अंग्रेजों की विधान परिषद् थी पुराना संसद भवन , जाने क्या फर्क है नए और पुराने संसद भवन
<p><em>28 मई को सुबह से नए संसद भवन के उद्घाटन पीएम मोदी द्वारा किया गया । इस समारोह का 20 विपक्षी पार्टियों ने बॉयकॉटकिया तो वहीं 25 से ज्यादा दलों ने समर्थन भी किया। बॉयकॉट कर रहे दलों का कहना है कि नए संसद भवन की जरूरत ही नहीं थी और अगर ऐसा किया भी जा रहा था तो इसका उद्घाटन राष्ट्रपति के हाथों कराया जाना चाहिए था। आपको यहाँ जानकारी देंगे की नए और पुराने संसद भवन की ज़रूरत और खर्चे में क्या अंतर रहा ....</em></p>
नए संसद भवन की क्यों थी जरूरत
पुराना संसद भवन 100 साल पुराना है। सरकार का कहना है कि एक तो ये इमारत पुरानी और खतरनाक हो गई है। दूसरा इसमें सीटें कम हैं। पुराने संसद भवन की लोकसभा में 545 सीटें हैं। 2026 तक तो लोकसभा सीटों में बदलाव नहीं होने वाला है, लेकिन इसके बाद संभव है कि नए परिसीमन के आधार पर सीटें बढ़ जाएं। इसलिए फिर पुराने संसद भवन में नए सांसदों के लिए जगह नहीं बचेगी।
सरकार का ये भी कहना है कि पुरानी इमारत में आधुनिक सुविधाएं मुश्किल हो रही थीं। इसमें एयर कंडिशनिंग, सीसीटीवी, ऑडियो वीडियो सिस्टम आदि का ध्यान नहीं रखा गया था। वहीं इस इमारत में सीलन आती है।
इसके अलावा दिल्ली में भूकंप की संभावनाएं बढ़ी हैं और उस हिसाब से पुरानी इमारत तैयार नहीं है।
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100 साल पहले 83 लाख में बना था संसद भवन
पुराने संसद भवन में 552 सीटें थीं। जबकि नई संसद में 888 सीटों की व्यवस्था है। वहीं इसके अलावा राज्यसभा में अब 384 सीटें होंगी। पुराने संसद भवन में 250 ही सीटें थीं।
पुराने संसद भवन के निर्माण में 100 साल पहले 83 लाख रुपए खर्च हुए थे। वहीं नए संसद भवन की निर्माण लागत 862 करोड़ रुपए है। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत तैयार किये गए इस निर्माण प्रोजेक्ट में 20 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। वहीं संसद भवन के निर्माण में करीब 862 करोड़ रुपए लगे हैं।
पुराने संसद भवन को बनाने में 6 साल का वक्त लगा था। जबकि नए भवन को बनने में कम समय लगा।
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अब पुराने संसद भवन का क्या होगा?
ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने इस संसद भवन का डिजाइन तैयार किया था। साल 1921 से 1927 तक इसका काम चला था। ये इमारत ब्रिटिश सरकार की विधान परिषद हुआ करती थी।
आजादी के बाद इसे संसद भवन के रूप में अपनाया गया। जानकारी के मुताबिक नई संसद बनने के बाद इस इमारत का इस्तेमाल संसदीय कार्यक्रमों के लिए किया जाएगा।
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