राइट टू हेल्थ बिल में सिर्फ ‘इमरजेंसी’ शब्द पर फंसा है पेच...! आखिर कैसे निकलेगा इसका हल, पसोपेश में गहलोत सरकार ?
<p><em><strong>एक सप्ताह से राजस्थान में राइट टू हेल्थ बिल का विरोध जारी है और निजी चिकित्सालय बंद हैं। बिल का विरोध कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि इस बिल में ‘इमरजेंसी’ शब्द को सही तरीके से परिभाषित नहीं किया गया है।</strong></em></p>
राजस्थान सरकार प्रदेश की जनता को स्वास्थ्य की देखभाल के लिए कानूनी आधिकार देना चाहती है। इसीलिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पहल पर राइट टू हेल्थ बिल विधानसभा में पेश होकर पारित हो चुका है लेकिन प्रदेश के डॉक्टर इसके विरोध में सड़कों पर उतर गए हैं।
पिछले एक सप्ताह से राजस्थान में निजी चिकित्सालय बंद हैं। घरों पर भी डॉक्टर मरीजों को परामर्श नहीं दे रहे हैं। निजी अस्पतालों के समर्थन में सरकारी डॉक्टरों ने भी दो-दो घंटे का कार्य बहिष्कार शुरू कर दिया और रेजिडेंट्स भी विरोध में उतर गए। राइट टू हेल्थ (स्वास्थ्य का अधिकार) बिल में आखिर ऐसा क्या है, जिसकी वजह से पूरा डॉक्टर समुदाय इसका विरोध कर रहे हैं। इस सवाल का जवाब है ‘इमरजेंसी’। जी हां, एक ‘इमरजेंसी’ शब्द के कारण ये पूरा बखेड़ा खड़ा हुआ है।
सही तरीके से परिभाषित नहीं आपातकाल
राइट टू हेल्थ बिल में ‘इमरजेंसी’ या आपातकाल शब्द सिरदर्द बना हुआ है। बिल में ऐसा प्रावधान किया गया है कि कोई भी निजी अस्पताल ‘इमरजेंसी’ की स्थिति में किसी भी मरीज के इलाज से इनकार नहीं कर सकता। अगर कोई अस्पताल इलाज के इनकार करते है तो उनके खिलाफ सरकार एक्शन लेगी। निजी अस्पताल के संचालकों और डॉक्टरों का कहना है कि ‘इमरजेंसी’ शब्द को सही तरीके से परिभाषित नहीं किया गया है। ऐसे में निजी अस्पताल के खिलाफ एक्शन की तलवार हमेशा लटकी रहेगी। जैसे आई हॉस्पिटल में अन्य बीमारी या हादसे से ग्रसित मरीज आ गया तो उसका इलाज कैसे संभव है! इसी तरह महिलाओं की डिलिवरी और गायनी अस्पताल में हार्ट पेशेंट या स्नैक बाइट का मरीज आ गया तो वहां इमरजेंसी की हालत में भी इलाज संभव नहीं है। जिस अस्पताल में गायनोकोलॉजिस्ट है ही नहीं, वहां महिलाओं की डिलिवरी या अन्य इलाज कैसे संभव है।
डॉक्टरों को बाध्य करना उचित नहीं
‘इमरजेंसी’ के साथ ही निजी अस्पतालों का बड़ा विरोध इलाज की गारंटी को लेकर भी है। स्वास्थ्य का अधिकार कानून लागू होने के बाद हर मरीज के इलाज की गारंटी डॉक्टर की हो जाएगी। कोई गंभीर मरीज अस्पताल पहुंचता है और अस्पताल में इलाज संभव नहीं है तो स्वाभाविक रूप से मरीज को बड़े अस्पताल में रेफर करना पड़ता है। रेफर के दौरान बड़े अस्पताल पहुंचने से पहले अगर मरीज की मौत हो जाए, इसकी गारंटी कौन लेगा।
निजी अस्पताल के डॉक्टर्स का कहना है कि रेफर करने वाले डॉक्टर कैसे गारंटी ले सकते हैं कि गंभीर अवस्था में मरीज की मृत्यु नहीं होगी। इस प्रावधान के कारण निजी अस्पताल और परिजनों के बीच झगड़े बढेंगे और कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़ेंगे।
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