।</em></p>
विपक्ष को तो सरकार को बधाई देनी चाहिए थी- गुलाम नबी
कभी कांग्रेस के पूर्व वरिष्ठ नेता और गांधी परिवार के करीबी रहे गुलाम नबी आजाद ने कहा- अगर मैं दिल्ली में होता तो पार्लियामेंट का फंक्शन अटेंड करता। कल यानी 28 मई को अखनूर में मेरा कार्यक्रम है। जो सपना हमने 35 साल पहले देखा था, वो पूरा हो गया। जब मैं केंद्र सरकार (नरसिम्हाराव सरकार 1991-96) में संसदीय कार्य मंत्री था, तब मैंने स्पीकर शिवराज पाटिल से बात की थी, फिर प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव से बात की। हमने एक नक्शा भी बना लिया था। हमसे तो तब हो नहीं पाया, अब संसद की नई बिल्डिंग बन गई है, ये अच्छी बात है। पार्लियामेंट की बड़ी विशाल बिल्डिंग बनी है। इसका बनना जरूरी था। 1926 के बाद से सांसदों की संख्या काफी बढ़ गई है। तब से करीब दोगुने सांसद हो गए। तब की तुलना में देखें तो आबादी भी करीब पांच गुना बढ़ गई तो पार्लियामेंट भी कम से कम दोगुने आकार की होनी चाहिए। पुरानी संसद में इतनी जगह नहीं थी, ऐसे में नए संसद भवन की जरूरत थी ही। इस गवर्मेंट ने अच्छा इनीशिएटिव लिया और रिकॉर्ड समय में इसे तैयार भी कर लिया। पार्लियामेंट इतनी जल्दी नहीं बनती। विपक्ष को उन्हें (सरकार को) बायकॉट करने के बजाय बधाई देनी थी। अगर कोई खुद ना कर पाए और दूसरा करे तो खुश होना चाहिए।
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उद्घाटन के विवाद को लेकर भी मैं खिलाफ हूं। इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री करें या राष्ट्रपति, मैं तो ये कहता हूं कि राष्ट्रपति कौन सा विपक्ष का है। राष्ट्रपति को भी तो बीजेपी के सांसदों-विधायकों ने चुना है। अगर विपक्ष को राष्ट्रपति (द्रौपदी मुर्मू) की इतनी परवाह थी तो फिर राष्ट्रपति चुनाव में अपना कैंडिडेट क्यों खड़ा किया था? मतलब साफ है कि विपक्ष के पास सरकार के खिलाफ मुद्दों की कमी नहीं है, लेकिन वो मुद्दे नहीं उठाता। सिर्फ वही मुद्दे उठाते हैं, जिससे लोगों का कोई लेना-देना नहीं। विपक्ष को वो मुद्दे उठाना चाहिए, जिनका पब्लिक से संबंध है। संसद का उद्घाटन प्रधानमंत्री करें या राष्ट्रपति, इससे पब्लिक की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
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