मणिपुर का हाल और मोदी की चुप्पी...! मजबूरी है या रणनीति
<p><em><strong>पिछले दस दिनों से संसद शोर में डूबी हुई है। विपक्ष पीएम मोदी से मणिपुर के हालात पर बोलने की मांग कर रहा है। नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी पेश किया गया है। लेकिन चर्चा शुरू नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अहम मुद्दों पर प्रधानमंत्री का बोलना क्यों जरूरी है?</strong></em></p>
प्रधानमंत्री के बोलने से क्या होता है? परोक्ष रूप से ये सवाल भाजपा ही कर रही है क्योंकि पार्टी का मत है कि संबंधित मंत्रालय का मंत्री ही जवाब देगा। लेकिन पीएम का बोलना क्यों जरूरी है, इसका जवाब इंडिया दे रहा है। दोनों इंडिया। अपना देश भी और विपक्षी गठबंधन भी। प्रधान सेवक के बोलने का मतलब है, पूरा देश बोल रहा है। चाहे नियम 267 के मुताबिक हो या 176 के। क्या फर्क पड़ता है? लेकिन विपक्ष 267 पर जिद करता रहा। सत्ता पक्ष ने बात नहीं मानी तो अविश्वास प्रस्ताव ही पेश कर दिया। अब इसी में मणिपुर की चर्चा हो जाएगी।
मीडिया से की थी बात
मणिपुर में मैतेई हों या कुकी, 150 चिताएं ठंडी नहीं पड़ी हैं। उन दो महिलाओं के साथ हैवानियत का जो नंगा नाच हुआ वो तो इंतहा है। तीन मई से मणिपुर जल रहा है और 20 मई को जब संसद शुरू हो रहा था और हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया से बात की और अपने गुस्से का इजहार किया। प्रधानसेवक का गुस्सा जरूरी है। यह भरोसा दिलाता है कि सरकार इस पर सख्त है। लेकिन लोकतंत्र के मंदिर में मणिपुर पर दो शब्द बोलने से परहेज कैसा। जब 77 दिनों के बाद चुप्पी टूट ही गई तो मोदी के पास मौका था।
जिद की अजीब राजनीति
पीएम सदन में अपनी बात रखते तो आज नौ दिनों तक दिल्ली अध्यादेश भी निपट जाता और देशहित के बाकी मसलों पर भी बहस हो जाती। लेकिन पक्ष और विपक्ष अड़ा है। राजनीति में जिद अजीब चीज है। नरेंद्र मोदी पर चुप रहने की जिद रखने का आरोप नया नहीं है। शुरुआत तो पीएम बनने के साल भर बाद ही हो गई थी। जब दादरी में मोहम्मद अखलाक की लिंचिंग हो गई। तब से विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि मोदी बार-बार गंभीर मुद्दों पर चुप रह जाते हैं।
मणिपुर पर चुप मोदी कहां-कहां बोले
आखिर चुप्पी के दौरान मोदी करते क्या हैं? बीस जुलाई, जिस दिन संसद सत्र की शुरुआत हुई। इस दिन मोदी ने बिना सवाल लिए मीडिया के सामने मणिपुरी महिलाओं को नंगा परेड कराने और रेप के मामले पर अपनी बात रखी लेकिन मणिपुर हिंसा के मूल कारणों पर कुछ नहीं कहा। इसके बाद कई कार्यक्रमों में मोदी जमकर बोले
21 जुलाई - जी-20 श्रम और रोजगार मंत्रियों की बैठक।
श्रीलंका के राष्ट्रपति रनिल विक्रमसिंघे के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस।
22 जुलाई - राष्ट्रीय रोजगार मेला को संबोधित किया।
महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे के परिवार से घर पर मुलाकात।
जी-20 ऊर्जा मंत्रियों की बैठक।
25 जुलाई - भारतीय विदेश सेवा 2022 बैच के अधिकारियों से भेंट।
27 जुलाई - राजकोट एयरपोर्ट का उदघाटन।
28 जुलाई - सीकर से राजस्थान साधने का कार्यक्रम, जिसमें मोदी ने विपक्षी गठबंधन इंडिया की तुलना इंडिया लगे गैर कानूनी संगठनों से की, जिनमें पीएफआई और सिमी भी शामिल है।
30 जुलाई - मन की बात।
मुख्यमंत्री से इस्तीफा क्यों नहीं ले रहे
इससे कौन इनकार कर सकता है कि मोदी सरकार ने पिछले आठ वर्षों में पूर्वोत्तर को देश की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए जितने काम किए हैं, वो पहले नहीं हुए। कौन इनकार कर सकता है कि नागालैंड और असम में उग्रवादी संगठनों को बातचीत के रास्ते पर लाने में मोदी सरकार ने सफलता हासिल की है। फिर मणिपुर में कहां गलती हुई? क्या भाजपा की सरकार है, इसलिए मोदी कोई सख्त एक्शन नहीं ले रहे? ये सवाल तो है ही। पश्चिम बंगाल में विरोध प्रदर्शन पर राज्यपाल से रिपोर्ट मांगने वाली केंद्र सरकार मणिपुर में धारा 356 क्यों नहीं लगाती? क्या एन बीरेन सिंह को पद पर बने रहने का हक है? मैतेई और कुकियों के बीच दीवार कैसे चैड़ी होती गई और सीएम देखते रहे।
वाजपेयी-इंदिरा ने क्या किया था
दोबारा पीएम की तरफ लौटते हैं जिन्हें मुद्दे पर बोलने के लिए नहीं बल्कि सदन में बुलाने की मांग विपक्ष कर रहा है। इनके बरक्स जवाहर लाल नेहरू या इंदिरा गांधी से पहले अटल बिहारी वाजपेयी को देखिए। वे भाजपा के पितामह थे और तब भी मणिपुर जला था। 18 जून, 2001 को मणिपुर में हिंसा भड़की। 24 जून को वाजपेयी सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से मिले। वह भी अपने घुटनों के ऑपरेशन के ठीक बाद। वाजपेयी व्हीलचेयर पर थे। फिर दोबारा आठ जुलाई, 2001 को वाजपेयी ने मीटिंग की और शांति की अपील भी। गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी को राजधर्म सिखाने वाले वाजपेयी चार अप्रैल, 2002 को अहमदाबाद के शाह आलम कैंप पहुंचे थे। वे कश्मीरी पंडितों की हत्या के बाद डेलिगेशन बुलाकर मिलते थे।
एक उदाहरण इंदिरा गांधी का भी
18 फरवरी, 1983 के दिन असम के नेल्ली में जनसंहार का काला अध्याय लिखा गया। महज कुछ घंटों में 1800 लोगों का कत्लेआम। फिर असमी और बोडो आदिवासियों के बीच हिंसा में कत्लेआम। इंदिरा को विपक्ष ने दिल्ली में घेर लिया। उन पर बिना कुछ सोचे समझे असम में विधानसभा चुनाव कराने का आरोप लगा। लेकिन इंदिरा ने वहां खुद जाने का फैसला किया। 21 फरवरी को उन खेतों में थीं, जहां फसल की जगह लाशें बिछी हुई थीं।
हालांकि वोट बैंक को साधने का काम सबने किया। यही इंदिरा 1977 में हाथी पर सवार होकर बेलछी पहुंची, जहां दलितों का नरसंहार हुआ था। लेकिन बिहार में नरसंहार तो सवर्णों का भी हुआ। कोई ये सवाल पूछ सकता है पर तथ्य ये है कि बेलछी के बाद इंदिरा की राजनीतिक किस्मत दोबारा चमकी। बात रही मोदी की तो भारतीय जनता पार्टी के नेता उन्हें आधुनिक भारत का राष्ट्रपिता बताते हैं। इस लिहाज से मोदी की चुप्पी अखरती है।
176 और 267 में क्या है?
राज्यसभा में विपक्षी नेता नियम 267 के तहत चर्चा की मांग कर रहे हैं। इसमें जनहित के किसी बेहद जरूरी मुद्दे पर आपात बहस की व्यवस्था दी गई है। सामान्य तौर पर अगर किसी सांसद को सवाल पूछना होता है तो 15 दिनों का नोटिस देना होता है। आधे घंटे की बहस के लिए तीन दिन पहले नोटिस देना होता है। सदन की कार्यवाही रूल्स ऑफ बिजनस के तहत चलती है। हर दिन के लिए विषय तय होते हैं। जो मुद्दा किसी दिन के लिस्ट ऑफ बिजनस में नहीं है, उस पर सामान्य परिस्थितियों में चर्चा नहीं हो सकती। लेकिन नियम 267 सदन के सभी बिजनस को स्थगित कर तुरंत बहस कराने की सुविधा देता है। 1990 के बाद अब तक 11 बार इसका इस्तेमाल हो चुका है। खाड़ी युद्ध और भ्रष्टाचार पर बहस हो चुकी है। शंकर दयाल शर्मा ने नियम 267 के तहत चार नोटिस स्वीकार किए थे। भैरोंसिंह शेखावत ने तीन ऐसे नोटिस स्वीकर कर बहस की इजाजत दी थी। आखिरी बार नोटबंदी के मुद्दे पर इसी नियम के तहत चर्चा हुई थी। ये बात 2016 की है।
भाजपा अल्पावधि चर्चा के पक्ष में
बीजेपी रूल 176 यानी अल्पावधि की चर्चा कराने के पक्ष में है। इसके तहत अधिकतम ढाई घंटे की चर्चा हो सकती है। पीयूष गोयल का कहना है कि अमित शाह सरकार की तरफ से जवाब देंगे क्योंकि वो गृह मंत्री है। ठीक है, इससे किसका इनकार हो सकता है। लेकिन मोदी तो प्रधानसेवक हैं। खुद ही कहते हैं। ‘मोदी है तो मुमकिन है’ का नारा लगता है। ये किसी और नेता के लिए तो नहीं लगता। इसलिए मोदी बोलेंगे तो मुमकिन है मणिपुर शांत हो जाए।
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