'जस्टिस यशवंत वर्मा पर FIR क्यों नहीं?': संसदीय समिति ने कानून मंत्रालय से पूछा सवाल
संसद की कानून और न्याय पर स्थायी समिति की एक अहम बैठक में मंगलवार को न्यायपालिका की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। समिति के सदस्यों ने न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ सरकार की निष्क्रियता पर सवाल खड़े किए, खासतौर पर जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े मामले में अब तक FIR दर्ज न होने को लेकर..
नयी दिल्ली। संसद की कानून और न्याय पर स्थायी समिति की एक अहम बैठक में मंगलवार को न्यायपालिका की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। समिति के सदस्यों ने न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ सरकार की निष्क्रियता पर सवाल खड़े किए, खासतौर पर जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े मामले में अब तक FIR दर्ज न होने को लेकर नाराज़गी जताई।
इस बैठक की अध्यक्षता बीजेपी राज्यसभा सांसद बृज लाल ने की, जिसमें कानून मंत्रालय के न्याय विभाग के सचिव सहित कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
क्या था मुद्दा?
बैठक का मुख्य फोकस रहा, जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज क्यों नहीं हुई। समिति के सदस्यों ने पूछा कि क्या इस संबंध में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अनुमति मांगी गई थी और क्या वह अनुमति मिली थी?
अधिकारियों ने जवाब दिया कि सरकार CJI की सिफारिशों के आधार पर ही कार्रवाई करती है, और अभी तक एफआईआर के लिए कोई निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है।
अब समिति ने न्याय विभाग को लिखित में यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्या अनुमति मांगी गई थी और क्या वह प्राप्त हुई थी। इसका जवाब अगली बैठक में प्रस्तुत करने को कहा गया है।
क्या है मामला?
मार्च माह में, नई दिल्ली स्थित 30 तुगलक क्रेसेंट में जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास पर नकदी बरामद हुई थी। यह नकदी एक स्टोररूम में मिली, जिस पर वर्मा और उनके परिवार का प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण बताया गया।
इस विवाद के बाद जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाईकोर्ट से स्थानांतरित कर इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया।
जस्टिस शेखर यादव पर भी सवाल
समिति ने जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ भी सवाल उठाए, जिन पर घृणास्पद टिप्पणियां करने का आरोप है। अधिकारियों ने समिति को बताया कि इस पर लिखित जवाब जल्द साझा किया जाएगा।
न्यायपालिका में सुधार की जरूरत
व्यक्तिगत मामलों से इतर, समिति के सदस्यों ने व्यवस्थागत खामियों की ओर भी ध्यान दिलाया:
- न्यायाधीशों के लिए आचार संहिता (Code of Conduct) को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने की मांग
- राजनीतिक या वैचारिक पूर्वाग्रह से बचाव के लिए दिशा-निर्देश
- सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए 5 साल का "कूलिंग ऑफ पीरियड" लागू करने का प्रस्ताव, ताकि वे रिटायरमेंट के तुरंत बाद सरकारी पद न लें
- समान न्यायालयों में न्यायाधीशों के परिजनों द्वारा वकालत करने और सरकारी आवास में उनके साथ रहने को लेकर हितों के टकराव (conflict of interest) की आशंका जताई गई
सदस्यों का कहना था कि वर्तमान दिशानिर्देशों में कानूनी बाध्यता नहीं है, इसलिए एक ठोस कानूनी ढांचा तैयार किया जाना चाहिए, जिससे न्यायपालिका की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनी रहे।
जम्मू-कश्मीर दौरा
समिति ने यह भी घोषणा की कि वह 28 जून से श्रीनगर का दौरा करेगी, जहां जम्मू-कश्मीर में न्यायिक बुनियादी ढांचे और सुविधाओं का मौके पर मूल्यांकन किया जाएगा।
अगले कदम
समिति ने न्याय विभाग को निर्देश दिया है कि वह इन सभी मामलों पर विस्तृत लिखित उत्तर अगली बैठक में प्रस्तुत करे।
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