पीएम मोदी जाएंगे ऐतिहासिक कुल्लू दशहरा महोत्सव में, जहां नहीं जलाया जाता रावण
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार, 5 अक्टूबर को हिमाचल प्रदेश के अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा महोत्सव में शामिल होने जा रहे हैं। इस ऐतिहासिक दशहरे में भाग लेने वाले वे देश के पहले प्रधानमंत्री होंगे। वे न केवल दशहरा महोत्सव में शामिल होंगे बल्कि इस मौके पर निकलने वाली रथ यात्रा में भगवान रघुनाथ जी के दर्शन के बाद उनका रथ भी खींचेंगे।
प्रधानमंत्री के कुल्लू पहुंचने को लेकर पूरी तैयारियां कर ली गई हैं। जिला प्रशासन की ओर से करीब 250 वाद्ययंत्रों की विशिष्ट ध्वनियों के साथ कुल्लू जिले के भुंतर एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत किया जाएगा। कुल्लू में इस बार अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव 5 से 11 अक्टूबर तक मनाया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि कुल्लू के दशहरा महोत्सव का इतिहास 372 साल पुराना है। 1660 ईस्वी में पहली बार इस ऐतिहासिक उत्सव का आयोजन हुआ था। उस समय कुल्लू रियासत की राजधानी नग्गर हुआ करती थी और जगत सिंह वहां के राजा हुआ करते थे। उन्होंने वर्ष 1637 से 1662 ईसवी तक शासन किया। ऐसा कहा जाता है कि उनके शासनकाल में ही मणिकर्ण घाटी के गांव टिप्परी निवासी गरीब ब्राह्मण दुर्गादत्त राजा की किसी गलतफहमी के कारण आत्मदाह कर लिया। इसका दोष राजा जगत सिंह को लगा। इस दोष के कारण राजा को एक असाध्य रोग भी हो गया था।
असाध्य रोग से ग्रसित राजा जगत सिंह को एक पयोहारी बाबा किशन दास ने सलाह दी कि वह अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से भगवान राम चंद्र, माता सीता और रामभक्त हनुमान की मूर्ति लाएं। इन मूर्तियों को कुल्लू के मंदिर में स्थापित करके अपना राज-पाठ भगवान रघुनाथ को सौंप दें तो उन्हें ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति मिल जाएगी। राजा ने उनकी बात मानकर श्रीरघुनाथ जी की प्रतिमा लाने के लिए बाबा किशनदास के शिष्य दामोदर दास को अयोध्या भेजा था। काफी मशक्कत के बाद मूर्ति कुल्लू पहुंची थी।
इसके बाद प्रभू रघुनाथ की मूर्ति को कुल्लू में स्थापित किया गया और उनके आगमन में राजा जगत सिंह ने यहां के सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया। राजा ने भी अपना राजपाठ भगवान को अर्पण कर दिया और खुद उनके मुख्य सेवक बन गए। यह परंपरा आज भी चल रही है जिसमें राज परिवार का सदस्य रघुनाथ जी का छड़ीबरदार होता है।
कुल्लू में दशहरा उत्सव का आयोजन ढालपुर मैदान में होता है। लकड़ी से बने आकर्षक और फूलों से सजे रथ में रघुनाथ की पावन सवारी को मोटे मोटे रस्सों से खींचकर दशहरे की शुरुआत होती है। राज परिवार के सदस्य शाही वेशभूषा में छड़ी लेकर उपस्थित रहते हैं। आसपास कुल्लू के देवी-देवता शोभायमान रहते हैं।
विशेष बात यह है कि कु्ल्लू के दशहरे में रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले नहीं जलाये जाते। हालांकि दशहरा के अंतिम दिन लंका दहन जरूर होता है। इसमें भगवान रघुनाथ मैदान के निचले हिस्से में नदी किनारे बनाई लकड़ी की सांकेतिक लंका को जलाने जाते हैं। शाही परिवार की कुलदेवी होने के नाते देवी हिडिंबा भी यहां विराजमान रहती हैं।
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